नारी की नियति

नव-वर्ष के आगमन पर विगत वर्ष का अक्सर लेखा-जोखा किया जाता है। यह भी सोचा जाता है कि विगत अवधि में विश्व भर में क्या कुछ गलत हुआ है और भविष्य के लिए बीते वर्ष के घटनाक्रमों से क्या सबक लिया जा सकता है? नव वर्ष में कैसे आगे बढ़ना है, अभिप्राय: इस लेखा-जोखा में नारी की दशा संबंधी विश्लेषण भी शामिल है। भारत की बात ही करते हैं। नारी समाज का आधा भाग होता है। यह किस स्तर पर जीवन व्यतीत कर रही है, इस संबंध में निरन्तर विचार-विमर्श होता रहता है और कई बार नारी विरोधी संवेदनशील घटनाक्रम घटित होने पर चिंता भी प्रकट की जाती है।
ब्रिटिश शासन की बात तो छोड़ें, भारत को आज़ाद हुए 78 वर्ष हो गए हैं। इन वर्षों में अनेक स्तरों पर जीवन व्यतीत कर रही नारी कौन-कौन से क्षेत्रों में आगे बढ़ी है, उसने बेहतर ज़िन्दगी के लिए कितने पड़ाव पार कर लिए हैं, इसका लेखा-जोखा करते हुए विगत आठ दशकों में नारी के जीवन स्तरों में आए अनेक बदलाव देखे जा सकते हैं। किस तरह उसके जीवन में सुधार हुआ है और भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में वह कितनी उपलब्धियां प्राप्त करने में समर्थ हुई है? ऐसा सोचते हुए भारतीय नारी की उपलब्धियों पर सन्तोष प्रकट किया जाता रहा है और उसकी ओर की गईं शानदार उपलब्धियों संबंधी उसकी प्रशंसा भी की जाती रही है। भारत की आज़ादी में भी महिलाओं ने अहम योगदान डाला था। आज़ादी के बाद बने भारत के संविधान में उसे प्रत्येक पक्ष से समानता के अधिकार दिए गए थे। वह अपने वोट द्वारा राजनीतिक बदलाव लाने में भी भागीदार बनी है। सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में उसकी उपलब्धियां बहुत अहम रही हैं। श्रीमती इंदिरा गांधी लम्बी अवधि तक देश की प्रधानमंत्री बनी रहीं। विगत लम्बी अवधि से ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनी आ रही हैं। उनका उदाहरण हमारे समक्ष है। राजनीतिक क्षेत्र में नारी की उपलब्धियां व्यापक स्तर पर गिनाने योग्य रही हैं। आज भी प्रत्येक क्षेत्र में नारी के डाले गए ठोस योगदान को दृष्टिविगत नहीं किया जा सकता।
परन्तु इसके बावजूद सामाजिक स्तर पर विचरण करते हुए नारी के समक्ष दरपेश बड़ी चुनौतियों और भिन्न-भिन्न स्तरों पर उसके साथ होते अत्याचारों को भी दृष्टिविगत नहीं किया जा सकता, अपितु भेदभाव और अत्याचारों का पलड़ा आज भी भारी दिखाई देता है। आज भी समाज के एक बड़े वर्ग का नारी के प्रति दृष्टिकोण बेहद नकारात्मक बना दिखाई देता है। इसके लिए समाज में पुरुषों के साथ-साथ महिलाएं भी कुछ हद तक ज़िम्मेदार हैं। सामाजिक अपराधों पर दृष्टिपात करें तो आज भी नारी दया और बचाव की नीति पर खड़ी दिखाई देते हैं। विगत अवधि के आंकड़ों पर दृष्टिपात करें तो नारी की ऐसी बेचारगी वाला जीवन ही सामने आता है। एक आंकड़े के अनुसार विगत 5 वर्षों में 50 हज़ार से अधिक महिलाएं अपने साथ हुए तरह-तरह के अत्याचारों के कारण मौत की बलि चढ़ी हैं। इस संबंध में चाहे समय-समय पर महिलाओं की प्रत्येक तरह रक्षा के लिए कानून भी बनाये जाते रहे हैं और देश में महिलाओं के प्रति अपराध थमते न देख कर कानूनों में सख्ती भी लाई गई है परन्तु फिर भी नारी के प्रति अपराधों में कमी आती दिखाई नहीं देती। विगत वर्षों में नारी के साथ होते दुष्कर्म के अनेक समाचार सामने आए हैं, जिनमें वर्ष 2024 में कोलकाता के आर.जी. कर मैडीकल कालेज की डाक्टर के साथ हुआ दुष्कर्म, इससे भी पहले वर्ष 2012 में दिल्ली में हुआ निर्भया दुष्कर्म कांड और अब उन्नाव में वर्ष 2017 में हुए दुष्कर्म के मामले में आए अदालती फैसले के कारण यह मामला व्यापक स्तर पर पुन: चर्चा में आया है, जिसमें एक बाहुबली ने अत्याचार की सभी सीमाएं ही पार कर दी थीं। इसी तरह आज भी समाज के एक बड़े वर्ग में शादी के समय अधिक से अधिक दहेज लेने की पुरानी प्रथा को रोका नहीं जा सका, अपितु यह दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। हम इसके लिए भिन्न-भिन्न धर्मों में जारी पुरातन रीति-रिवाज़ों को भी दोषी मानते हैं, जिनसे कट्टर धार्मिक जुनूनी पीछे हटने के लिए तैयार नहीं हैं। इसलिए एक बड़े वर्ग द्वारा लड़की के जन्म लेने को आज भी एक बोझ माना जाता है।
एक अनुमान के अनुसार आज भी दुष्कर्म और दहेज से संबंधित मामलों के कारण देश में प्रत्येक वर्ष 60 हज़ार से अधिक महिलाओं की मृत्यु होती है। आज भी यह रुझान सरकारों के लिए एक बड़ी चिन्ता का कारण बना हुआ है। समाज में प्रचलित इन कुरीतियों पर कैसे काबू पाया जा सके, इसके लिए प्रत्येक स्तर पर स्वयं-सेवी संस्थाओं को बड़े आन्दोलन चलाने की ज़रूरत होगी, जो सदियों से चली आ रही पुरुष प्रधानता वाली मानसिकता को बदलने में सहायक हो सकें। नि:संदेह समूचे रूप में आज भी नारी को अपना जीवन जीने और पुरुष समाज के अत्याचारों से छुटकारा पाने के लिए लम्बे संघर्ष की ज़रूरत होगी।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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