दिखाई नहीं दे रहा कांग्रेस के ‘मनरेगा बचाओ’ आन्दोलन का प्रभाव

कांग्रेस पार्टी ने काफी सोच-विचार कर और योजना बना कर पिछले महीने ‘मनरेगा बचाओ’ आन्दोलन शुरू किया था। यह आन्दोलन शुरू होने से पहले राहुल गांधी ने कई बार कहा कि जिस तरह से केंद्र सरकार के तीन विवादास्पद कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों ने एकजुट होकर आन्दोलन किया था, उसी तरह मनरेगा को समाप्त करके ‘वीबी-जी ग्राम जी’ कानून लाने के खिलाफ मज़दूर एकजुट होंगे। राहुल का दावा है कि केंद्र सरकार को यह कानून भी वापस लेना होगा, जैसे उसने कृषि कानून वापस लिए थे। लेकिन सवाल है कि क्या इन कानून को वापस लेने के लिए उसी तरह का आन्दोलन हो रहा है, जैसा किसानों ने किया था? हज़ारों किसानों ने कड़ी सर्दी, गर्मी और बरसात का सामना करते एक साल तक दिल्ली की घेराबंदी करके रखी थी। उस दौरान सैकड़ों किसानों की जान गई थी। तब सरकार ने वह कानून वापस लिया था, लेकिन मनरेगा को खत्म करने के खिलाफ कांग्रेस जो आन्दोलन कर रही है, वह कहीं दिख नहीं रहा है। 10 जनवरी से शुरू हुआ आन्दोलन 15 फरवरी तक चलना था, लेकिन एक महीना पूरा होने से पहले ही इसकी चर्चा बंद हो गई है। शुरू में कुछ दिन तो कांग्रेस के नेताओं ने ज़िला मुख्यालयों आदि में प्रदर्शन वगैरह किया, लेकिन अब वह भी बंद है। अगर राहुल गांधी चाहते हैं कि नया कानून वापस हो तो इस तरह ढीले अभियान से वह नहीं हो पाएगा। इसके लिए सुनियोजित आन्दोलन की ज़रूरत है। 
भाजपा ने भी तो हमेशा अखबार उछाले थे
लोकसभा में गत सोमवार को बड़ा विवाद हुआ कि राहुल गांधी कैसे एक अप्रकाशित किताब के अंश पढ़ कर मुद्दा उठा रहे हैं। संसद के कामकाज के नियम 349 के हवाले से कहा गया कि संसद में किसी अप्रकाशित किताब या अखबार या पत्रिका की कतरन के आधार पर चर्चा नहीं की जा सकती। हालांकि स्पीकर ओम बिरला को यह कहते भी सुना गया कि किसी भी किताब या अखबार के आधार पर मुद्दे नहीं उठाए जा सकते। राहुल लगभग 45 मिनट तक बोलने का प्रयास करने के बाद इतने निराश हो गए कि उन्होंने तंज़ करके स्पीकर से पूछा कि वह बता दें कि नेता प्रतिपक्ष को क्या बोलना चाहिए। हैरानी की बात है कि पत्रिका और किताब के आधार पर मुद्दे उठाने से रोकने की कोशिश कर रही भाजपा ने विपक्ष में रहते सबसे ज्यादा राजनीति इसी आधार पर की है। इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के समय से लेकर नरसिंहराव और मनमोहन सिह के समय तक भाजपा के नेता अक्सर अखबारों में प्रकाशित खबरों के हवाले से संसद में हंगामा करते थे। बोफोर्स का मामला तो स्वीडिश रेडियो ने खोला था और उसके बाद अखबारों ने वह मुद्दा उठाया था। उस समय भाजपा और दूसरी विपक्षी पार्टियों ने लगातार अखबारों में और खासकर इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित खबरों के आधार पर संसद में मुद्दे उठाए थे। नरसिंहराव और मनमोहन सिंह के समय भी तमाम कथित घोटाले अखबारों में छपी खबरों के आधार पर ही संसद में उठाए गए थे, लेकिन अब भाजपा को पत्रिकाओं और किताबों से समस्या है।
नकदी बांटने की योजनाएं कब तक?
इस बार के आम बजट और उससे पहले आए आर्थिक सर्वेक्षण के दौरान इस बात पर खूब चर्चा हुई है कि नकदी बांटने की योजनाएं कब तक चलती रहेंगी। आर्थिक सर्वेक्षण में वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने इसके आंकड़े दिए हैं। हालांकि एक साल पहले आर्थिक सर्वेक्षण में इस किस्म की योजनाओं की तारीफ की गई थी, लेकिन इस बार यह चिंता जताई गई है कि इस किस्म की योजनाओं से राजकोष पर बहुत बोझ बढ़ रहा है और बुनियादी ढांचे के विकास के साथ-साथ सामाजिक विकास की अनेक योजनाओं पर बुरा असर पड़ रहा है। असल में एक अनुमान के मुताबिक देश की कई राज्य सरकारें मिल कर सिर्फ  महिलाओं के लिए शुरू की गई योजनाओं में हर साल दो लाख करोड़ रुपए बांट रही हैं। अभी कई राज्यों ने ऐसी योजना शुरू नहीं की है। अगर देश के सभी राज्य ऐसी योजना शुरू कर दे तो यह राशि चार लाख करोड़ रुपए तक पहुंच सकती है। महिलाओं के अलावा दूसरे कई और समूहों को भी नकद पैसे दिए जा रहे हैं। इसीलिए अब इस बात पर चर्चा शुरू हो गई है कि योजना की घोषणा के साथ ही उसके समाप्त होने की समय सीमा भी तय कर दोनी चाहिए। नकद बांटने की योजना को अनंतकाल तक चलाए रखना देश के लिए ठीक नहीं है।
जनगणना में भी आएगी समस्या! 
मतदाता सूचियों को विशेष गहन पुनरीक्षण तो अभी तक संदेह और विवादों के घेरे में है ही और अब जनगणना को लेकर भी एक महत्वपूर्ण सवाल सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया है। एक याचिका दायर की गई है, जिसमें कहा गया है कि जाति जनगणना के लिए जाति को प्रमाणित करने वाला प्रमाण-पत्र अनिवार्य किया जाना चाहिए। याचिका में कहा गया है कि जाति गणना के लिए स्व-घोषणा पत्र पर्याप्त नहीं है, क्योंकि इससे कुछ जातियों के आंकड़े असाधारण रूप से ज्यादा और कुछ के कम हो सकते हैं। इसलिए ऑनलाइन जनगणना फॉर्म भरने के समय भी कोई दस्तावेज़ अनिवार्य किया जाना चाहिए। अगर कोई दस्तावेज अनिवार्य किया जाता है तो उसमें निर्धारित से ज्यादा समय लगेगा। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका में उठाए गए बिंदुओं से सहमति जताई है। सर्वोच्च अदालत ने याचिकाकर्ता आकाश गोयल की तारीफ की है कि उन्होंने यह मुद्दा उठाया और अदालत का ध्यान इस ओर खींचा। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की और याचिका में उठाए गए बिंदुओं से सैद्धांतिक सहमति जताई। अदालत को भी लग रहा है कि अगर कोई दस्तावेज़ अनिवार्य नहीं किया गया तो संतुलन बिगड़ सकता है। हालांकि अभी अदालत ने मामला जनगणना करने वाली संस्था पर छोड़ा है, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि अगर कोई प्रमाण-पत्र नहीं लिया जाएगा तो आंकड़ों की शुद्धता की गारंटी नहीं हो सकेगी।
ममता बनर्जी क्या अब भी अकेले चलेंगी? 
संसद के बजट सत्र में विपक्षी पार्टियों के बीच कमाल की एकजुटता बनी है। विपक्ष की ज्यादातर पार्टियां राहुल गांधी के साथ खड़ी है और उनके उठाए मुद्दों का समर्थन कर रही है। हालांकि तृणमूल कांग्रेस के सांसद अब भी अलग मुद्दा उठाए हुए हैं। इसका तात्कालिक कारण ममता बनर्जी का दिल्ली पहुंचा रहा। दो फरवरी को उन्हें चुनाव आयोग से मिलना था, जहां उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त को खूब आड़े हाथों लिया। अगले दिन तीन फरवरी को प्रैस कॉन्फ्रैंस करके भी सरकार और चुनाव आयोग को घेरा। फिर सुप्रीम कोर्ट में पेश हुईं। उनका दावा है कि पश्चिम बंगाल में एसआईआर के ज़रिये लाखों वास्तविक मतदाताओं के नाम काटे जा रहे हैं। हालांकि राहुल गांधी ने इस मसले पर चुप्पी साधी है। दरअसल कांग्रेस को पता है कि पश्चिम बंगाल में उसका बहुत कुछ दांव पर नहीं है। इसलिए उसके नेता एसआईआर का मुद्दा नहीं उठा रहे हैं। कांग्रेस के नेताओं को शिकायत है कि ममता बनर्जी जान बूझकर राहुल गांधी की अनदेखी करती हैं। राहुल जो मुद्दे उठाते हैं, उन पर वह चुप रह जाती हैं। इसके साथ ही बंगाल के बाहर दूसरे राज्यों में भी कांग्रेस के हितों को नुकसान पहुंचाने के लिए ममता बनर्जी काम करती है। इसीलिए कांग्रेस चुप है। अब तृणमूल के नेता चाहते हैं कि किसी तरह से संसद सत्र के दौरान कांग्रेस को तैयार किया जाए कि वह एसआईआर के मुद्दे पर बोले। यह तभी होगा, जब ममता बनर्जी कांग्रेस और राहुल के मुद्दों का समर्थन करेंगी।

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