सब कुछ ठीक है ?
सरकार के प्रतिनिधि ज़ोर-शोर से कह रहे हैं कि सब ठीक है, लेकिन अवाम जो चुप है उसे समझ नहीं आ रहा कि अगर सब ठीक है तो लोगों की हालत दिन-प्रतिदिन पतली क्यों हो रही है? उन्हें ए.आई. (कृत्रिम बौद्धिकता) से नौकरी खोने का डर सता रहा है। महंगाई बढ़ रही है तो जेब को बुखार आने का डर है। बीमार पड़ जाएं तो नकली दवाओं का डर है। कॉकरोच वाले मामले में युवा ब्रिगेड का आक्रोश सामने आ रहा है। इस मामले की जड़ में गवर्नेस की असफलता के साथ-साथ मंत्री, अफसर, पुलिस और वकीलों के कारनामे शामिल हैं। त्विषा शर्मा मामले में पीड़िता के परिजनों को एफ.आई.आर. दर्ज करवाने के लिए कई दिनों तक प्रदर्शन करना पड़ा। मीडिया में शोर मचने के बाद ज़िला अदालत, हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट सभी जगह सुनवाई होने लगी। उच्चतम न्यायालय के चीफ जस्टिस की पीठ के सामने सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि रिटायर्ड ज़िला जज पुलिस जांच में सहयोग नहीं कर रही हैं।
पंजाब में बागी सांसदों के खिलाफ पुलिस उत्पीड़न को रोकने के लिए हाईकोर्ट को आदेश देना पड़ा। पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री के पी.ए. की हत्या के मामले में एक बेकसूर आदमी को पकड़ लिया गया जिसे अब सी.बी.आई. की अर्जी के बाद अदालत ने बरी कर दिया।
सारे घटनाक्रम को देखते हुए एक प्रश्न उठता है कि क्या इतिहास फिर से अपने को दोहरा रहा है? ऐसा संकट एक बार 1973 के आस-पास आया था, लेकिन पिछले 53 वर्षों में भारत कमजोर तो नहीं पड़ा। मजबूती की तरफ कदम उठाये हैं। 1971 में इंदिरा गांधी भारी बहुमत से जीत कर आई थीं। सी.पी.आई., द्रमुक तब साथ थीं। उन्होंने 80 प्रतिशत सीटों पर कब्ज़ा कर लिया था। उसी वर्ष पाकिस्तान के दांत खट्टे किए थे। अगले वर्ष चुनाव में उन्होंने ज़बरदस्त जीत हासिल की थी। यह उनका स्वर्णिम काल था। किसी भारतीय ने ऐसा निरंकुश समय शायद ही देखा हो, लेकिन फिर समय ने करवट ली। मॉनसून 1972-73 में गिर गया। कृषि प्रधान अर्थ-व्यवस्था ने भारी चोट खाई। 1973 में पहली बार तेल एक हथियार के रूप में सामने आया। युवा आक्रोश सामने आया। बेरोज़गारी, महंगाई से समाज ग्रस्त नज़र आने लगा। कालेज-हास्टलों मेस में फीस बढ़ी। मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। जे.पी. के नेतृत्व में आंदोलन खड़ा हो गया। इंदिरा गांधी को बचाव का खेल खेलते हुए चिमनभाई पटेल को हराना पड़ा। अब्दुल को भी 1975 में जाना पड़ा। 1974 की गर्मियों में परमाणु परीक्षण ‘पोखरण’ में किया गया। मुद्रा स्फीती अनियंत्रित हो रही थी। आव देखा न ताव एमरजेंसी लगा दी गई। जिसे काले दिनों के रूप में अभी तक याद किया जाता है। 1977 में चुनाव हुए। उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
आज फिर ईरान अमरीका-इज़रायल युद्ध ने तेल का बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। पेट्रोल के दाम बढ़ रहे हैं। गैस सिलेंडर की आमजन को दिक्कत महसूस हो रही है। बड़ी भारतीय कम्पनियां विदेश में निवेश करने लगी हैं। रुपया कमज़ोर होता चला जा रहा है। डॉलर मजबूत, आर्थिक दबाव बढ़ता जा रहा है। यू.पी.ए. सरकार के समय भाजपा ने रुपये की मज़बूती का मुद्दा उठाया था। युवा वर्ग अपने तौर पर नाराज़ है, बेरोज़गारी पीठ पर लाद कर वह करे तो क्या करे? जिसकी न घर में जगह है न बाज़ार में। पढ़ाई के बाद गिनती की नौकरियां ही हैं जिनसे रोज़गार की उम्मीद बंधती है कैट,नीट, जे.ई.ई., क्लैट, यू.पी.एस.सी. से लेकर एन.डी.ए., आई.एम.ए. और अग्निवीर तक जाने के रास्ते, परन्तु भारतीय युवक चक्रव्यूह में फंसा हुआ है।

