आर्थिक मंदी का रूप ले रही है आर्थिक सुस्ती 


अर्थ-व्यवस्था के मोर्चे पर देश को एक के बाद एक झटके लग रहे हैं। सितम्बर महीने की औद्योगिक विकास दर के आंकड़े आ गये हैं और इस महीने विकास की दर नकारात्मक रही है। इसका मतलब है कि विकास हुआ ही नहीं है, इसके उलट उद्योगों में उत्पादन कम हो गया है। पिछले साल सितंबर महीने मेें जितना औद्योगिक उत्पादन हुआ था, उससे इस साल के सितंबर में एक फीसदी से भी ज्यादा कम हो गया। यह देश के लिए बहुत ही ़खौफनाक आंकड़ा है। जब विकास दर गिर रही थी, तब कहा जा रहा था कि यह मंदी की स्थिति नहीं है, बल्कि यह सुस्ती की स्थिति है। यानी आर्थिक विकास हो रहा है, लेकिन विकास की दर कमज़ोर है, लेकिन नकारात्मक विकास दर का मतलब होता है कि विकास हो ही नहीं रहा है, बल्कि उसका उलटा हो रहा है। यह स्थिति तो सुस्ती की स्थिति नहीं कही जा सकती। यह सीधा-सीधा आर्थिक मंदी का मामला है और सरकार आर्थिक शब्दजाल से लोगों को उलझाकर नहीं रख सकती। नकारात्मक औद्योगिक विकास दर के आंकड़े आने के कुछ समय पहले ही ऑटो सेक्टर की मंदी की खबर आई थी। दोपहिया और चौपहिया वाहनों की बिक्री में गिरावट जारी है। पिछले 11 महीनों से उनकी बिक्री में लगातार कमी देखी जा रही है। यह लोगों की घटती क्रयशक्ति का संकेत है। सबसे खराब बात तो यह है कि माल ढुलाई वाले वाहनों की बिक्री भी लगातार घटती जा रही है। इन वाहनों की बिक्री में कमी आने का मतलब है कि माल ढुलाई का दबाव ट्रांसपोर्टरों पर कम हो रहा है। यह आने वाले समय के लिए एक अशुभ संकेत है। यह न सिर्फ  ऑटो सेक्टर के लिए अशुभ है, बल्कि देश के उद्योग और वाणिज्यिक जगत के लिए भी अशुभ है। आर्थिक सुस्ती के काल में माल की ढुलाई कम हो जाती है। जाहिर है ट्रांसपोर्टर ज्यादा ढुलाई का दबाव महसूस नहीं करते। सच तो यह है कि उनके पास माल ढोने वाले वाहन उनकी जरूरत से ज्यादा हो जाते हैं, फिर वे नये वाहनों की जरूरत ही महसूस नहीं करते। इसके कारण माल ढोने वाले वाहनों की बिक्री घट जाती है। हमारे देश में वही हो रहा है। औद्योगिक विकास के नकारात्मक जोन मेें चले जाना एका-एक नहीं हुआ है। इसके संकेत बहुत दिनों से मिल रहे थे। जिन वस्तुओं का इस्तेमाल औद्योगिक ईकाइयां करती हैं, उनकी वृद्धि दर लगातार घटती जा रही थी। जैसे सीमेंट की बिक्री प्रभावित हो रही थी। इस्पात उद्योग का वही हाल था। कोयला क्षेत्र भी खतरे का संकेत दे रहा था। प्राकृतिक गैस की वृद्धि दर भी कमजोर हो रही थी। और एक साथ अनेक उद्योगों का जीवन दाता रियल इस्टेट में निर्माण लगातार घटता जा रहा था। वह क्षेत्र पहले से ही बड़ी इन्वेंटरी की समस्या का सामना कर रहा है। लाखों करोड़ों रुपये के मकान अनबिके पड़े हुए हैं। उनकी कीमतें बहुत ज्यादा हैं। बाजार में इस कीमत पर उनकी मांग है ही नहीं और अगर है भी तो वह बहुत ही कमजोर है, लेकिन भवन निर्माता उनकी कीमत कम करने को तैयार ही नहीं हैं। पता नहीं, वे किस चमत्कार का इंतजार कर रहे हैं। उन्होंने विलासिता की हजारों नहीं बल्कि लाखों आवासीय ईकाइयां बना रखीं है, जिनका खरीददार नहीं मिल रहा। उनके पैसे फंसे पड़े हैं। उनके साथ-साथ बैंकों के पैसे भी उनमें पड़े हुए हैं। इसके कारण नये भवन निर्माण की संभावना कम से कमतर होती जा  रही है।सप्लाई साइड में ही नहीं, डिमांड साइड में भी इस सेक्टर में भारी समस्या है। आम्रपाली और जेपी ग्रुप जैसे बड़े-बड़े बिल्डरों और कॉलोनइजरों के कारण उच्च मध्यवर्गीय और मध्यवर्गीय परिवारों के लाखों फ्लैट सुप्रीम कोर्ट के आदेश का इंतजार कर रहे हैं। इन बिल्डरों ने काफी धांधली की। उपभोक्ताओं के पैसों का गबन कर डाला और एक बड़ा हिस्सा राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों को रिश्वत में बांट दिया। जिसके कारण मकान नहीं बन सके। उनमें से कुछ दिवालिया हो गए हैं और कुछ दिवालिया होने की राह पर हैं। लेकिन इसके कारण उपभोक्ताओं में बहुत गलत संदेश गया है। लाखों उपभोक्ताओं के हजारों करोड़ रुपये तो फंसे ही हैं और उनकी कमर लगभग टूट चुकी है और उनकी दुर्गति के कारण अब निर्माणाधीन मकानों को खरीदने की इच्छा रखने वाले अब विरले ग्राहक ही रह गए हैं। सरकार ने ग्राहकों को राहत देने और उनमें विश्वास पैदा करने के लिए रेरा जैसे कुछ कानून भी बनाए हैं, लेकिन भारत कानूनों के पालन के लिए नहीं, बल्कि कानूनों के उल्लंघन के लिए कुख्यात रहा है। इसके कारण अच्छे कानून भी ग्राहकों में विश्वास पैदा नहीं कर पा रहे हैं और मकानों की मांग बहुत कमजोर पड़ गई है, जिसके कारण भवन निर्माण सुस्त है।  एक अनुमान के अनुसार भवन निर्माण में 600 उद्योगों के उत्पादों का इस्तेमाल होता है। यदि यह सच है तो यह मानना पड़ेगा कि उन 600 उद्योगों की विकास दर को प्रभावित होना ही होना है। और यही हो रहा है। मोदी सरकार अफोर्डेबल हाउसिंग पर जोर दे रही है और इसके लिए 10 हजार करोड़ रुपये का एक कोष तैयार करने की घोषणा भी वित्तमंत्री ने की है। बैंक से लोन भी आसान शर्तों पर उपलब्ध कराए जा रहे हैं और सरकार लोन के ब्याज पर सब्सिडी भी दे रही है। इस योजना के द्वारा प्रधानमंत्री 2022 तक सभी लोगों को आवास मुहैया कराने का संकल्प दिखा रहे हैं। यह एक सकारात्मक कदम है, लेकिन यह भी हाउसिंग प्रोजेक्ट को बूस्ट करने के लिए काफी नहीं दिखाई पड़ रहा है। सच तो यह है कि बाजार की प्राकृतिक मांग में आई कमी को इस तरह के सरकारी पैबंद लगाने से भवन निर्माण क्षेत्र में कोई क्रांति नहीं आ सकती। सरकार उद्योग को बढ़ावा देने के लिए उद्योगपतियों को राहत दिए जा रही है, लेकिन समस्या मुख्य रूप से मांग के स्तर पर है, न कि आपूर्ति के स्तर पर। और मांग तभी मजबूत होगी, जब लोगों की क्रयशक्ति बढ़ेगी। क्रयशक्ति तभी बढ़ती है, जब लोगों को रोजगार मिलता है। और यहां रोज़गार के अवसर भी सिकुड़ते जा रहे हैं। रोजगार लोग भी बेरोज़गार होते जा रहे हैं, लेकिन सरकार का ध्यान इस ओर है ही नहीं। आखिर सरकार अपनी कुंभकर्णी नींद को कब त्यागेगी? (संवाद)