जीवन भर के साथ की बातें

1966 मेरे जीवन का अहम वर्ष था। इसलिए नहीं कि इस वर्ष डॉ. सुरजीत कौर पन्नू ने मुझसे शादी करने के बाद पन्नू से संधू बन गईं। इस वर्ष की शुरुआत से कुछ समय पहले दो अन्य दोस्त बने, जिनकी दोस्ती मेरे साथ आज तक निभती आ रही है।
जीवन भर के साथ की बातें तो होती रहेंगी। अच्छा रहा। एक बात बता दूं। कृषि भवन में काम करने वाले मेरे एक साथी बृजेश भाटिया ताज़ा नौकरी से बड़ी नौकरी के लिए चुना गया, सम्पादक फैमिली ट्रेनिंग इंस्टीच्यूट ऑफ इंडिया। वह कार्यालय के पास ही 4-5 कमरों की कोठी ढूंढ रहे थे। मुझे पता था कि प्रसिद्ध कवियत्री अमृता प्रीतम अपनी कोठी के 2-4 कमरे किराये पर देना चाहती हैं। जब वह घर देखने के लिए अमृता से इजाज़त लेने जाना था तो सुरजीत ने कहा कि वह भी अमृता से मिलना चाएगी। नतीजा यह हुआ कि एक-दूसरे की देखा-देखी करते सुरजीत और मैं एक-दूसरे के हो गए। आजकल विवाह शादी के सीज़न में मुझे अपना जीवन भर का साथ याद आ गया। 
कृषि मंत्रालय के आंकडा विभाग में काम करते समय मेरी दोस्ती ढंडारी कला (लुधियाना) के रहने वाले बिक्रम गरचा से हो गई। उनसे मेरी जान-पहचान कराने वाले एम. आर. राजगोपालन थे, मेरे आंकड़ा विभाग में प्रबंधक अधिकारी। पहली मुलाकात में ही बिक्रम और मेरी दोस्ती हो गई। जब मुझे पता चला कि उनकी पत्नी भूपिंदर कौर गढ़ा गांव (जालन्धर) के कॉमरेड नोनिहाल चट्ठा की बहन हैं तो यह साझ और भी गहरी हो गई। मैं सरकारी नौकरी करते हुए भी वामपंथी विचारधारा का समर्थक था। माहिलपुर में पढ़ाते समय से। गढ़ा वालों से मेरे करीबी संबंध रहे हैं। गढ़ा वामपंथी विचारधारा का गढ़ है।
बिक्रम ने शादी के समय दहेज में कुछ नहीं लिया था। नव-विवाहित जोड़ी नई दिल्ली की राजिन्दर नगर कॉलोनी में किराए के दो कमरों में रह रही थी। उन्होंने एक कमरे में सोने का इंतज़ाम किया, लेकिन दूसरे कमरे के लिए सोफा सेट और अन्य सामान खरीदने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे। उसकी पत्नी ने गढ़ा वाले भाइयों से मेरे बारे में सुना था, लेकिन वह मुझे अपना राजिन्दर नगर वाला घर दिखाने में हिचकिचा रही थी।
एक दिन मैं ज़बरदस्ती बिक्रम के साथ चल पड़ा। घर पहुंच कर भूपिंदर कौर को चाय बनाने का कह कर मैं बिक्रम को अपनी मोटरसाइकिल पर बिठा कर लकड़ी मार्केट ले गया। उसके ना-ना करते हुए वहां से एक दो सौ रुपये का तख्त पोश, चार बांस की पीठ वाले मूहड़े तथा एक बांस की छड़ियों में शीशे वाले मेज़ का दाम बनाया।  पैसे सामान पहुंचने पर ही देने थे।
भूपिंदर चाय बनाकर बैठी थी। चाय पीकर मैंने तख्त पोश, मूहड़े और मेज़ खाली कमरे में रख दिए। भूपिंदर अंदर से दरी और चादर लाकर तख्त पोश पर बिछा दी।  उनका ड्राइंग रूम चार-पांच सौ रुपये में तैयार हो गया था, जिसमें थोड़े और पैसों के गद्दे और गद्दियां लाकर वे शान से रहने लगे। जल्द ही बिक्रम दिल्ली क्लॉथ मिल वालों का आर्थिक सलाहकार नियुक्त हो गए, जहां उनका वेतन 2400 रुपये महीने था, जबकि सरकारी वेतन 600 रुपये था। फिर बिक्रम ने पटेल नगर कालोनी में बड़ी कोठी किराए पर ले ली।
मैंने खुद को सुरजीत के समान करने के लिए बड़े-बड़े लेखकों और दोस्तों को शादी में बुलाया। कवि मोहन सिंह (माहिर) ने मेरा न्योता इस शर्त पर स्वीकार किया कि मैं उन्हें जालन्धर से अपनी कार में ले जाऊं। मैं खुद दूल्हा था और खुद ही ड्राइवर। मैंने कार चला कर जालन्धर में कवि मोहन सिंह के घर गया। मोहन सिंह ‘अजीत’  के मुख्य सम्पादक साधु सिंह हमदर्द और अकाली पत्रिका के सम्पादक शादी सिंह के साथ शतरंज खेल रहे थे। मोहन सिंह ने हमदर्द जी और शादी को बाराती बनने के लिए मना लिया, लेकिन हमें बहुत देर हो गई। हमारे पहुंचे बिना बारात दुल्हन के घर नहीं पहुंच सकती थी। मैंने कार की गति बढ़ाई और जंडियाला गुरु जो पहुंचे, जहां से तरनतारन को जाना था और आगे नौशहरा पन्नू को। बारात वाली बस एक घंटे से हमारा इंतज़ार कर रही थी। मेरे पिता बहुत गुस्से में थे। मेरे पास कपड़े बदलने का समय नहीं था। मेरा नया सूट उस ट्रंक में था, जो बस के ऊपर पड़ा था।
मैंने देखा कि बस के एक तरफ राजगोपालन और देस राज गोयल भी खड़े थे। गोयल ने मेरी काली पैंट से मैच करता हुआ काला कोट पहना हुआ था। नया सूट पहनने के बजाय मैंने उनका कोट उतरवा कर पहन लिया। मिलनी के बाद चाय पी रहे थे कि किसी ने मेरे पीछे खड़ा होकर मेरे कोट की दाहिनी जेब से सिगरेट का पैकेट और बाईं जेब से माचिस निकाल ली। मैंने पलटकर देखा तो देस राज गोयल थे। उन्होंने सबको अपने दोनों हाथ दिखाए और कहा कि वह सिर्फ दो चीज़ें ले जा रहे हैं। मैं किसी से कैसे कह सकता था कि कोट मांग हुआ है या यह सामन मेरा नहीं है। आखिर मामला सुलझ गया। प्रीतम सिंह मुझसे कहने लगे कि तुम भाग्यशाली हो, जो माझा वालों की मार से बच गए।  सुबह आनंद कारज के समय ग्रंथी को देर हो गई। मोहन सिंह ने बारातियों में से हरभजन सिंह रतन को यह काम करवाने का आदेश दिया। घबराए हुए रतन के मुंह से निकल गया कि अब लड़के का पिता लड़की का हाथ लड़के को पकड़ाएंगे। मेरे पिता उठे और उन्होंने भी हुक्म मानने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई। संत सिंह सेखों ने कहा कि अब से मेरे पिता ही मेरी होने वाली पत्नी के पिता हैं। सब जानते थे कि दुल्हन के पिता को स्वर्गवास हुए डेढ़ दशक हो चुका है। आनंद कारज के लिए बैठने से पहले, नावलकार मोहन कहलों शिव कुमार बटालवी और दो-चार और दोस्त लेकर आ चुके थे। सब शिव से कुछ सुनना चाहते थे।
फिर हम मनाली चले गए, जो एक हफ़्ते या दस दिन का पहाड़ी दौरा था। हम रोहतांग पास (दर्रा) तक होकर वापस लौटे। उसी पहाड़ी पर जहां मैं पहले अपने तीन दोस्तों के साथ एक छोटी मोटरसाइकिल पर आया था। मैं और मेरा हमसफर आज तक खुश रहने वाले पति-पत्नी हैं।
अंतिका
रब्ब वरगा आसरा तेरा
जिऊंदा रहे मित्तरा तूं
ई-मेल : sandhugulzar@yahoo.com

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