ऐतिहासिक व सांस्कृतिक नगरी 


ईस्ट इंडिया कम्पनी के माध्यम से कभी भारत में अंग्रेजी साम्राज्य का प्रवेशद्वार बने कोलकाता से आधुनिक नगर नियोजन का सूत्रपात हुआ था। अंग्रेजों ने इसे अपना  उप-निवेश बनाने के लिए भूमि उपयोग और भवन निर्माण का नियमन किया जो कालान्तर में अन्य स्थानों के लिए एक उदाहरण बना। कोलकाता को साहित्यिक क्रांतिकारी और कलात्मक धरोहरों के लिए जाना जाता है।दिसम्बर, 2014 में लगभग एक सप्ताह के लिए कोलकाता को करीब से देखने, समझने का अवसर मिला। कोलकाता का अपना एक विशेष ‘कल्चर’ है। कहां तो हम बचपन से यह सुनते-पढ़ते आये कि कलकत्ता जो आज सोचता है उसे सारा देश आने वाले कल सोचता है लेकिन यहां आकर अनुभव किया कि बातूनी लेकिन बेहद धीमे काम करने वाले यहां के लोग अपने ढंग से जीते हैं। बाजार आराम (देर) से खुलेगा। काम पर जाने की दिल्ली या मुंबई जैसी हड़बड़ाहट यहां के लोगों में देखने को नहीं मिलती है। कोई पहचान का व्यक्ति मिल गया तो रास्ते में हाथ पकड़े गप्प (बातचीत) करने लगेंगे। हमने अनुभव किया बंगाली में कुछ कहने को कोथा कहा जाता है। उन्हें हड़बड़ी व जल्दबाजी हर्गिज स्वीकार नहीं। काल होबे (आपका काम कल होगा) लगभग हर जगह सुनने को मिलेगा। अगर आप अधिक दबाव देंगे तो उनका जवाब तैयार है-ना होबे(आपका काम  होगा ही नहीं)। इसी तरह हाथ में बैनर पकड़े कुछ लोगों को नारे लगाते देखा जो बोल रहे थे ‘चोलबे ना, चोलबे ना’। हमें बताया गया कि वे लोग नारों के माध्यम से सरकार को चेतावनी दे रहे हैं कि उसे चलने न देंगे। वैसे बांग्ला बहुत प्यारी भाषा है। फिल्मों ने ‘आमी तोमाके भालो वासी’ को देश के कोने-कोने तक पहुंचा दिया है लेकिन कुछ शब्द हिंदी से बिलकुल विपरीत अर्थ वाले हैं। कोलकाता के कार्यक्र म में उपस्थित में हिंदी प्रेमी निलाद्री भट्टाचार्य ने मेरे वक्तव्य को भीषण सुंदर बताया तो मैं चौंका क्योंकि आमतौर पर भीषण का प्रयोग सुंदर के लिए नहीं किया जाता है। जहां तक पहनावे का प्रश्न है- महिलाएं सूती अथवा रेशमी बंगाली पहचान वाली तांत (साड़ी) पहनती हैं। वैसे बदलते दौर में कामकाजी युवतियां जींस अथवा सलवार सूट भी पहनने लगी हैं। इसी प्रकार  पुरुष पेन्ट-शर्ट पहनते हैं। खास तीज-त्यौहारों अथवा शादी-विवाह, मेल-मिलाप के अवसर पर वे भी कुर्ते के साथ सफेद धोती पहनते हैं लेकिन खास बात है कि यहां धोती का एक छोर हाथ में पकड़ कर चलने का प्रचलन है। सादगी संग उनकी बंगाली अकड़ मन को मोहती है। वैसे कोलकाता अब केवल बंगालियों का ही शहर नहीं रहा है। बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो कई पीढ़ियों से बंगाल में रह रहे हैं। भाषा-भूषा-आचरण में ये लोग किसी बंगाली से कम बंगाली नहीं कहे जा सकते। कोलकाता के मुख्य दर्शनीय स्थलों में बेलूर मठ प्रसिद्ध है जो रामकृष्ण मिशन का मुख्यालय है। इसकी स्थापना 1899 में रामकृष्ण परमहंस जी के प्रिय स्वामी विवेकानंद ने की थी। शहर के लगभग बाहरी हिस्से में हुगली के पश्चिमी तट पर बने इस मठ का 1938 में पुननिर्माण किया गया। विशाल परिसर में अनेक भवनों में मुख्य भव्य मंदिर जो चहूं ओर से रंग-बिरंगे फूलों के बगीचे से घिरा हुआ है। पत्थर का बना यह भव्य मंदिर देशी-विदेशी शैलियों का मिश्रण है।हुगली नदी के पूर्व तट पर स्थित दक्षिणेश्वर काली मंदिर 25 एकड़ में फैला हुआ है। 100 फुट ऊंचे, 46 फुट चौड़े 12 गुम्बद वाले इसी मंदिर में कभी श्री रामकृष्ण परमहंस जी पुजारी थे और इसी स्थान पर उन्हें कुछ विशेष अनुभूति हुई जिसने न केवल उनके जीवन को बदल दिया बल्कि नरेन्द्रनाथ को स्वामी विवेकानंद बना दिया जिसने भारतीय संस्कृति की कीर्ति पताका को पूरे विश्व में फहराया। बताया जाता है कि जान बाजार की महारानी रासमणि ने 1847 में इस मंदिर का निर्माण करवाया था।  एक दोपहर हम विक्टोरिया मेमोरियल  देखने गए। प्रथम नजर में यह विश्व प्रसिद्ध ताजमहल से मिलता-जुलता है। 1906-21 के बीच सर विलियम एमर्सन द्वारा निर्मित तथा महारानी विक्टोरिया को समर्पित यह स्मारक हरे-भरे मैदान और फूलों की क्यारियों से घिरा है। इसे मुगल शैली के गुंबदों को  सारसेनिक और पुनर्जागरण काल की शिल्पकला का मिश्रण कहा जा सकता है। टिकट लेकर अंदर प्रवेश होता है। यहां बहुत बड़ी संख्या में प्रेमी जोड़े आते हैं। जब हम वहां पहुंचे तो सेना का शानदार बैंड अपनी सुमधुर धुनों पर लोगों को आकर्षित कर रहा था। सोमवार को बंद रहने वाले इस मेमोरियल में एक अति विशाल और शानदार संग्रहालय है जहां महारानी विक्टोरिया से संबंधित 3000 से अधिक वस्तुएं प्रदर्शित की गई हैं। यहां हमारी मुलाकात तिब्बत के बौद्धों से हुई।मैदान और फोर्ट विलियम हुगली नदी के समीप यह भारत के सबसे बड़े पार्कों में से एक है। यह 3 वर्ग कि.मी. के क्षेत्र में फैला है। मैदान के पश्चिम में फोर्ट विलियम है। चूंकि फोर्ट विलियम को अब भारतीय सेना के लिए उपयोग में लाया जाता है, इसलिए यहां प्रवेश वर्जित है। कोलकाता के अन्य दर्शनीय स्थलों में सेंट पाल कैथेड्रल चर्च शिल्पकला का अनूठा उदाहरण है, इसकी रंगीन कांच की खिड़कियां, भित्तिचित्र, ग्रांड-आल्टर, एक गोथिक टावर दर्शनीय हैं तो एम जी रोड पर स्थित 1800 में बना मार्बल पैलेस एक अमीर बंगाली जमींदार का आवास था। यहां कुछ महत्त्वपूर्ण प्रतिमाएं और पेंटिंग हैं। सुंदर झूमर, यूरोपियन एंटीक, वेनेटियन ग्लास, पुराने पियानो और चीन के बने नीले गुलदान आपको उस समय के अमीरों की जीवनशैली की झलक देंगे। 1867 में बना पारसनाथ जैन मंदिर वेनेटियन ग्लास मोजेक, पेरिस के झूमरों और रूसेल्स, सोने का पतरा चढ़ा गुंबद, रंगीन शीशों वाली खिड़कियां और दर्पण लगे खंबों से सजा है। कोलकाता जाकर नगर की संरक्षक देवी काली को समर्पित मंदिर न जाने का अर्थ है अधूरी रही कोलकाता की यात्रा। इस अति प्राचीन मंदिर का 1809 में पुनर्निर्माण किया गया था। लंबी लाइन के बाद मंदिर में प्रवेश हुआ। मां काली की खून से लाल जिव्हा, गले में नरमुंडों की माला। कहा जाता है कि काली भगवान शिव की अर्धांगिनी, पार्वती का ही विनाशक रूप है। मां को प्रणाम कर हम आगे बढ़े। बाहर शेष भारत की तरह अव्यवस्था का बोलबाला था।हमने टैक्सी वाले से कोलकाता में देखने लायक खास स्थानों के बारे में पूछा तो उसे बोटेनिकल गार्डन के बारे में बताया। यह विशाल गार्डन कई एकड़ में फैला हुआ है। यहां का वातावरण बहुत रमणीक है। चारों तरफ हरियाली, सुंदर रंग-बिरंगे फूलों से सजी क्यारियां, प्रकृति के शरण में शाम के कुछ पल गुजारने का यह एक बहुत सुंदर स्थान है। विशेष  बात यह है कि यहीं विश्व का दूसरा सबसे बड़ा बरगद का पेड़ है। 420 शाखाओं वाला यह पेड़ लगभग 10,000 वर्ग मीटर में फैला हुआ है। सचमुच अद्भुत है यह बरगद। इसके अतिरिक्त यहां अनेक पेड़-पौधे ऐसे भी हैं जिन्हें दुर्लभ माना जा सकता है। वास्तव में शहर में ऐसे हरे भरे स्थान बहुत जरूरी हैं। इन्हें आक्सीजन देने वाले फेफड़े भी कहा जा सकता हैं। मीलों लम्बा विद्यासागर सेतु कोलकाता को हावड़ा से जोड़ता है। पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में यातायात के मुख्य साधनों में भारतीय रेल द्वारा संचालित भूमिगत रेल भी है। 1984  में आरंभ हुई यह भारत की प्रथम भूमिगत एवं मेट्रो प्रणाली थी जबकि दिल्ली मेट्रो का शुभारंभ 2002 में हुआ। मजेदार बात यह है कि दिल्ली की तरह कोलकाता में भी एक मैट्रो स्टेशन का नाम चांदनी चौक है। आधुनिकता और सुविधाओं की दृष्टि में दिल्ली मैट्रो से इसकी तुलना नहीं की जा सकती लेकिन इसका किराया काफी कम है। वैसे यहां पीली टैक्सियाँ, ट्राम ही नहीं, बसें भी सहज मिल जाती हैं। हाथ रिक्शा पर बेशक प्रतिबंध लगा दिया गया है लेकिन शहर के अनेक स्थानों पर परंपरागत रिक्शा और हाथ रिक्शा दिखाई देते हैं। आश्चर्य यह कि इनका ही नहीं, टैक्सी का किराया भी अन्य महानगरों के मुकाबले काफी कम है।

(उर्वशी)