भोथरी क्रांति और बदलाव का देश
प्याले में क्रांति तूफान उठाने के ज़माने आ गये हैं। क्रांति, बदलाव, नया युग, नये तेवर कितने अच्छे शब्द लगते हैं। आपकी नेतागिरी चमकती ही तब है जब आपको इन शब्दों का इस्तेमाल बड़ी अदा से करना आता है। पौन सदी आज़ादी की गुज़र गई बदलाव का इंतज़ार करते हुए, तो महा-उत्सव मनाते हुए फैसला हुआ कि अब देश में पूंजी निर्माण शुरू किया जाएगा। अभी कर्त्तव्य पथ बन गये हैं, अब इन पर चलना शुरू किया जाएगा।
सड़क के एक कोने में बैठे एक मरभुख्खे ने पूछा कि ‘अब शुरू करना है, तो खत्म कब होगा?’
‘गुज़री पौन सदी के लम्बे काल में क्या करते रहे?’ तत्काल जवाब मिला, ‘घोषणाएं करते रहे।’ ‘गरीबी हटाओ देश बचाओ की घोषणा करते रहे।’ ‘भ्रष्टाचार को हम शून्य स्तर पर भी सहन नहीं करेंगे’ की घोषणा करते रहे। ’ घोषणा होती है, तो जानते हो कोलाहल होता है। कोलाहल एक नक्कारखाना बन जाता है। उसमें से सफलता की प्राप्ति तो एक तूती की आवाज़ जैसी भी नहीं निकलती। फिर कोई गले में नगाड़ा बांध कर निकले तो क्या करें?
विश्व बैंक के नये आंकड़े आये हैं। देश के मसीहा प्रसन्न हैं। चमत्कार हो गया भाई, आधी से ज्यादा आबादी एक ही धक्के में गरीबी रेखा के पार हो गई। पहले से अमीर और खाते-पीते लोग भी इनमें शामिल कर लो। बस तरक्की ही तरक्की का आलम है। पता है अब देश में केवल अढ़ाई प्रतिशत गरीब रहते हैं। बाकी सब गरीबी रेखा से पार हो गये। यह गरीबी रेखा तो अग्नि-रेखा सी है भय्या! पेट भूख की आग से झुलसता है, कन्धे टूटे सपनों का बोझ उठाते-उठाते थक गये हैं, और आप कहते हो देश गरीबी रेखा पार कर गया।
हम उन अस्सी करोड़ लोगों की ओर देखते हैं, जो सस्ते राशन की दुकानों के बाहर कतार लगा कर खड़े हैं। अलनीनो आता है, मौसम बेवफाई करता है, खेतियां सूख जाती हैं। सस्ते राशन की दुकानों के बाहर कतार लगा कर खड़े लोगों के चेहरे उतर जाते हैं। मंडियों में अनाज कम आया, तो ये दुकानें भरेंगी कैसे? भूखों के मुंह में रोटी का निवाला जाएगा कैसे? आपने तो घोषणा कर दी कि देश की आर्थिक विकास दर की तेज़ी और राशन की दुकानों के बाहर खड़ी भूखों की कतार का चोली-दामन का साथ है। जितनी तरक्की दर बढ़ेगी और हम गर्व से कहेंगे, कि हम दुनिया में सबसे तेज़ हैं, उतना ही अमीरों के प्रासाद और ऊंचे, और सस्ता राशन बांटने की अवधि और लम्बी होती जाएगी। यह कैसा विरोधाभास?
यह विरोधाभास का देश है प्यारे! यहां एक ओर आज़ादी का शतकीय महोत्सव मनाते हुए दुनिया में नम्बर एक हो जाने का सपना देखा जाता है, और दूसरी ओर भूखों और गरीबों में सस्ता राशन बांटने का रिकार्ड भी तो हमने बनाया है। एक ओर हम कहते हैं कि हमारे प्राइमरी स्कूलों में शत-प्रतिशत दाखिला होने लगा है, लेकिन मिडल या मैट्रिक तक जाते-जाते इनमें से भगौड़े हो जाने का रिकार्ड भी तो अपना है। आधे से अधिक पढ़ाई से भाग कर बाल श्रमिक हो जाते हैं बच्चे।
बहुत तरक्की हो गई। हम दुनिया की सबसे सशक्त चौथी बड़ी आर्थिक शक्ति बन गये, और एक दो साल में तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बन जाएंगे, और खुदा ने चाहा तो बीस सौ सैंतालिस तक दुनिया की सबसे मजबूत आर्थिक शक्ति, लेकिन यह शक्ति कहां अटक गई, भय्या? क्या भव्य प्रासादों और बहुमंज़िली इमारतों के कंगूरों पर? क्योंकि सड़क छाप लोगों में तो कोई कमी नहीं आई। समतावाद को एक मरा हुआ दर्शन घोषित कर दिया गया है क्योंकि इस बीच आंकड़ा शास्त्री गर्वित हो रहे हैं, कि अमीर और अमीर हो गये हैं। उनसे पूछना कि इस बीच असंख्य गरीब क्यों और अधिक गरीब हो गये? वे इसका जवाब विश्व बैंक के आंकड़ों में पेश करेंगे। पिछले डेढ़ दशक में देश की आधी से अधिक आबादी गरीबी रेखा पार कर गई है बताएंगे। न पूछना कि इस गरीबी रेखा की परिभाषा क्या है? राज बदलता है। फिलहाल जिस व्यक्ति को दिन में एक जून की रोटी मयस्सर हो जाती है, वह गरीबी रेखा पार कर लेता है।
और उधर यह घोषणा सुनी है कि दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश भारत हो गया है। सबसे अधिक लावारिस नौजवानों वाला देश जिन्हें काम से नहीं, रियायतों की रेवड़ियों से बहलाया जाता है। न बहलें तो कर्म-कांड की दुहाई और विधि का विधान की कई व्याख्याएं हैं।
इससे परम संतुष्ट है यह देश। इसलिए तो सबसे अधिक बिना काम के लोग इसी देश में पाये जाते हैं। भारत की नारी की गरिमा से तो यह देश खड़ा है। तभी तो वह घर में भी खटती है, और खेत में भी मर्द का हाथ बंटाती है, बिना भुगतान। नारी स्वातंत्र्य के इस युग में सबसे अधिक दुष्कर्म नारियों के ही होते हैं, बन्धु! अपहरण भी।

