2025 के अंतिम दिनों की खट्टी-मीठी यादें

आज की बात साइबर अपराध के ठगों से शुरू करते हैं। लगभग तीन वर्ष पहले इन्होंने मुझसे चार लाख तीस हज़ार रुपये ठग लिए थे और मेरे जानकार शाम सिंह अंग-संग से डेढ़ लाख ठगने वाले वकील भी बन गए थे।
अब तो इन ठगों में महिलाएं भी शामिल हो गई हैं, जो स्वयं को सुपरिटैंडैंट पुलिस बताती हैं और अपकी हमदर्द बन कर स्वयं को एंटी-टैरेरिज़्म स्क्वैड की कार्यकर्ता कह कर बात शुरू करती हैं। अक्सर यह कह कर आपको डराया जाता है कि आपके मोबाइल फोन से पाकिस्तान के सैन्य अधिकारियों को भारत के बारे में गुप्त जानकारी भेजी जा रही है, जो देश को तबाह कर सकती है। मुझे डराने वाली ने खुद को एस.पी. मेहता बताया तथा वह चाहती थी कि मैं पुणे में उनके मुख्य कार्यालय से सम्पर्क करूं और उस कार्यालय का प्रमुख मुझे इस केस से बचाने का मार्ग बता देगा। 
इस घटना ने मुझसे चार लाख तीस हज़ार रुपये ठगने वाला पुराना ठग याद करवा दिया। 
मैंने अपने थाने के पुलिस इंस्पैक्टर राम दयाल का फोन मिलाया तो वह तुरंत मेरे घर आ गया। मैंने उसे सारी कहानी सुनाने के बाद यह भी बताया कि मैं जाली एस.पी. को कह चुका हूं कि वह मुझे गिरफ्तार करने के लिए लोगों को भेज दे, मैं उनका इंतज़ार कर रहा हूं। राम दयाल ने मेरी हां में हां मिलाई तथा यह भी कहा कि फिर  ऐसी कॉल आए तो उसे फटकार लगा देना। इन लोगों ने गलत तरीके से कमाई का तरीका ढूंढ लिया है। उसने यह भी कहा कि मैं ये घटना अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाऊं ताकि पढ़ने-सुनने वाले इन ठगों से सावधान रहें।
24 दिसम्बर, 2025 को मेरी पत्नी ने दिल्ली जाना था कि 23 दिसम्बर को चोट लग गई। उसे अस्पताल दाखिल करवाना पड़ा। अप्रेशन करके टूटी हुई हड्डी तो जोड़ दी है, परन्तु अब माह-डेढ़ माह चलना मना है। दिल्ली तो क्या अपने घर का गेट भी पार नहीं कर सकती। 
अब मीठी बातों की ओर लौटते हैं। सबसे अच्छी बात तो पुरानी है, परन्तु मेरी जानकारी में अब आई है। सैंट्रल बोर्ड ऑफ सैकेंडरी एजुकेशन ने 12वीं के पंजाबी पाठ्यक्रम में पंजाबी संस्कृति की जान-पहचान वाला भाग भी रखा है। इसमें मेरा लेख ‘पंजाब दे रस्म-रिवाज़’ भी शामिल है और कहानियों वाले भाग में मेरी कहानी ‘घर जा आपणे’ भी। इस भाग में करतार सिंह दुग्गल तथा सुजान सिंह का शामिल होना मेरे लिए गर्व की बात है, जिनकी कहानियां मेरी शिक्षा प्राप्ति के समय मेरे पाठ्यक्रम का हिस्सा थीं। पंजाबी अनिवार्य के कविता भाग में शामिल कवि भाई वीर सिंह, प्रो. मोहन सिंह, नंद लाल नूरपुरी, अमृता प्रीतम, हरिभजन सिंह तथा शिव कुमार बटालवी जैसी उच्च शख्सियतें हैं, जिनकी शमूलियत ने मेरे सिर की कलगी और भी ऊंची कर दी है, क्या कहने! मेरे लिए तो यह बड़ी बात है कि पंजाबी अनिवार्य को दिशा देने वाली जो पुस्तक तैयार की गई है, उसमें लेखकों के जन्मदिन, जन्म स्थान तथा व्यवसाय ही नहीं दिए गए, उनके माता-पिता के नाम भी लिखे हुए हैं। प्रमाण के रूप में मेरी जानकारी देते समय मुझे ‘हरी सिंह जी के घर श्रीमती गुरचरण कौर की कोख से पैदा हुआ’ लिखा गया है। काश, यह जानकारी मेरे माता-पिता के जीवित रहते प्रकाशित हुई होती। इस पुस्तक में उन दोनों का नाम एक-दूसरे के बराबर प्रकाशित होना नई तथा बड़ी बात है। 
2025 के अंतिम दिनों की एक और मीठी बात लाहौर निवासी प्रोफैसर मुहम्मद अमानत अली मुसाबर का उर्दू तथा पंजाबी भाषा की जानकारी वाला कायदा मेरे हाथ लगना है जिसमें ‘म’ अक्षर समझाने के लिए गुरमुखी तथा शाहमुखी में मौलवी तथा महाराज लिख कर मोर का चित्र बना मिलता है। ‘ब’ अक्षर समझाने के लिए बावा तथा बादल लिख कर बापू दर्शाने के लिए मेरी फोटो तथा ‘श’ समझाने के लिए शुक्रिया और शहीद लिख कर शेर-ए-पंजाब महाराजा रणजीत सिंह का चित्र बनाया गया है। कायदे का मुखबंद लेखक लाल सिंह सलहानी इस भावना को शेख बाबा फरीद तथा गुरु नानक देव जी की अद्वितीय साझ लिख कर उसे मातृ भाषा पंजाबी का शौदाई बताता है और आशा करता है कि यह भावना आर-पार की दूरियां मिटाने का कारण बनेगी, आज नहीं तो कल! बड़ी बात यह कि पाकिस्तान के पाठक मेरे चित्र को महाराजा रणजीत सिंह के चित्र की तरह देखेंगे।
जाते-जाते यह भी बता दूं कि 1, 2 तथा 3 फरवरी, 2026 को श्री गुरु  गोबिन्द सिंह खालसा कालेज माहिलपुर (जहां का में विद्यार्थी था) में पहली बार एक ऐसा उत्सव करवाया जा रहा है, जहां पुस्तक प्रदर्शनी भी होगी, कलाकारों की पेशकारियां भी। वहां मेरे जैसे और कौन शामिल होंगे, यह समय बताएगा। प्रिंसीपल परविन्दर सिंह का उत्साह प्रशंसा का हकदार है। 
अंतिका 
(गुरनाम)
हद में चले सो औलीआ
अनहद चले सो पीर
हद अनदह दोनों चले
सो है बड़ा फकीर 
ई.मेल- : sandhugulzar@yahoo.com

#2025 के अंतिम दिनों की खट्टी-मीठी यादें