भारतीयों को क्यों चाहिए इतना सारा फास्ट फूड ?


जहां आज भी शादी हेतु योग्य वर ढूंढने के लिए लोगों में सालों का धैर्य है। जहां आज भी ट्रेन के 2 से 3 घंटे तक लेट हो जाने को सामान्य माना जाता है और किसी सभा-सेमिनार में अगर कोई वक्ता घोषित समय पर मंच पर हो तो उसे आश्चर्य से देखा जाता है। सवाल है इतने धीमे और बेफिक्र देश को आखिर इतना सारा फास्ट फूड क्यों चाहिए? जी, हां हम हिन्दुस्तान की ही बात कर रहे हैं, जहां फास्ट फूड की मांग और खपत तकरीबन 300 फीसदी सालाना की रफ्तार से बढ़ रही है। वह भी एक ऐसे समय में जब दुनिया के बहुत सारे देश फास्ट फूड और पैक्ड प्रोसेस्ड फूड का बहिष्कार कर रहे  हों ? ठीक उसी समय भारत में अकेले मुंबई में ही करीब 10 करोड़ ‘बड़ा पाव’ हर रोज बिकते हैं। इसमें भी 5 से 6 करोड़ बड़ा पाव तो सुबह 9-10 बजे तक ही बिक जाते हैं। मुंबई में अकेले बड़ा पाव ही हर दिन करीब 100 करोड़ रुपए से ज्यादा के बिकते हैं यानी करीबन 36,500 करोड़ रुपए का सालाना बिजनेस। सिर्फ  एक शहर, एक आइटम और बिक्री का इतना आकर्षक आंकड़ा। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि हिन्दुस्तान में फास्टफूड का कितना बड़ा बिजनेस होगा? सवाल है इसकी वजह क्या है ? इसकी एक बड़ी वजह तो बड़े पैमाने पर लोगों का, विशेषकर युवाओं का अकेले रहना है। यह विरोधाभासी लग सकता है, लेकिन आज बड़ी संख्या में हिन्दुस्तानियों का एक ऐसा तबका है, जिसके पास खाना पकाने का वक्त ही नहीं है। विशेषकर इन्हीं युवाओं के पास जो शहरों में अकेले रह रहे हैं। वास्तव में ये युवा हैं जो कि देश के तमाम गांवों, कस्बों, छोटे-मझोले शहरों और एक से दूसरे महानगरों में नौकरीपेशा हेतु पलायन को मजबूर हुए हैं, कहीं न कहीं उनके सामने अपना पेट भरने की समस्या है। दरअसल ये युवा दिन के ज्यादातर घंटों में काम में मशरूफ रहते हैं, इसलिए न तो इनके पास खाना बनाने का वक्त है और न ही खाना बनाने में कोई खास रुचि है। इसका एक आर्थिक पहलू भी है। दरअसल भारतीय युवा आज ज्यादा से ज्यादा काम करके ज्यादा से ज्यादा कमाना चाहते हैं ताकि वे अभाव की जो कहानियां अपने बाप दादाओं से सुनते हुए बड़े हुए हैं, वे कहानियां उनके जीवन का हिस्सा न बनें। लेकिन युवाओं की खाना न बना पाने की इन मजबूरियों के जिक्र का यह कतई मतलब नहीं है कि भारत में सिर्फ  युवा ही फास्ट फूड खा रहे हैं या कि वे ही फास्ट फूड के दीवाने हैं। इससे यह मतलब निकालना जल्दबाजी होगी कि फास्ट फूड के दिन दूने-रात चौगुने स्तर पर विस्तार का एकमात्र कारण खाना बनाने के समय का न होना है। ऐसा कतई नहीं है। ऐसा होता तो भारत की गृहिणियां जो अकसर घर में रहती हैं और जिनके पास खाना पकाने के लिए समय ही समय होता है, वे भी फास्ट फूड की दीवानी होतीं। कुल मिलाकर कहने की बात यह है कि फास्ट फूड की बेहतहाशा बढ़ोत्तरी के पीछे यह कतई न मान लिया जाए कि व्यस्त जीवनशैली एकमात्र इसके लिए जिम्मेदार है। हालांकि इसका अच्छा खासा रोल है। लेकिन भारत में हर साल करीबन 20 लाख करोड़ से ज्यादा का बिकने वाला सभी तरह का खाना जो घर से बाहर खाया जाता है, उसमें फास्ट फूड की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ती जा रही है, उसके लिए एक नहीं, कई कारण जिम्मेदार हैं। बेतहाशा फास्ट फूड खाने के लिए, खाना न बनाने के अलावा एक और बड़ा कारण यह है कि ज्यादातर भारतीयों के पास इतना पैसा नहीं है कि वह खरीदकर प्रॉपर खाना खा सकें; क्योंकि पूर्ण और व्यवस्थित खाना उनकी कमाई के बजट में नहीं है। अब चूंकि एक कम्पलीट और व्यवस्थित खाना ज्यादातर आम भारतीयों के बजट में नहीं है तो इसका एक आकर्षक और चटपटा रास्ता सस्ते फास्ट फूड के रूप में निकाला गया है। इस सस्ते फास्ट फूड ने एक साथ कई समस्याओं को हल कर दिया है। पहली समय न होने की, दूसरी बजट न होने की। रोड साइड फास्ट फूड न सिर्फ  आम भारतीयों के बजट में आ जाता है बल्कि वह काफी स्वादिष्ट भी होता है, जिस कारण भी भारत में फास्ट फूड की करीब करीब लत बढ़ती जा रही है। लेकिन शायद इन सब स्थितियों के बावजूद भी यह इस कदर न बढ़ता अगर एक तेज डिलीवरी सिस्टम न विकसित किया गया होता। हाल के सालों में एक इतना ही फास्ट डिलीवरी सिस्टम भी तैयार हुआ है, जिसकी वजह से इकोनामिक दरों पर यह दूर दूर तक उपलब्ध हो जा रहा है। हालांकि इसके बड़े नुकसान भी हैं जिन्हें अधिकांश भारतीय जानते भी हैं जैसे उन्हें पता है कि इससे मोटापा बढ़ रहा है। बावजूद समय, सस्ता और उपलब्धता, इन तीन वजहों से फास्ट फूड के नुकसान को जानते हुए भी अधिकांश भारतीय इसे ज्यादा से ज्यादा खाने के लिए मजबूर हैं। हालांकि डॉक्टरों से लेकर आहार विशेषज्ञ तक भारतीयों को बार-बार चेतावनी देते हैं कि कभी-कभार तो ठीक है लेकिन फास्ट फूड का ज्यादा इस्तेमाल सेहत के लिए खतरनाक है। क्योंकि इसमें एक दो नहीं बल्कि कई खतरनाक रसायन होते हैं और प्राकृतिक तत्वों की भारी कमी होती है। ये रसायन हमें कई तरह से नुकसान पहुंचाते हैं। लेकिन तमाम डॉक्टरों की चेतावनियां, इसे खाकर बीमार पड़ने की हिदायतों के बावजूद हिन्दुस्तान में फास्ट फूड के प्रति लोगों का बढ़ता आकर्षण चिंताजनक है। फूड विशेषज्ञ डॉक्टर शिखा शर्मा कहती हैं कि लोगों में फास्ट फूड के इस बढ़ते आकर्षण को रोकना ही होगा, कहीं ऐसा न हो जाए कि बहुत ज्यादा देर हो जाए। अगर ज्यादा देर हो गयी तो मुश्किल होगी क्योंकि एक समय के बाद अचानक किसी  आदत को यकायक नहीं बदला जा सकता। शायद विशेषज्ञों की यही चिंता है कि पढ़े-लिखे उपभोक्ताओं का एक बड़ा वर्ग भारत में भी अब ये मांग उठाने लगा है कि फास्ट फूड के पैकेटों पर भी ये चेतावनी मौजूद हो कि ऐसा खाना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है जैसा कि सिगरेट के पैकेट पर लिखा जाता है। लेकिन इन हिदायतों के बाद भी कोई खास फर्क पड़ेगा, इस पर शक है क्योंकि हम भारतीय खाने के बहुत शौकीन होते हैं। महीने की शुरूआत में सैलरी मिलने पर हम हमेशा अपना मनपसंद खाना, खाना चाहते हैं। भले इस लग्जरी में हम अपने सैलरी का बड़ा हिस्सा क्यों न गंवा दें।

—फ्यूचर मीडिया नेटवर्क