स्पष्ट नीति और कड़ा रवैया अपनाने की ज़रूरत
आज अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर स्थिति इस प्रकार जटिल बनी हुई है, जिसमें किसी भी देश के लिए अपने रवैये को स्पष्ट करना और क्रियात्मक रूप में अपने विचारों पर चलने को प्राथमिकता देना बेहद कठिन प्रतीत होता है। देश की आज़ादी के बाद एवं पाकिस्तान के अस्तित्व में आने के उपरांत भारत ने अपनी आंतरिक समस्याओं के प्रति कशमकश के बावजूद अपने अन्तर्राष्ट्रीय प्रभाव को लगातार बढ़ाया है। भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने उस समय दो भागों में विभाजित दुनिया के होते हुए भी किसी एक पार्टी का पक्ष लेने की बजाय गुट-निरपेक्षता की नीति पर डट कर पहरा दिया था। उस समय इसके साथ तत्कालीन यूगोस्लाविया और मिस्र के वरिष्ठ नेता जोसिप ब्रोज़ टीटो और कर्नल नासिर भी शामिल थे और दोनों ही पक्षों ने इस नीति को स्वीकार किया और इसके साथ-साथ पंडित नेहरू ने तत्कालीन सोवियत यूनियन, जो उस समय एक बड़ा पक्ष था, के साथ भी अपनी पूरी साझ बनाए रखी।
नि:संदेह उस समय से लेकर सोवियत यूनियन के 1990 में टूटने तक और उसके बाद भी रूस ने भारत का साथ बखूबी निभाया। चाहे भारत-चीन के 1962 में हुए सीमांत युद्ध के समय भी सोवियत यूनियन ने चीन के बड़ा कम्युनिस्ट देश होने के बावजूद भारत के साथ निष्पक्ष और अच्छे संबंध बनाए रखे, जो आज तक भी जारी हैं। रूस पिछले कई वर्षों से यूक्रेन के साथ युद्ध में उलझा हुआ है। भारत के यूक्रेन जो कभी सोवियत यूनियन का हिस्सा होता था, के साथ भी सदैव अच्छे संबंध बने रहे हैं। विगत वर्षों में उसे इस युद्ध के प्रति अपनी नीति को लेकर बेहद सम्भल कर चलना पड़ रहा है। इसी तरह अमरीका-इज़रायल और ईरान के युद्ध के समय भी भारत की विदेश नीति कड़ी परीक्षा से गुज़री है। आज भी यह इम्तिहान जारी है, जिसके लिए भारत को बहुत सम्भल कर विचरण करना पड़ रहा है। चाहे इस युद्ध में पाकिस्तान ने अमरीका और ईरान के बीच मध्यस्थता करने का यत्न किया है, परन्तु उसे अब तक इसमें जितनी भी सफलता प्राप्त हुई है, वह सभी के सामने है। पाकिस्तान की सांस्कृतिक पक्ष से भी स्थिति कमज़ोर दिखाई देती है। वह देश जिसने वर्षों तक अपने पूर्व प्रधानमंत्री और सबसे लोकप्रिय रहे नेता जुल्फिकार अली भुट्टो को जेल में बंद रखा हो, जो देश सैन्य इशारों पर चलता दिखाई दे रहा हो, जो भूख और ़गरीबी के बीच आतंकवाद से जकड़ा हुआ हो और अपनी धरती से अपने पोषित आतंकवादी संगठनों से भारत सहित विश्व भर के लिए एक बड़ा ़खतरा बना हो, जहां दशकों से उसके सबसे बड़े प्रांत बलोचिस्तान में लगातार लपटें उठ रही हों, जहां अ़फगानिस्तान के साथ लगते उसके पहाड़ी प्रदेश ़खैबर पख्तूनख्वा में पाकिस्तान के तालिबानों ने देश के प्रशासन को कड़ी चुनौती दे रखी हो, इस मामले पर वह अपने पड़ोसी देश अ़फगानिस्तान के साथ झगड़े में उलझा हो, यदि ऐसा देश अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर एक बेहद जटिल युद्ध में स्वयं को बिचोलिया बनने का भ्रम पाल रहा हो, तो उससे किसी भी तरह के सकारात्मक रवैये पर कितनी उम्मीद रखी जा सकती है। विभाजन के बाद भारत के साथ इसकी दुश्मनी की दास्तान शुरू होती है। अपने अनेक ़खतरनाक आतंकवादी संगठनों का पक्ष-पोषण करके यह भारत को रक्त-रंजित करता आया है, जिस कारण दोनों देशों का आपस में कई बार युद्ध भी हुए और बात यहां तक पहुंच गई है कि भारत ने अपनी नदियों के पानी संबंधी पाकिस्तान के साथ किए समझौते पर भी रोक लगा दी है, जिससे वहां के हालात बेहद दयनीय बन चुके हैं, परन्तु इसके बावजूद पाकिस्तान ने आतंकवादी संगठनों द्वारा भारत को रक्त-रंजित करने की नीति को नहीं छोड़ा।
यदि ऐसे हालात में अमरीका और यूरोपियन देश भारत के विरुद्ध उसे सकारात्मक समर्थन देते हैं तो भारत को इस संबंध में कड़ा रवैया धारण करने की ज़रूरत होगी। विगत दिवस यूरोपियन यूनियन आयोग के उपाध्यक्ष काजा कलास ने अपने इस्लामाबाद दौरे के दौरान कश्मीर का ज़िक्र करते हुए इसे अन्तर्राष्ट्रीय मामला कहा, जिसके प्रति भारत के विदेश मामलों के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने स्पष्ट रूप में कहा है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत का अभिन्न अंग हैं, जिसके संबंध में किसी विदेशी ताकत का हस्तक्षेप करना उचित नहीं है और न ही भारत ऐसे बयानों को किसी भी तरह की मान्यता देता है। नि:संदेह भारत को समय-समय पर ऐसी चुनौतियों का पूर्ण रूप से स्पष्ट होकर और डट कर मुकाबला करने की ज़रूरत होगी। इसी नीति के दृष्टिगत उसे अन्तर्राष्ट्रीय मामलों को सकारात्मक ढंग से सुलझाने में अपना योगदान डालना होगा।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

