कल्पवास : आत्म-शुद्धि  की जीवन्त परम्परा

भारतीय आध्यात्मिक परम्परा में कल्पवास एक ऐसा व्रत है, जहां समय नहीं, संयम बोलता है और जहां आस्था अनुशासन बनकर जीवन का मार्गदर्शन करती है। प्रयागराज के पावन संगम गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के मिलन-स्थल पर माघ मास में किया जाने वाला कल्पवास आत्म-शुद्धि, तप और अंतर्मुखी साधना की एक जीवंत परम्परा है। एक माह तक संगम तट पर निवास कर पवित्र स्नान करना केवल धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि जीवन को पुन: परिभाषित करने का अवसर भी है।
कल्पवास का सार साधारण जीवन में छिपा है। कल्पवासी सांसारिक आकर्षणों से दूरी बनाकर सीमित साधनों में रहना सीखते हैं। प्रात: ब्रह्म-मुहूर्त में संगम-स्नान, फिर जप-तप, ध्यान, सत्संग और धर्मग्रंथों का अध्ययन यह दिनचर्या मन को स्थिरता और आत्मा को शांति प्रदान करती है। माघ की ठंडी सुबहों में संगम की जलधारा में उतरना श्रद्धा के साथ-साथ दृढ़ संकल्प की भी परीक्षा होती है।
माघ मेला और कुंभ के समय कल्पवास का स्वरूप और अधिक व्यापक हो जाता है। देश-विदेश से आए लाखों श्रद्धालु संगम तट पर अस्थायी कुटीरों में रह कर एक समान उद्देश्य के साथ साधना करते हैं। यहां सामाजिक भेद मिट जाते हैं और सभी कल्पवासी अनुशासन, सादगी और सेवा के सूत्र में बंध जाते हैं। यही सामूहिक चेतना कल्पवास को व्यक्तिगत व्रत से आगे बढ़ाकर सामाजिक साधना बना देती है। 3 जनवरी से शुरू प्रयागराज माघी मेला 15 फरवरी तक चलेगा।
कल्पवास केवल स्नान और निवास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्म-संयम की कठोर पाठशाला है। भूमि पर शयन, अल्प एवं सात्विक भोजन, इंद्रिय-निग्रह, सत्यव्रत और दान-पुण्य ये सभी नियम व्यक्ति को भीतर से परिष्कृत करते हैं। शास्त्रों में वर्णित है कि माघ मास में संगम तट पर किए गए तप और दान का पुण्य अनेक यज्ञों के फल के समान माना गया है। आज के तेज़ रफ्तार और भौतिकता-प्रधान युग में कल्पवास एक मौन संदेश देता है कि वास्तविक समृद्धि बाहरी संग्रह में नहीं, आंतरिक संतुलन में है। संगम की रेत पर बिताया गया यह एक माह मनुष्य को उसके मूल से जोड़ देता है, सोच को शुद्ध करता है और जीवन को नई दृष्टि देता है। यही कारण है कि कल्पवास आज भी भारतीय अध्यात्म की जीवंत परम्परा बना हुआ है, यह एक ऐसी साधना है जो मनुष्य को दुनिया से अलग नहीं, बल्कि स्वयं से जोड़ती है।
 

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