अरावली पर्वतमाला की प्राकृतिक संरचना बचे रहने की उम्मीद
अरावली पर्वतमाला केस में उच्चतम न्यायालय ने पुनर्विचार कर अपने ही आदेश पर रोक का जो निर्णय दिया है, वह स्वागतयोग्य और उम्मीद जगाने वाला है। अरावली पर्वतमाला और इससे पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के नष्ट होने का जो खतरा जनमानस के मन मस्तिष्क पर मंडरा रहा था, वह भी दूर हो जाएगा, यह उम्मीद की जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों की संशोधित परिभाषा को लेकर पर्यावरण समूहों और सामाजिक संगठनों व नागरिक द्वारा उठाई गई चिंताओं और सार्वजनिक विरोध के बाद स्वत: संज्ञान लिया था। अरावली क्षेत्र अपनी पारिस्थितिक अहमियत के लिए जाना जाता है। बताया जाता है कि विशेष तौर पर मरुस्थलीकरण को रोकने और भूजल स्तर बनाए रखने में इसकी भूमिका अहम है।
यह आशंका जताई गई थी कि परिभाषा को कमज़ोर किए जाने से उन क्षेत्रों में खनन और निर्माण गतिविधियों को वैधता मिल सकती है, जिन्हें पहले संरक्षित माना जाता था। यह मुद्दा दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में अरावली पहाड़ियों और अरावली पर्वतमाला की अलग-अलग परिभाषाओं के कारण उत्पन्न हुआ था, जिससे नियामकीय खामियां और अवैध खनन के मामले सामने आए। इन असंगतियों को दूर करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पहले एक उच्चस्तरीय समिति गठित की थी।
सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित कमेटी और भारतीय वन पर्यावरण मंत्रालय की सिफारिशों को स्वीकार कर केवल सौ मीटर से ऊंची पहाड़ियों को ही अरावली पर्वतमाला का हिस्सा मानने की परिभाषा दे दी थी। समिति ने सिफारिश की थी कि ‘अरावली पहाड़ी’ को नामित अरावली ज़िलों में स्थित किसी भी ऐसे भू-आकृतिक स्वरूप के रूप में परिभाषित किया जाए, जिसकी ऊंचाई स्थानीय भू-आकृति से 100 मीटर या उससे अधिक हो, और ‘अरावली पर्वतमाला’ ऐसी दो या अधिक पहाड़ियों का समूह होगी, जो एक-दूसरे से 500 मीटर के भीतर स्थित हों।
सब जानते हैं कि अरावली पर्वतमाला पारिस्थितिकी संतुलन में अहम भूमिका निभाती रही है। अरावली करीब दो अरब वर्ष पुरानी भू-वैज्ञानिक प्रणाली है, जो भूजल भरण को नियंत्रित करती है, मरुस्थलीकरण को रोकती है, जलवायु को संतुलित करती है और उत्तर-पश्चिम भारत में लाखों लोगों की आजीविका का सहारा है। इसे केवल ऊंचाई आधारित नियम से परिभाषित करना न केवल वैज्ञानिक रूप से गलत था, बल्कि पारिस्थितिकीय रूप से भी खतरनाक था।
पिछले सवा महीने से छात्र, आमजन, नेता, सामाजिक कार्यकर्ता, वैज्ञानिक, पर्यावरणविद् और पर्यावरण प्रेमी सभी अरावली की नई परिभाषा के विरोध में सड़कों पर उतर आए थे। यह आशंका जताई गई थी कि परिभाषा को कमज़ोर किए जाने से उन क्षेत्रों में खनन और निर्माण गतिविधियों को वैधता मिल सकती है, जिन्हें पहले संरक्षित माना जाता था। ताज़ा निर्णय में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि अरावली मुद्दे की व्यापक और समग्र जांच के लिए क्षेत्र विशेषज्ञों वाली एक उच्चस्तरीय समिति गठित करने का प्रस्ताव रखा। इसका मतलब है कि अब इस मामले को सुलझाने के लिए ऐसे लोगों को शामिल किया जाएगा जिन्हें इस क्षेत्र की पूरी जानकारी है।
केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने स्पष्ट कहा है कि जब तक सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत और उसकी ओर से मंजूर की गयी नीतियों के तहत अरावली के संरक्षण और खनन के लिए नये क्षेत्रों की पहचान नहीं हो जाती, तब तक यह प्रतिबंध लागू रहेगा। मंत्रालय का यह निर्देश इसलिए भी बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि केंद्र सरकार पर आरोप लग रहा था कि अरावली के बड़े क्षेत्र में खनन की अनुमति दिये जाने के लिए ही उसने अरावली की नयी परिभाषा बनायी है।
इसी तरह केंद्र ने आइसीएफआरइ (इंडियन काउंसिल ऑफ फारेस्ट्री रिसर्च एंड एजुकेशन) को यह निर्देश दिया है कि वह पूरे अरावली क्षेत्र में अतिरिक्त इलाकों की पहचान करें, जहां खनन पूरी तरह प्रतिबंधित हो। यह उन इलाकों के अलावा होगा, जहां पहले से रोक लगी हुई है. आइसीएफआरइ को पूरे अरावली क्षेत्र के लिए एक वैज्ञानिक और व्यापक टिकाऊ खनन प्रबंधन योजना (एमपीएसएम) योजना भी तैयार करनी है, जिसमें पर्यावरण पर कुल प्रभाव का आकलन, संवेदनशील इलाकों की पहचान तथा खनन की वहन क्षमता का अध्ययन शामिल होगा। वैज्ञानिक आधार पर तैयार होने वाली यह योजना कुल पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन करेगी। योजना पूरी हो जाने के बाद उसे सार्वजनिक किया जायेगा, ताकि सभी पक्षकारों से सुझाव लिये जा सकें। इससे अरावली में संरक्षित क्षेत्र और बड़ा होगा।
प्रकृति अपना संतुलन खोने लग जाए तो यह मानव जीवन के लिए बड़े संकट का कारण बन जाता है। अरावली की पहाड़ियों को जैव विविधता की रीढ़ कहा जा सकता है। समूचा अरावली क्षेत्र वन्यजीवों की आवाजाही वाला भी है। ऐसे में यह भी समझा जा सकता है कि खनन और अन्य मानवीय गतिविधियों को अनुमति वन्यजीवों के लिए भी खतरे की घंटी बन सकती थी। आरोप तो यह भी लगाए जा रहे हैं कि पिछली समिति ने न केवल अरावली से जुड़े वैज्ञानिक और वास्तविक तथ्यों की, बल्कि जनभावना की भी अनदेखी की।
सुप्रीम कोर्ट ने कुछ विशिष्ट चिंताओं को नोट किया और कहा कि इनकी जांच ज़रूरी है। इनमें यह सवाल शामिल है कि क्या पहाड़ियों के बीच 500 मीटर के अंतराल वाले क्षेत्रों में नियंत्रित खनन की अनुमति दी जाएगी, और यदि हां, तो ऐसे कौन-से सटीक संरचनात्मक मानक अपनाए जाएंगे, ताकि पारिस्थितिक निरंतरता प्रभावित न हो। अदालत ने कहा कि यह भी तय किया जाना चाहिए कि यह आशंका कि 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1,048 ही 100 मीटर की ऊंचाई की सीमा को पूरा करती हैं। तथ्यात्मक और वैज्ञानिक रूप से सही है या नहीं? और क्या इसके लिए भू-वैज्ञानिक जांच की आवश्यकता है?
ज़ाहिर है, अरावली क्षेत्र के व्यापक पर्यावरणीय महत्व को देखते हुए केंद्र सरकार ने इसकी सुरक्षा के लिए पूरी प्रतिबद्धता दिखाई है। पूरे अरावली क्षेत्र में अब कोई नयी खदान नहीं खोदी जायेगी, संरक्षित क्षेत्र बढ़ाने के साथ-साथ पर्यावरणीय दृष्टि से टिकाऊ खनन योजना बनायी जायेगी तथा चल रही खदानों पर सख्त पर्यावरणीय नियम लागू होंगे। इसमें कोई संदेह नहीं कि अरावली में खनन की गतिविधियां प्रतिबंधित होने से राजस्व का नुकसान हो रहा है और रोज़गार भी प्रभावित हो रहे हैं, लेकिन राजस्व से ज्यादा अरावली जीवन से जुड़ा मुद्दा है और जीवन से जुड़े मुद्दों पर समझौता करना आत्मघाती ही होगा। अवैध खनन की बढ़ती समस्या को देखते हुए सरकार द्वारा लिए गये निर्णय से अरावली की प्राकृतिक संरचना के बचे रहने की उम्मीद है। इससे पर्यावरण की रक्षा के साथ स्थानीय समुदायों को भी फायदा पहुंचेगा, जो लंबे समय से प्रदूषण और भूमि क्षरण से जूझ रहे हैं।



