बचपन पर मंडराता हिंसा का साया

किसी भी सभ्य समाज की सबसे बड़ी पूंजी उसके बच्चे होते हैं, लेकिन जब मासूमियत के आंचल में कोई नौनिहाल हिंसक हो जाए, तो यह केवल एक थाने का मुकद्दमा या किसी स्कूल की लापरवाही नहीं रह जाती, बल्कि यह संपूर्ण राष्ट्र और समाज की अंतरात्मा को झकझोर देने वाली एक भयावह चेतावनी बन जाती है। हरियाणा में पंचकूला के एक सरकारी विद्यालय में जो कुछ हुआ, उसने पूरे देश को सकते में डाल दिया है। तीसरी कक्षा के महज आठ साल के एक बच्चे द्वारा केजी की छह साल की मासूम बच्ची पर ईंट जैसी भारी वस्तु से बेरहमी से हमला किए जाने की घटना ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर हमारे बच्चे किस दिशा में जा रहे हैं?
यद्यपि घायल बच्ची पीजीआई चंडीगढ़ के डॉक्टरों की देखरेख में अब खतरे से बाहर है, बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने इस मामले का स्वत: संज्ञान ले लिया है और पुलिस ने विद्यालय प्रबंधन के खिलाफ  गंभीर लापरवाही का मामला दर्ज कर औपचारिकताएं पूरी करनी शुरू कर दीं, किंतु सबसे बड़ा और सुलगता हुआ सवाल यह है कि इतनी कोमल उम्र के एक बच्चे के मन में यह क्रूरता और आक्रामकता आखिर कहां से उपजी? क्या हमारा परिवार, हमारा विद्यालय और हमारा समाज मिलकर बच्चों की परवरिश में कहीं कोई ऐसी गंभीर भूल कर रहे हैं, जिसके परिणाम अब इस रूप में सामने आ रहे हैं।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े भले ही हर एक बात विस्तार से न कहें, लेकिन वे एक भयावह तस्वीर ज़रूर पेश करते हैं। वर्ष 2024 के दौरान देश भर में किशोरों के खिलाफ  दर्ज मामलों में 11.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई और 34 हज़ार से अधिक मामले सामने आए। हरियाणा के संदर्भ में स्थिति और भी अधिक चिंताजनक और गंभीर है। उसी रिपोर्ट के अनुसार हरियाणा में 2024 में बच्चों के खिलाफ  अपराधों के 7,547 मामले दर्ज हुए, जो पिछले वर्ष की तुलना में करीब 17.9 प्रतिशत अधिक थे। प्रति लाख बाल आबादी पर 82.8 मामलों की दर के साथ हरियाणा का देश में पहले पायदान पर रहना और बच्चों के विरुद्ध अपराधों में सज़ा की दर का मात्र 28.7 प्रतिशत होना इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि जिस परिवेश में आज की पीढ़ी बड़ी हो रही है, वहां न केवल हिंसा अपने पांव पसार चुकी है, बल्कि कानून और न्याय का भय भी लगातार कमज़ोर पड़ रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बाल-मन में अचानक इस तरह का हिंसक आचरण उत्पन्न नहीं होता। इसके पीछे कई गहरे और अनदेखे कारण हैं, जिन पर अब पर्दा डालने के बजाय खुलकर बात करने का वक्त आ गया है। बच्चे सबसे पहले अपने घर और आसपास के माहौल से सीखते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्टें इस बात की तस्दीक करती हैं कि दुनिया भर में करोड़ों बच्चे घरों और विद्यालयों में शारीरिक दंड, डांट-डपट या उपेक्षा का सामना करते हैं। जिस बच्चे ने अपने शुरुआती दौर में प्रेम, संवाद और अपनत्व के बजाय केवल थप्पड़, गाली और आक्रामकता को ही अनुशासन का पैमाना बनते देखा हो, वह अपनी बात मनवाने या ताकत दिखाने के लिए हिंसा को स्वाभाविक मान बैठे तो इसमें कोई अचरज नहीं होना चाहिए। आज के डिजिटल युग में स्क्रीन और मोबाइल बच्चों के सबसे करीबी साथी बन चुके हैं, लेकिन यही तकनीक उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा अभिशाप भी साबित हो रही है। आर्थिक सर्वेक्षण में भी इस बात को स्वीकार किया गया है कि डिजिटल लत बच्चों और युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित कर रही है। सोशल मीडिया और हिंसक वीडियो गेम बच्चों को संवेदनहीन बना रहे हैं। पंचकूला की इस घटना में भी आरोपी बच्चे के मोबाइल गेम के आदी होने की बात सामने आई है। यह भले ही पुलिस जांच का विषय हो, लेकिन इस हकीकत से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि असीमित स्क्रीन टाइम बच्चों को वास्तविक दुनिया की संवेदनाओं से कोसों दूर ले जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद देश के अधिकांश शिक्षण संस्थानों में प्रशिक्षित काउंसलरों या मनोवैज्ञानिकों की नियुक्ति को गंभीरता से नहीं लिया गया है। पंचकूला के इस विद्यालय में घटना से पहले दो घंटे तक बच्ची का लापता रहना और किसी शिक्षक की नज़र तक न पड़ना यह साबित करता है कि हमारे स्कूल बच्चों की सुरक्षा के मोर्चे पर पूरी तरह विफल हो चुके हैं।
-मोबाइल . 81071-77196

#बचपन पर मंडराता हिंसा का साया