भारत की ज़मीन पर नेपाली कब्ज़े के मायने

भारत और नेपाल के संबंध पूरे एशिया में आज से नहीं, सदियों से बड़े अनोखे, गहरे और आत्मीय रहे हैं। दोनों देशों के बीच न केवल खुली सीमा है बल्कि सदियों से ही रोटी-बेटी का संबंध भी है। धार्मिक-सांस्कृतिक निकटता और गहरी ऐतिहासिक साझेदारी नेपाल और भारत के रिश्तों की ऐसी खूबी है, जिसे किन्हीं अन्य दो देशों में नहीं देखा जाता। लेकिन हाल के दशकों में जिस तरह नेपाल और भारत के इन ऐतिहासिक रिश्तों में रह-रह कर दरार आती रही है, शायद उस दरार में सबसे बड़ी चोट गुजरी 31 मई, 2026 को तब लगी, जब नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने यह कह कर सनसनी मचा दी कि भारत ने ही नेपाल की ज़मीन पर कब्जा नहीं किया, नेपाल ने भी भारत की ज़मीन पर कब्ज़ा किया हुआ है। नेपाली प्रधानमंत्री यहीं नहीं रुके बल्कि उन्होंने यह भी कहा कि इस विवाद को निपटाने के लिए उन्होंने चीन और ब्रिटेन से भी बात की है। 
बालेन शाह के इस बयान के बाद नेपाली राजनीति में भूचाल आ गया है। नेपाल के विपक्षी राजनेताओं ने यह कह कर संसद में अपने प्रधानमंत्री को घेरा कि वो या तो सबूत दिखाएं कि नेपाल ने भारत की ज़मीन पर कहां कब्ज़ा किया है या फिर वह अपने बयान को वापस लें। इस भूचाल के बाद नेपाल के विदेश मंत्रालय को सफाई देनी पड़ी है कि प्रधानमंत्री दरअसल क्रॉस बॉर्डर भूमि उपयोग या नो मैन्स लैंड की उस जमीन के बारे में बात कर रहे थे, जहां दोनों तरफ के किसान ने कई जगहों पर कब्ज़ा करके खेती कर रहे हैं, लेकिन नेपाली प्रधानमंत्री के इस बयान को महज कूटनीतिक नौसिखियापन या अनुभवहीन नेतृत्व पर पड़े दबाव का नतीजा कहना सही नहीं होगा। इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि नेपाल में गुजरे मार्च महीने में निर्वाचित हुए प्रधानमंत्री बालेन शाह राष्ट्रीय नेतृत्व के मामले में अनुभवहीन हैं।  
गौरतलब है कि पाकिस्तान ने अपनी राष्ट्रीय पहचान का बड़ा हिस्सा भारत विरोध से जोड़ लिया है। अब चूंकि नेपाल व भारत के बीच कालापानी, लिपुलेक और लिंपियाधुरा को लेकर सालों से सीमा विवाद है। भारत इन्हें उत्तराखंड का हिस्सा मानता है, जबकि नेपाल का दावा है कि ये उसका हिस्सा है। प्रधानमंत्री शाह का बयान हालांकि उनकी अनुभवहीनता को अवश्य दर्शाता है। तथापि, उनकी यह बात कूटनीतिक दांवपेच से भरी हुई अवश्य लगती है कि इस विषय पर उन्होंने चीन और ब्रिटेन से भी बातचीत की है। सवाल है कि जब भारत और नेपाल के बीच अपनी तमाम समस्याओं को निपटने के लिए द्विपक्षीय पुष्ट मैकेनिज्म मौजूद है, दोनों देशों के बीच एक कारगर संधि भी मौजूद है। फिर ऐसे किसी विवाद पर एक या दो देशों की मध्यस्थता को बीच में लाने का क्या मतलब है? 
भारत का अब ब्रिटेन से कोई रिश्ता नहीं है। भारत आखिर क्यों चाहेगा कि उसके किसी मामले में ब्रिटेन अपनी टांग अड़ाये? भले भारत और नेपाल के बीच पहली संधि 1816 में (सुगौली संधि) नेपाल और ब्रिटिश इंडिया के बीच हुई हो, लेकिन 1947 के बाद भारत के किसी भी मामले से ब्रिटेन का कोई मतलब नहीं रह गया और 1816 की संधि का 2016 में नवीनीकरण भी हो चुका है। इसलिए ब्रिटेन का दूर-दूर तक इस मामले से कोई लेना देना न तो है और न ही होना चाहिए। ठीक है, बालेन शाह अपेक्षाकृत युवा नेता हैं, राष्ट्रीय राजनीति में उनका अनुभव सीधे प्रधानमंत्री बनने का है। उससे पहले संसदीय राजनीति का उन्हें कोई अनुभव नहीं रहा। इसलिए माना जा सकता है कि संसद में उनके द्वारा दिया गया वक्तव्य भावनात्मक अधिक और कूटनीतिक कम था लेकिन कूटनीतिक संबंधों में शब्दों का चयन बहुत ही सावधानी से करना चाहिए। जिस तरह से बालेन शाह ने भारत और नेपाल के बीच एक सीमा विवाद को हवा देते हुए ब्रिटेन और चीन को इस मामले में घसीटने की कोशिश की है, वह धोखे से भी अगर की गई हरकत है, तो भी खतरनाक है। भारत सरकार को इस पर तुरंत एक्शन में आना चाहिए। 
भारत ने अभी तक इस संबंध कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया कि नेपाल ने उसकी किस जमीन पर कब्ज़ा कर रखा है, लेकिन नेपाल में इस मामले में हंगामा खड़ा हो गया है। यही वजह है कि नेपाल सरकार ने ही सफाई दी है कि भारत के साथ उसके जो सीमा विवाद हैं या जिन पर दोनों देशों के अलग-अलग दावे हैं, उनसे निपटने के लिए दोनों देशों के बीच कूटनीतिक स्तर पर प्रयास शुरु हो चुके हैं। गौरतलब है कि साल 2020 में नेपाल द्वारा एक ऐसे मानचित्र को संवैधानिक मान्यता दी गई थी, जिस पर भारत ने आपत्ति जतायी थी। उस मानचित्र में लिपुलेक और काला पानी क्षेत्र को नेपाल का हिस्सा बताया गया था जबकि ये भारत का हिस्सा है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस पूरे संदर्भ में चीन का उल्लेख सबसे ज्यादा संवेदनशील है। लिपुलेक और काला पानी क्षेत्र भारत-नेपाल-तिब्बत के उस त्रिकोण में स्थित हैं, जहां चीन जरा सा मौका पाते ही अपनी टांग अड़ाकर भारत की रणनीतिक चिंताओं को बढ़ा सकता है। 
नेपाल द्वारा इन क्षेत्रों को पहले संवैधानिक मान्यता देना, बाद में इन क्षेत्रों को लेकर एक विवाद संबंधी नोट जारी करना, उसके रणनीतिक दांवपेच का हिस्सा हो सकता है। यह भले अभी इस तरह खतरनाक न दिखता हो, लेकिन अगर नेपाल भी अपनी राष्ट्रीय पहचान भारत के विरोध पर निर्मित करने की कोशिश करेगा, तब तो यह हमारे लिए सिर्फ तात्कालिक या राजनीतिक संकटभर नहीं होगा बल्कि दोनों देशों के व्यापक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक रिश्तों पर भी इससे असर पड़ेगा। भारत और नेपाल के बीच जो लंबी सीमारेखा है, वह पूरी तरह से खुली हुई है, यहां किसी तरह का की कोई बाड़बंदी नहीं है। हर दिन हजारों नेपाली नागरिक भारत आते हैं और भारत से लोग नेपाल जाते हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार के कई सीमावर्ती क्षेत्रों में भारत और नेपाल के लोगाें के बीच आपस में रोटी और बेटी के संबंध हैं। कई लोग तो रहते नेपाल हैं और उनके खेत भारत में हैं और कई भारत में रहते हैं किन्तु उनके खेत नेपाल में कुछ साल पहले तक नेपाल दुनिया का एकमात्र अधिकृत हिंदू राष्ट्र था, भले हिंदुओं की सबसे ज्यादा आबादी भारत में रहती हो। दोनों देशों के नागरिकों के बीच दो अलग-अलग देशों की भावना कतई कट्टरवादी नहीं हैं। नेपाल के लोग अवचेतन में भारत को भी अपना देश ही मानते हैं और भारतीय लोग भी नेपाल को लेकर यही सोच रखते हैं। अगर कल को राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए कूटनीतिक विवाद को हवा दी गई तो करीब 40 लाख से ज्यादा जो नेपाल के लोग भारत में रहकर अपनी रोजी रोटी कमाते हैं और भारत से भेजे गये मनीऑर्डर के जरिये नेपाल की अर्थव्यवस्था को मजबूत करते हैं, उनके लिए बड़ा संकट खड़ा हो जायेगा।         -इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर

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