असहमति व्यक्त करने की भी कोई सीमा होनी चाहिए
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां सत्ता से सवाल पूछने, सरकार की आलोचना करने और किसी भी संवैधानिक संस्था के फैसलों का विरोध करने का अधिकार प्रत्येक नागरिक को प्राप्त है। यही लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन इस अधिकार के साथ एक महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी भी जुड़ी हुई है। वह है—संवैधानिक मर्यादाओं, सार्वजनिक शालीनता और संस्थागत गरिमा का सम्मान। लोकतंत्र में विरोध जितना ज़रूरी है, विरोध करने का तरीका भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि असहमति की अभिव्यक्ति, व्यक्तिगत आरोपों, अपमानजनक टिप्पणियों और धमकी भरी भाषा में बदलने लगे तो लोकतांत्रिक विमर्श की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
हाल के दिनों में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर देश में राजनीतिक बहस तेज़ हुई है। विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस सहित ‘इंडिया’ गठबंधन के दलों ने इस मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन किए हैं और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की है। विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण में बड़ी संख्या में वास्तविक मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं और इससे चुनाव प्ररिफया की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर चुनाव आयोग ने अपनी प्रक्रिया का बचाव करते हुए कहा है कि मतदाता सूची को शुद्ध और अद्यतन करना उसकी संवैधानिक ज़िम्मेदारी है।
इस पूरे विवाद के बीच 1 नवम्बर को दिल्ली के रामलीला मैदान में कांग्रेस और ‘इंडिया’ गठबंधन के सहयोगी दलों ने बड़ी रैली आयोजित की। इसमें राहुल गांधी सहित कई विपक्षी नेता शामिल हुए। रैली का उद्देश्य चुनाव आयोग के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराना और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को तेज़ करना था, लेकिन इस रैली में नेताओं के कुछ बयानों ने एक नया सवाल खड़ा कर दिया। क्या संवैधानिक संस्थाओं के प्रमुखों और देश के शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व के प्रति व्यक्तिगत तथा धमकी भरी भाषा का इस्तेमाल लोकतांत्रिक विरोध की उचित अभिव्यक्ति है?
राहुल गांधी ने अपने संबोधन में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कहा कि वह पद से हटाए जाएंगे और जेल जाएंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के संदर्भ में भी उन्होंने कहा कि कानूनी कार्रवाई की जाएगी और वे कहीं भाग नहीं पाएंगे। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की ओर से भी मुख्य चुनाव आयुक्त के संदर्भ में बेहद तीखी और धमकी जैसी भाषा का इस्तेमाल किया गया। इन बयानों ने राजनीतिक बहस को मुद्दों से हटाकर व्यक्तियों पर केंद्रित कर दिया।
यहां यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि किसी राजनीतिक नेता या विपक्षी दल को चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने से नहीं रोका जा सकता। यदि विपक्ष को लगता है कि चुनाव प्रक्रिया में अनियमितताएं हुई हैं, मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हुए हैं या आयोग ने अपनी ज़िम्मेदारियों का निर्वहन निष्पक्षता से नहीं किया है तो उसे इन सवालों को पूरी ताकत से उठाना चाहिए। वह संसद में मुद्दा उठा सकता है, राष्ट्रपति से हस्तक्षेप की मांग कर सकता है, अदालत का दरवाज़ा खटखटा सकता है और शांतिपूर्ण जन आंदोलन भी कर सकता है लेकिन विरोध की अभिव्यक्ति में व्यक्तिगत अपमान और धमकी की भाषा को शामिल करना किसी भी दृष्टि से उचित परम्परा नहीं कही जा सकती।
भारतीय संविधान ने हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार दिया है। इन अधिकारों के साथ संविधान ने कुछ उचित प्रतिबंधों की व्यवस्था भी की है। वास्तव में लोकतंत्र की मज़बूती इसी में है कि यहां सत्ता में बैठे व्यक्ति से लेकर विपक्ष के नेता तक, सभी को अपने आचरण और भाषा की मर्यादा बनाए रखनी चाहिए। यह भी ध्यान देने योग्य है कि संवैधानिक संस्थाएं किसी व्यक्ति विशेष की निजी संपत्ति नहीं होंती। चुनाव आयोग में आज एक मुख्य चुनाव आयुक्त है तो कल कोई दूसरा होगा। न्यायपालिका में न्यायाधीश बदलते रहते हैं, लेकिन संस्थाएं कायम रहती हैं। इसलिए किसी पद पर बैठे व्यक्ति के प्रति सम्मान का अर्थ उसकी हर बात से सहमत होना नहीं है, बल्कि उस पद और उससे जुड़ी संवैधानिक व्यवस्था की गरिमा को बनाए रखना है।
यदि विपक्ष चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहा है तो सरकार को भी राजनीतिक लाभ के लिए आयोग की आलोचना करने वालों को लोकतंत्र विरोधी बताने से बचना चाहिए। चुनाव आयोग को भी अपनी कार्यप्रणाली में अधिकतम पारदर्शिता रखनी चाहिए और उठाए गए उचित सवालों का तथ्यों के साथ जवाब देना चाहिए।
अंतत: लोकतंत्र की मज़बूती केवल इस बात से तय नहीं होती कि कितने बड़े प्रदर्शन हुए या कितने तीखे भाषण दिए गए। उसकी असली कसौटी यह है कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद संविधान और संस्थाओं के प्रति सम्मान बना रहे। (अदिति)



