आखिर क्या है यह कश्मीरियत ?


पिछले दिनों धारा 370 और 35 ए हटने के पश्चात मीडिया में कश्मीरियत की बहुत चर्चा रही है। आलोचकों का कहना है कि इन धाराओं का हटना कश्मीरियत पर आघात है। सोचने की बात यह है कि यह कश्मीरियत है क्या जिस पर आघात हो रहा है। यह तो सर्वविदित है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने अपनी शेख अब्दुल्ला से नजदीकियों के कारण कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय में कई समस्याएं पैदा कर दी थी। पहले तो महाराजा को लटकाये रखना, फिर तत्कालीन प्रधानमंत्री मेहरचंद महाजन को हटा कर शेख अब्दुल्ला को प्रधानमंत्री बनाने की जिद करना, उसके पश्चात पूरा कश्मीर वापिस लिए बिना युद्ध विराम कर देना और शेख अब्दुल्ला को संतुष्ट करने के लिए कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देना नेहरू की ऐसी गलतियां थीं जिनका देश ने भयंकर दुष्परिणाम भुगता है।महाराजा हरि सिंह कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय के इच्छुक थे और उन्होंने उसी प्रकार के विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए थे जैसे अन्य राज्यों ने किए थे। फिर उन्हें जम्मू-कश्मीर जाने से रोक देना और शेख अब्दुल्ला को कश्मीर का प्रधानमंत्री बनाना नेहरू का किया धरा था। यह ठीक है कि शेख अब्दुल्ला कश्मीरी मुसलमानों के नेता थे और कश्मीर मुस्लिम बहुल राज्य था पर इसका अर्थ यह तो नहीं था कि महाराजा को पूरी तरह से बाहर कर शेख अब्दुल्ला को प्रधानमंत्री के रूप में राज्य की बागडोर सौंपी जाए।
शेख अब्दुल्ला शीघ्र ही अपने वास्तविक रंगों में आ गए और आजाद देश की बातें सोचने लगे जिसके कारण 1952 में नेहरू को मजबूर होकर उन्हें जेल में डालना पड़ा। धार्मिक आधार पर पाकिस्तान के निर्माण के पश्चात शेष भारत को धर्म-निरपेक्ष राज्य घोषित किया गया था और यहां धर्म के आधार पर किसी क्षेत्र को विशेषाधिकार देने की धारणा सिरे से ही गलत थी। फिर नेहरू ने स्वयं माना था कि यह एक अस्थाई व्यवस्था थी तो इसे जल्दी से जल्दी समाप्त कर कश्मीर का शेष भारत से मानसिक रूप से भी पूरी तरह विलय किया जाना था। यह धारा हटने से हिन्दू बहुल जम्मू क्षेत्र और बौद्ध लद्दाख में कोई आपत्ति नहीं थी बल्कि इन क्षेत्रों ने तो इसका स्वागत ही किया। फिर कश्मीर घाटी के नेताओं ने इस पर आपत्ति क्यों जतायी? आखिर उन्हें मुख्य धारा का अंग बनने में समस्या ही क्या है? कश्मीरियत कोई धार्मिक अवधारणा नहीं हो सकती। कश्मीरियत का अर्थ है कश्मीर की संस्कृति, खान-पान, रहन-सहन और ऐसी कुछ अन्य बातें जो उन्हें एक विशेषता प्रदान करती हैं और इन पर कोई आघात नहीं हुआ है। आघात हुआ है तो केवल इस अवधारणा पर कि कश्मीर का वर्तमान राजनीतिक स्वरूप न बदला क्योंकि यह घाटी के कुछ राजनीतिक दलों के लिए लाभदायक है। कश्मीरी नेताओं को समझना चाहिए कि वे कश्मीरियत के आवरण में अपनी राजनीतिक रोटियां न सेकें और कश्मीर को देश के अन्य भागों की तरह फलने-फूलने व विकास करने का अवसर प्रदान करें।