व्यसन बनते सोशल मीडिया को सकारात्मक दिशा कब ?

सोशल मीडिया आज की आवश्यकता है या विवशता, शौक है या व्यसन, ज्ञान के विस्तार का माध्यम है या ठगी का जाल, व्यापार का उन्नायक है या सामाजिक गतिविधियों का काल, समाज में अशान्ति उत्पन्न करने का माध्यम है या  सूचना की तीव्रतम विस्तार का प्लेटफार्म, इन या ऐसी ही तमाम बातों पर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि सोशल मीडिया ने हमारे जीवन का अंग बन चुका है। यह कम आश्चर्य की बात नहीं कि 2004 में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के एक छात्र मार्क जुकरबर्ग ने अपने साथी छात्रों के साथ जुड़ने के लिए जिस फेसबुक का निर्माण किया था, वह आज पूरे विश्व को जोड़ने का कार्य कर रहा है। 
आज सोशल मीडिया के प्रति दीवानगी का आलम यह है कि लगभग प्रत्येक व्यक्ति इससे जुड़ा है। सुबह के अभिवादन से शुरु होकर अपने हर सामाजिक (सोशल) दायित्व का निर्वहन सोशल मीडिया पर ही किया जाता है। अपने परिवेश की हर घटना-दुर्घटना की जानकारी सबसे पहले सोशल मीडिया पर डालने का चलन इतना बढ़ गया कि बहुत-से लोग व्यसनी प्रतीत होने लगते हैं। 
दिसम्बर 2012 में भारत में आरंभ हुए सोशल मीडिया ने बहुत तेज़ी से अपनी पकड़ बनाई। आज समाज के हर क्षेत्र को प्रभावित करने वाले सोशल मीडिया का भरपूर दोहन करने में राजनीति से व्यापार तक, विज्ञापन से ठगी का जाल फैलाने पर भरपूर इस्तेमाल किया जा रहा है। कभी भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन को इसी सोशल मीडिया ने हवा की तरह फैला दिया था, लेकिन नकली आईडी से ठगी, ब्लैकमैलिंग आदि करने वाले भी इसी सोशल मीडिया पर खूब फलफूल रहे है। 
सोशल मीडिया पर आमतौर पर यह आरोप लगाया जाता है कि इसने समाज को अपनी मज़बूत गिरफ्त में ले लिया है। आज घर से सार्वजनिक स्थान, बस से ट्रेन और मेट्रो, पार्क से प्लेटफार्म, विश्वविद्यालय से स्टेडियम तक मोबाइल पर आंखे गढ़ाये लोगों के समूह देखे जा सकते है। घर में परिवार के सदस्यों का आपसी संवाद व्हाट्सएप के माध्यम से होने लगे तो माना जा सकता है कि पुराने परंपरागत लत से भिन्न सोशल मीडिया की लत कम घातक नहीं है। इसने युवा पीढ़ी को कला, साहित्य जैसे संस्कृति के विभिन्न आयामों से विमुख कर दिया है। प्रथम दृष्टया यह आरोप सही प्रतीत होता है।
 जिसे देखो वही सोशल मीडिया पर प्रदर्शित करने के लिए रील बनाते हुए समाज की परंपराओं और संस्कारों को भी विकृत रूप से प्रस्तुत कर रहा है। द्विअर्थी, अनर्गल को महिमा मंडित करती रील्स पर शर्मिंदगी महसूस करने की बजाय गर्व करने वालों की संख्या बढ़ रही है। इस बात से इन्कार नहीं है कि सोशल मीडिया ने समाज को कुछ दिया है, लेकिन कुंठित लोगों द्वारा इसका भरपूर दुरुपयोग किया जा रहा है। समाजशास्त्री लगातार विचार कर रहे हैं कि ऐसा क्या किया जाये कि सोशल मीडिया की आभासी दुनिया को असली दुनिया की ओर कैसे ले जाया जाये। इसी कड़ी में यह समाचार कुछ राहत प्रदान करता है कि कर्नाटक के हलगा गांव में रोज शाम 7 बजे सायरन बजते ही टीवी-मोबाइल बंद हो जाते हैं। दो घंटे का ‘डिजिटल ऑफ’ बच्चों की पढ़ाई और परिवार को समय देने के लिए सुनिश्चित किया गया है जो कि एक बेहतरीन कदम है। सप्ताह में एक दिन उपवास की परंपरा भारत के लगभग सभी प्रदेशों और समाजों में रही है। क्या सप्ताह में एक दिन इंटरनेट उपवास पर विचार नहीं किया जाना चाहिए? दूसरी ओर ऑनलाइन सुविधाओं और डिजिटल लेन-देन का प्रचलन बढ़ा है, इसलिए स्मार्टफोन और इंटरनेट से दूर रहने का आह्वान नहीं अपितु सोशल मीडिया के उपयोग को सीमित कर अपने बच्चों और युवाओं को खेल-कूद तथा संस्कृति गतिविधियों में सहभागिता के लिए प्रेरित करने तथा समाज में प्रत्यक्ष संवाद के लिए इस प्रकार के सभी संभव विकल्पों पर विचार क्यों नहीं करना चाहिए। (अदिति)

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