राजनीतिक सम्भावनाएं
2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर पंजाब में दिन-प्रतिदिन राजनीतिक हलचल तेज़ होती जा रही है। सभी संबंधित पार्टियां अपनी-अपनी रणनीति बनाने की ओर ध्यान दे रही हैं। कांग्रेस का पंजाब की राजनीति में बड़ा प्रभाव रहा है। समय-समय पर इसकी सरकारें बनती रही हैं। चाहे इस समय विधानसभा में इसके 16 विधायक ही हैं परन्तु वर्ष 2022 में बनी आम आदमी पार्टी की सरकार से पहले प्रदेश में कांग्रेस की बहुमत वाली सरकार शासन कर रही थी। चाहे अपने कार्यकाल के अंत में पार्टी के भीतर उभरे मतभेद के कारण कैप्टन अमरेन्द्र सिंह के स्थान पर कुछ महीने के लिए चरनजीत सिंह चन्नी मुख्यमंत्री बनाए गए थे परन्तु विधानसभा चुनाव के समय पार्टी के भीतर विवाद के कारण कांग्रेस चुनाव प्रचार से पीछे रह गई थी, परन्तु इसके साथ-साथ कांग्रेस की उस समय की सरकार की समूची कारगुज़ारी भी सन्तोषजनक नहीं थी, जिस कारण तीसरे विकल्प के रूप में आम आदमी पार्टी को भारी समर्थन मिला था और इसने विधानसभा की 117 में से 92 सीटों पर जीत प्राप्त करके इतिहास रचा था।
पंजाब में कभी बेहद प्रभावशाली रहे अकाली दल (ब) में अनेक कारणों के दृष्टिगत पिछले 4 वर्ष से निराशा ही देखी जाती रही है। अकालियों की फूट के कारण और नए अकाली दलों के अस्तित्व में आने के कारण भी समूचे रूप से अकाली राजनीति में लगातार गिरावट देखी जा रही है। इसी अवधि में भाजपा ने भी प्रदेश की राजनीति के आकाश में अपने पर तौलने शुरू कर दिए हैं। केन्द्र में भाजपा सरकार होने के कारण भी प्रदेश में इसका प्रभाव बढ़ता दिखाई दे रहा है। कांग्रेस प्रदेश की राजनीति में स्वयं को हमेशा एक बड़ी पार्टी मानती आई है परन्तु पार्टी की आंतरिक फूट के कारण यह अब तक स्वयं को मज़बूती के साथ खड़ा करने में असमर्थ रही है। इसका एहसास पार्टी के भीतर ही बना रहा है और आम लोगों में भी ऐसी बात लगातार होती रही है। अब भाजपा द्वारा मालवा क्षेत्र से संबंधित केवल सिंह ढिल्लों को अध्यक्ष घोषित करने से कांग्रेस गलियारों में भी हलचल देखी जा सकती है। चाहे प्रदेश के वरिष्ठ नेता पार्टी की मज़बूती और एकजुटता के दावे ज़रूर कर रहे हैं परन्तु इसकी आंतरिक खींचतान का प्रभाव लगातार बना रहा है। इसी सन्दर्भ में पार्टी की हाईकमान द्वारा राज्य के वरिष्ठ प्रादेशिक नेताओं की दिल्ली में समय-समय पर बुलाई जाती बैठकें और भेंटवार्ता को भी देखा जा सकता है। इसी कारण विगत दिवस प्रदेश नेतृत्व में बदलाव होने के संकेत भी मिलते रहे हैं। अब तक इस संबंध में तरह-तरह के अनुमान लगाए जाते रहे हैं।
चाहे हाईकमान द्वारा प्रदेश नेतृत्व में बदलाव न करने की घोषणा ज़रूर की जा रही है परन्तु इसके बावजूद सम्भावनाओं का सिलसिला खत्म होने वाला प्रतीत नहीं होता। प्रदेश में पहले किए गए महत्त्वपूर्ण बदलावों का पार्टी को नुकसान ही हुआ था। इसी तरह हरियाणा में भी पार्टी की आंतरिक फूट से भाजपा की और भी चढ़त हो गई थी। आगामी समय में पार्टी प्रदेश चुनावों के लिए स्वयं को किस तरह तैयार करने में समर्थ हो सकेगी, इस ओर सभी की नज़रें केन्द्रित हैं। यदि पार्टी की वर्तमान स्थिति बरकरार रही तो पार्टी के लिए यह बड़ी निराशा वाली बात सिद्ध होगी।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

