दिल्ली अग्नि-कांड का दु:खांत

देश की राजधानी दिल्ली के एक बड़े होटल में घटित हुए भीषण अग्नि-कांड ने एक ओर जहां मानवीय कोताही से होने वाली दुर्घटनाओं की संख्या में वृद्धि की है, वहीं लाख आरोप-प्रत्यारोपों के बावजूद, प्रशासनिक स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार का एक और उदाहरण सामने ला दिया है। इस अग्नि-घटना में अब तक 22 लोगों के जीवित जल जाने अथवा दम घुटने से मर जाने की सूचना है जिनमें से 12 विदेशी नागरिक भी शामिल हैं। अग्नि-कांड के धुएं और भगदड़ के कारण लगभग 20 लोग घायल और अस्वस्थ भी हुए हैं। इनमें से अनेक गम्भीर रूप से घायल हैं जिन्हें जीवन-दायी रक्षा प्रणाली पर रखा गया है। बचाव दल के 10 सदस्यों के घायल होने की भी सूचना है। इस घटना का एक बड़ा त्रासद पक्ष यह है कि मृतक 11 भारतीयों में से सात गुड़गांव के एक ही परिवार के सदस्य हैं जो अपने एक अन्य स्वजन का कुशल-क्षेम जानने के लिए दिल्ली गए थे, और सभी एक साथ इसी होटल में ठहरे थे। अग्नि-कांड की भीषणता का अनुमान इस एक तथ्य से भी लगाया जा सकता है कि जल कर मरने वाले लोगों में से अधिकतर की शिनाख्त भी नहीं हो सकी। कई मृतकों के शरीर हड्डियों का ढांचा भर रह गए थे। होटल के कमरों में गहरा धुआं भर जाने के कारण कई स्त्री-पुरुष खिड़कियों आदि से छलांग लगाकर नीचे कूदे। एक युवा महिला ने अपने बच्चे को गोद में उठा कर तीसरी मंज़िल से छलांग लगा कर अपनी जान बचाई। दुर्घटना की हाय-तौबा के बीच मानवीय धरातल पर एक सुखद पक्ष यह भी दिखा, कि दमकल विभाग के पहुंचने से पूर्व ही बचाव कार्यों में स्वेच्छा से लगे लोगों ने नीचे ज़मीन पर मोटे गद्दे बिछा दिये थे ताकि कूदने वाले लोगों को चोट लगने से बचाया जा सके। 
नुक्सान और मृतकों की संख्या बढ़ने का एक बड़ा कारण यह भी रहा कि होटल के मालिकों और प्रबन्धकों ने होटल के तहखाने और भूमिगत जगहों पर भी कमरे बना लिये थे जिस कारण बाहरी मार्ग संकरा हो गया था। यह भी, कि होटल में सुरक्षा व्यवस्था और निकासी के प्रबन्ध बहुत सीमित थे। निचली मंज़िल और तहखाने में धुआं भर जाने से लोगों को भाग कर बचने हेतु कोई रास्ता ही उपलब्ध नहीं हुआ। फिर भी, बचाव में लगे लोगों और सुरक्षा कर्मियों ने मिल कर लगभग चालीस लोगों को सुरक्षित बचा लेने में सफलता हासिल की।
होटल में आग क्यों और कैसे लगी, इसका पता तो घोषित की गई मैजिस्ट्रेटी जांच के बाद ही चलेगा, किन्तु होटल प्रबन्धकों के साथ प्रशासनिक तंत्र की मिली-भुगत के अनेक प्रमाण एक साथ सामने आये हैं। सबसे बड़ा प्रमाण तो यह कि इस होटल के लिए प्राथमिक मंजूरी केवल 6 कमरों की थी, किन्तु प्रबन्धकों ने घूस देकर छह मंज़िलें तक खड़ी कर लीं, और इनमें 25 कमरे तक बना लिये। यहां तक कि भूमिगत कमरे और तहखाना-कमरे भी बना लिए गए थे। प्रशासनिक तंत्र ने इतने बड़े भवन में सेफ्टी और अग्नि-शमन की पूर्ण व्यवस्था की कभी चैकिंग ही नहीं की थी। होटल-प्रबन्धन के पास अनापत्ति प्रमाण पत्र भी नहीं था, और होटल के सभी निर्माण-कार्य अवैध तरीके से बनाये गये थे।
हम समझते हैं कि बेशक इस अग्नि-कांड की मैजिस्ट्रेटी जांच और पीड़ितों के समुचित उपचार हेतु आदेश जारी कर दिये गये हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दुर्घटना के पीड़ित परिवारों हेतु संवेदना व्यक्त की है। दिल्ली के लै. गवर्नर तरणजीत सिंह संधु ने भी दिल्ली के अनेक तरह के संस्थानों हेतु दिशा-निर्देश जारी किये हैं, किन्तु आश्चर्य है कि अक्सर ऐसी होश देश के प्रशासनिक तंत्र को सब कुछ गंवा लेने के बाद ही क्यों आती है। देश के भिन्न-भिन्न भागों और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में ऐसे अग्नि-कांड प्राय: होते रहते हैं। दिल्ली वाली घटना के अगले ही दिन मुजफ्फरपुर के एक निजी अस्पताल के आई.सी.यू. में लगी आग से पांच लोग मारे गए हैं। यहां अनेक लोग घायल भी हुए हैं। देश के जंगलों में भी गर्मियों के मौसम में अनेक अग्नि-कांड होते रहते हैं। हिमाचल के सोलन से कश्मीर के राम वन तक गर्मी के मौसम में अक्सर जंगल धधकते रहते हैं, किन्तु इन सभी घटनाओं में मानवीय चूक, प्रशासनिक कोताही, भ्रष्टाचार और सबसे बढ़ कर भ्रष्ट तंत्र की लापरवाही ज़िम्मेदार होते हैं। हम समझते हैं कि पहले न सही, दिल्ली की इस एक बड़ी घटना से तो अवश्य सबक लिया जाना चाहिए। दिल्ली में तो खासकर बड़े शिक्षा संस्थानों, स्वास्थ्य केन्द्रों, सेवा स्थलों, होटलों, अस्पतालों आदि में व्यापक निरीक्षण अभियान चला कर, सख्ती से नियमों-कानूनों का पालन कराया जाना चाहिए। जहां-जहां पर भ्रष्टाचार की आहट सुनाई दे, वहां पर कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए। केवल इसी तरीकाकार से ऐसे अग्नि-कांडों अथवा अन्य त्रासद घटनाओं/दुर्घटनाओं पर अंकुश लगाया जा सकता है।

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