अलग-थलग पड़ते जा रहे ट्रम्प
इस वर्ष 28 फरवरी को अमरीका और इज़रायल ने ईरान पर हमला किया था, जिसमें उसके वरिष्ठ नेता आयतुल्ला अली खामेनेई और सीनियर जरनैल मारे गए थे। तीन माह की अवधि के दौरान ईरान के मूलभूत ढांचे का बड़ा भाग क्षतिग्रस्त हो गया था परन्तु इसके बावजूद उसने हथियार नहीं डाले और युद्ध जारी है। अमरीका ने पहले से ही उसकी घेराबंदी की हुई थी और उसके विदेशी खातों पर भी अपने प्रभाव से प्रतिबन्ध लगा रखा है। मध्य-पूर्व का यह युद्ध इस क्षेत्र के ज्यादातर देशों में फैला हुआ है। विशेष रूप से खाड़ी के देश इसकी चपेट में हैं। तेल और गैस के उत्पादन में अस्थिरता आई है। अनेक ज़रूरतमंद देश इन वस्तुओं की कमी के कारण दुविधा में फंसे हुए दिखाई दे रहे हैं। अब तक ईरान से होकर गुजरते समुद्री रास्ता होर्मुज जल मार्ग पर ईरान ने प्रभावशाली ढंग से कब्ज़ा किया हुआ है। चाहे अमरीका ने इसकी प्रतिक्रिया-स्वरूप उसकी बंदरगाहों की नाकाबंदी की हुई है परन्तु तेल और गैस की कमी की पूर्ति न होने के कारण भारत सहित ज्यादातर देश कठिन हालात में से गुज़र रहे हैं।
ट्रम्प ने होर्मुज जल मार्ग खुलवाने के लिए यूरोपियन देशों को भी लगातार अपीलें कीं परन्तु उन्होंने इस संबंध में कोई समर्थन नहीं दिया। ईरान की ओर से अमरीका के सहयोगी खाड़ी देशों में स्थित अमरीका के सैन्य अड्डों के नाम पर किए गए हमलों ने भी स्थिति को बड़ी सीमा तक बिगाड़ दिया है। दूसरी तरफ इज़रायल की ओर से अपने पड़ोसी देश लेबनान पर हमले जारी हैं, क्योंकि वहां ईरान की सहायता प्राप्त संगठन हिज़बुल्लाह इज़रायल के विरुद्ध अपनी गतिविधियों को अंजाम दे रहा है। लेबनान के दक्षिणी भाग पर हिज़बुल्लाह का कब्ज़ा है। लेबनान इस युद्ध से छुटकारा पाना चाहता है परन्तु ऐसा उसके बस की बात नहीं प्रतीत होती। विगत दिवस इज़रायल और लेबनान की सरकार में युद्ध रोकने संबंधी समझौता ज़रूर हो गया था, जिसमें यह दर्ज किया गया था कि हिज़बुल्लाह आतंकवादी दक्षिण लेबनान को खाली कर देंगे। हिज़बुल्लाह नेता नायम कासिम ने इससे इन्कार कर दिया और कहा कि हिज़बुल्लाह लड़ाकों द्वारा गोलीबारी के बीच दक्षिण लेबनान को छोड़ देने का मतलब हार स्वीकार करना है। इस समय लेबनान के एक बड़े भाग पर इज़रायल ने कब्ज़ा किया हुआ है और वह यह कब्ज़ा छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। चाहे राष्ट्रपति ट्रम्प ने अब तक अनेक बार ऐसे बयान दिए हैं कि युद्ध शीघ्र ही खत्म होने वाला है और ईरान के साथ समझौता होने वाला है। यहां तक कि अमरीकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने भी यह बयान दिया है कि ईरान के साथ युद्ध समाप्त हो चुका है और अमरीका ने जीत हासिल कर ली है। इससे यही प्रभाव पड़ता है कि अमरीकी प्रशासन ज़मीनी आधार पर फिसलता दिखाई दे रहा है।
विगत दिवस राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को एक और बड़ा झटका उस समय लगा जब अमरीकी प्रतिनिधि सभा (हाऊस ऑफ रिप्रैजेंटिव) ने यह प्रस्ताव पारित कर दिया कि राष्ट्रपति को ईरान के विरुद्ध आगे की सैन्य कार्रवाई के लिए कांग्रेस से स्वीकृति लेनी पड़ेगी। यदि यह स्वीकृति नहीं मिलती तो अमरीकी सैन्य दल को वापिस बुलाना पड़ेगा। इस हाऊस में ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी के सांसदों का थोड़ा सा बहुमत ज़रूर है परन्तु यह प्रस्ताव हाऊस में 215-208 मतों से पारित हुआ है। ट्रम्प की पार्टी के ही चार रिपब्लिकन्स सांसद इस प्रस्ताव में उनके विरुद्ध भुगते हैं। इसके बाद यह प्रस्ताव सैनेट में भेजा जाएगा। वहां भी ट्रम्प को नमोशी सहन करनी पड़ सकती है। इससे राष्ट्रपति की स्थिति बड़ी सीमा तक कमज़ोर हुई है, जिसे निकट भविष्य में स्थिर कर पाना उनके लिए कठिन प्रतीत होता है। अमरीका में भी लगातार इस युद्ध के विरुद्ध स्वर उठ रही हैं, जिससे ट्रम्प की स्थिति और भी कमज़ोर होती दिखाई दे रहा है। आज विश्व के ज्यादातर देश भी इस युद्ध के विरुद्ध हो चुके हैं, जिसके दृष्टिगत ऐसा प्रतीत होने लगा है कि राष्ट्रपति ट्रम्प इससे पीछे हटने के लिए कोई और मार्ग ढूंढने की तलाश में होंगे, क्योंकि अब ज्यादातर रास्ते उनके लिए बंद होते जा रहे हैं, जिससे आज विश्व का सबसे शक्तिशाली देश बहुत कमज़ोर पड़ता दिखाई दे रहा है।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

