इन्दौर के दुखांत की रौशनी मे लोगों की पहुंच से दूर होता जा रहा स्वच्छ पानी

हमारी केन्द्र सरकार और भिन्न-भिन्न राज्यों की प्रदेश सरकारें दिन-रात विकास और जन-कल्याण के दावे करती नहीं थकतीं। देश का विश्व की चौथी आर्थिकता बन जाने का भी बहुत गुणगान किया जा रहा है, परन्तु वास्तविकता यह है कि लोगों में आर्थिक असमानता भी तेज़ी से बढ़ रही है और उनके रहन-सहन के हालात में भी दिन-प्रतिदिन अवसान होता जा रहा है। शुद्ध पानी, शुद्ध हवा और शुद्ध खाद्य सामग्री लोगों की पहुंच से बाहर होती जा रही है। प्रत्येक वर्ष भारी संख्या में लोग दूषित हवा, पानी और खाद्यान्न के कारण अपनी जान गंवा बैठते हैं। इस संबंध में ताज़ा समाचार देश के सबसे साफ-स्वच्छ माने जाते मध्य प्रदेश के शहर इन्दौर से आया है। इन्दौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी पीने से फैले हैज़ा के कारण 19 लोगों की मौत हो गई। मृतकों में एक छोटा बच्चा भी शामिल है, जिसका जन्म उसके परिवार द्वारा 10 वर्ष तक मन्नतें मांगने के बाद हुआ था। सामने आई जानकारी के अनुसार पाइपों द्वारा सप्लाई किए जाने वाले पानी में सीवरेज का पानी मिल गया, जिस कारण लोगों को उल्टी-दस्त लग गए और कुछ लोगों को बुखार भी हो गया। सितम-ज़ऱीफी वाली बात यह है कि मध्य प्रदेश के हाईकोर्ट में स्थानीय प्रशासन ने दूषित पानी से मरे लोगों के तथ्यों को छिपाते हुए मात्र 4 लोगों के मरने की बात स्वीकार की है और यह भी दावा किया है कि पानी की सप्लाई में कोई खराबी नहीं है। वैसे मध्य प्रदेश की सरकार ने नगर निगम से संबंधित कुछ सरकारी अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किए हैं और कुछेक के तबादले भी किए गए हैं। मध्य प्रदेश में घटित यह कोई अकेली घटना नहीं है। इसी तरह का समाचार गुजरात की राजधानी गांधी नगर से भी आया है, जहां दूषित पानी पीने से 150 से अधिक लोग बीमार हो गए हैं। यहां सीवरेज की पाइप लाइन से लीकेज होने के कारण सीवरेज की गंदगी से पानी दूषित हो गया था।  देश के भिन्न-भिन्न भागों से अक्सर ऐसे समाचार प्राप्त होते रहते हैं। पीने वाले पानी का दूषित होना एक राष्ट्रीय मामला बन चुका है। 
एक हिन्दी दैनिक समाचार पत्र में प्रकाशित एक समाचार के अनुसार देश का 70 प्रतिशत पीने वाला पानी दूषित है। पानी की गुणवत्ता के पक्ष से 122 देशों में भारत का स्थान 120वां है। देश के लगभग 60 करोड़ लोग गम्भीर जल संकट का सामना कर रहे हैं। जल स्रोत मंत्रालय की एक रिपोर्ट पर आधारित इस समाचार में आगे और बताया गया है कि प्रत्येक वर्ष गंदा पानी पीने से देश में 2 लाख लोगों की मौत हो जाती है। इंटरनैशनल सैंटर फॉर सिस्टेनेबिलटी की विगत वर्ष की प्रकाशित एक और रिपोर्ट में यह कहा गया है कि 2030 तक भारत में पानी की मांग मौजूदा समय से दो गुना बढ़ जाएगी, जिस कारण शुद्ध पानी तो एक तरफ रहा, साधारण पानी भी लोगों को मिलना कठिन हो जाएगा। इस संकट के कारण यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि देश के जी.डी.पी. का 6 प्रतिशत तक का नुकसान हो सकता है। 2005 से 2022 के बीच देश में दूषित पानी से संबंधित बिमारियों के 20.98 करोड़ से अधिक मामले दर्ज किए गए थे। इन बीमारियों में हैज़ा, टाइफाइड, हैपेटाइटिस आदि शामिल थे। सबसे अधिक 86 प्रतिशत मामले हैज़ा के सामने आए हैं। पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश और उत्तर प्रदेश में इन बीमारियों के कारण सबसे अधिक मौतें दर्ज की गई थीं। देश में पानी के संकट का बड़ा कारण यह भी है कि भारत में विश्व की 17 प्रतिशत आबादी रहती है, परन्तु देश के पास पानी के स्रोत सिर्फ 4 प्रतिशत हैं। हमारे लिए पीने वाले पानी का संकट इसलिए भी बढ़ रहा है कि हमारी 85 प्रतिशत निर्भरता भूमिगत पानी पर ही है और इस संबंध में अब अधिक चिन्ता की बात यह है कि हमारा भू-जल भी बेहद दूषित हो चुका है। 2023 में भू-जल की गुणवत्ता का पता लगाने के लिए देश भर में 15,259 नमूने लिए गए थे। इन नमूनों पर आधारित जो रिपोर्ट सामने आई है, उसके अनुसार 19.08 प्रतिशत नमूनों में नाइट्रेट की मात्रा तय सीमा से अधिक थी। 9.04 प्रतिशत नमूनों में फ्लोराइड की मात्रा तथा 3.55 प्रतिशत नमूनों में आर्सेनिक की मात्रा तय सीमा अधिक थी और 6.60 प्रतिशत नमूनों में यूरेनियम तय सीमा से अधिक पाया गया था। 
पंजाब सहित देश के अलग-अलग राज्यों में भूमिगत पानी के दूषित होने तथा इसमें ज़हरीले रसायनों की मिलावट बढ़ने के ठोस कारण क्या हैं, चाहे इस संबंध में राष्ट्रीय स्तर पर कोई प्रवाणित रिपोर्ट सामने नहीं आई, परन्तु राज्यों के स्तर पर जो इस संबंध में जानकारियां सामने आ रही हैं, उनके अनुसार कृषि के लिए इस्तेमाल किए जा रहे कीटनाशकों, नदीननाशकों तथा रासायनिक खादों तथा इसके साथ-साथ अलग-अलग तरह के उद्योगों का प्रदूषित तथा ज़हरीला पानी नदियों-नालों में खुले रूप में डाले जाने तथा बहुत-से उद्योगों द्वारा अपना ज़हरीला तथा दूषित पानी बोरवैल करके सीधा ज़मीन के भीतर डालने के कारण ही ज़हरीले रसायन भूमिगत पानी में मिलते जा रहे हैं।
यदि केन्द्र सरकार तथा अलग-अलग राज्यों की सरकारों ने पानी के प्रदूषण के उपरोक्त कारणों को रोकने के लिए कृषि, उद्योगों तथा प्रदूषण पैदा करने वाले अन्य व्यवसायों के संबंध में प्रभावी नीतियां बना कर उनको पानी को दूषित करने से न रोका तो आगामी समय में भारत में विकास तो एक तरफ रहा, लोगों के जीवन जीने के लिए भी बड़े खतरे उत्पन्न हो जाएंगे। लगभग ऐसी स्थिति ही हमारे देश में वायु तथा खाद्य पदार्थों के दूषित या मिलावट के संबंध में भी है। समय मांग करता है कि सरकारें लोगों को शुद्ध पानी, शुद्ध हवा तथा शुद्ध खाद्य पदार्थ उपलब्ध करने के लिए प्रतिबद्ध हों और इस संबंध में ठोस नीतियां लेकर आगे आएं। निष्कर्ष यह है कि इस देश को लालच तथा स्वार्थों पर आधारित कार्पोरेट विकास माडल के स्थान पर एक वैकल्पिक जन-पक्षीय तथा प्रकृति-पक्षीय विकास माडल की ज़रूरत है।

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