लोगों की जान ले रही लापरवाह और भ्रष्ट व्यवस्था
गत 3 जून, 2026 को राजधानी दिल्ली के मालवीय नगर स्थित होटल फ्लरिश स्टे के ग्राउंड फ्लोर स्थित रेस्टोरेंट में आग लग गई और देखते ही देखते आग पूरे चार मंज़िल के होटल में फैल गई, कुछ ही मिनटों के भीतर पूरा होटल धू-धू करके जलने लगा, जिसमें 22 लोगों की मौत हो गई। मालवीय नगर के रिहाईशी इलाके में स्थित होटल फ्लरिश स्टे में आग से जलकर मरने वाले में 12 विदेशी हैं। जबकि 10 भारतीयों में से 3 राजस्थान के, 5 हरियाणा के और 2 दिल्ली के हैं। मरने वाले भारतीयों में 8 सगे रिश्तेदार हैं। आग से जले जिन गंभीर लोगों को अलग-अलग अस्पतालों में इलाज के लिए भर्ती कराया गया, उनमें से कुछ हालत गंभीर बनी हुई थी। आग लगने के प्रारंभिक कारणों में यह पता चला है कि इमारत की फायर एनओसी नहीं थी। इस होटल के लिए सिर्फ 6 कमरों की इजाज़त थी, लेकिन भ्रष्टाचार के संरक्षण में होटल में 25 कमरे बनाये गये थे। 4 जून को बिहार के मुजफ्फरपुर ज़िले में एक निजी अस्पताल के आईसीयू में आग लगने से 5 लोगों की मौत हो गई। यह घटना ज़िले के ब्रह्मपुरा थाना क्षेत्र में स्थित प्रसाद अस्पताल में घटित हुई। अस्पताल प्रशासन के अनुसार प्रारंभिक तौर पर आशंका है कि आईसीयू वार्ड में शार्ट सर्किट के कारण आग लगी और तेज़ी से फैल गई जिससे आईसीयू में धूआं फैल गया और मरीज़ों को बाहर निकालने में काफी कठिनाई का सामना करना पड़ा।
हैरानी की बात है कि हाल के दिनों में देशभर में लगभग 4 दर्जन से ज्यादा आग लगने की जिन गंभीर घटनाओं का रिकॉर्ड चेक किया गया है, उन सबमें एक ही तरह की वजह पायी गई है। ज्यादातर इमारतों में फायर एनओसी नहीं थी, बिल्डिंग कोड वेरिफाई नहीं था और जितने कमरों की इजाज़त थी, उससे कहीं ज्यादा कमरे अवैध तरीके से बनाये गये थे। सभी घटनास्थलों में आग से सुरक्षा के इंतजाम नदारद पाये गये। हैरानी की बात है कि एक के बाद एक दर्दनाक घटनाएं घट रही हैं, लेकिन स्थिति में ज़रा भी सुधार नहीं हो रहा। भयानक घटनाओं के बाद भी लोग नियम कायदे से चलने के लिए तैयार नहीं है। छह महीने के भीतर राजधानी दिल्ली में ही आग लगने की ऐसी घटनाओं के कारण अधिकृत रूप से 66 लोगों की मौत हो चुकी है। इसके बावजूद शासन-प्रशासन के कानों पर कोई जूं नहीं रेंगी।
मालवीय नगर हादसे की प्रारंभिक जांच के बाद भवन की वैधता, फायर एनओसी, सुरक्षा मानकों और प्रशासनिक निगरानी पर गंभीर सवाल उठे हैं। हालांकि घटना के बाद पुलिस ने लापरवाही और सुरक्षा नियमों के उल्लंघन की जांच शुरु कर दी है, अगर गहराई से इस या इस तरह की दूसरी घटनाओं पर नज़र डालें तो पुलिस भी इस लापरवाही में हिस्सेदार है। दुर्भाग्यपूर्ण बात सिर्फ यह नहीं है कि आग लगी, दुखद बात यह भी है कि देश में लगभग हर बड़ी आग के बाद पिछले तमाम सालों से एक जैसा ही पैटर्न सामने आता है। अवैध निर्माण, इमारत में अपर्याप्त आपात निकास, आग सुरक्षा उपकरणों का अभाव और भ्रष्टाचार के चलते प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा ऐसी तमाम इमारतों को सभी तरह के कामों के लिए आंख मूंदकर दी गई इजाज़त इस सबकी ज़िम्मेदार पायी गई है। हर ऐसी घटना के बाद भारी शोर-शराबा होता है, ज़िम्मेदार लोगों को बख्शे न जाने की दुहाई दी जाती है, हर बार जांच समितियां बनती हैं, मुआवज़े घोषित होते हैं और ज़िम्मेदार लोगों के विरुद्ध कार्रवाई का आश्वासन दिया जाता है, लेकिन एकाध महीने में ही न सिर्फ लोग बल्कि स्थानीय प्रशासन और खुद पीड़ित लोग तक इन सब बातों को भूल जाते हैं।
इस तरह गुनाहगार पर कोई कार्रवाई कम ही देखने को मिलती है। हां, जैसे ही लोग इस सबको भूलते हैं, फिर कोई नया हादसा हो जाता है और लोग फिर एक-एक करके पिछले हादसों को याद करने लगते हैं। अगर यकीन न आए तो हाल की राजधानी दिल्ली में घटी आग की कुछ घटनाओं को देखें तो इसी साल मई में राजधानी के विवेक विहार क्षेत्र में एक आवासीय परिसर में आग लगी थी और 9 लोगों की जल कर मौत हो गई थी। इसी साल अब तक राजधानी के कई अस्पतालों, गोदामों और बहुमंजिला इमारतों में आग की घटनाएं घट चुकी हैं। इन घटनाओं में सुरक्षा मानकों की बार-बार पोल खुलती है। दिल्ली का उपहार सिनेमा कांड आग लगने की एक ऐसी वीभत्स घटना है, जिसने कुछ साल पहले राजधानी दिल्ली को ही नहीं, पूरे देश को झकझोर करके रख दिया था।
अगर देश में ऐसे ही कुछ और हृदयविदारक आग लगने की घटनाओं को याद करें, तो कोलकाता के एएमआरआई अस्पताल में कुछ सालों पहले कितनी भयानक आग लगी थी और कितने मरीज़ इस आग की भेंट चढ़ गए थे। गोदामों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में तो आग लगने की घटनाएं इतनी आम है कि लोग इनके बारे में सोचते तक नहीं। ऐसा नहीं है कि देश में फायर सेफ्टी से जुड़े नियमों की कमी है। सच बात तो यह है कि राज्य में भवन निर्माण नियम, अग्निशमन अधिनियम और एनओसी हासिल करने की व्यवस्था मौजूद है, लेकिन इस सबके बावजूद आग लगने की घटनाओं में कमी नहीं आ रही। इससे साफ पता चलता है कि कानून और नियमों का पालन नहीं हो रहा।
चाहे कई इमारतों के निर्माण के समय फायर सेफ्टी संबंधी एनओसी ले ली जाए, लेकिन इसे पूरी तरह क्रियात्मक रूप नहीं दिया जाता। दूसरी बड़ी बात यह है कि एक बार एनओसी हासिल करने के बाद मकान, दुकान या व्यावसायिक परिसर में मनमानी ढंग से फेरबदल कर लिए जाते हैं। नये कमरे और नई मंज़िलें निर्मित कर ली जाती हैं। इसका नतीजा यह होता है कि ली गई एनओसी का भी कोई मतलब नहीं रह जाता।
वास्तव में अगर लोग ईमानदारी से नियमों का पालन करने की कोशिश करते हैं, तो प्रशासनिक स्टाफ उन्हें इतना परेशान करता है कि उन्हें भी लगता है कि कुछ ले-देकर परेशानी से मुक्ति पायी जाए।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



