क्या रंग लाएगा कर्नाटक में सत्ता का फेरबदल ?

‘हाई कमान ने मुझसे (राष्ट्रीय भूमिका के लिए) राज्यसभा में जाने के लिए कहा, मैंने विन्रमता से इंकार कर दिया। मेरी दिलचस्पी राष्ट्रीय राजनीति में नहीं है। लोगों ने मुझे पांच साल के लिए चुना है और दो साल अभी शेष हैं। तब तक मैं कर्नाटक की जनता के लिए काम करूंगा और अपने चुनाव क्षेत्र के लोगों के लिए, विधायक दल व हाई कमान चाहे जिसे भी मुख्यमंत्री चुने।’ यह वक्तव्य है, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सिद्धारमैया का, जिन्होंने 28 मई, 2026 को कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया ताकि नये मुख्यमंत्री का चयन हो सके। पूरी सम्भावना है कि डी.के. शिवकुमार ही 3 जून को शपथ लेकर इस पद को संभालेंगे, जिनकी कर्नाटक में कांग्रेस को पुन: सत्ता में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका थी, जबकि उनके नाम को अनदेखा करते हुए वरिष्ठता व अनुभव को देखते हुए सिद्धारमैया को 20 मई, 2023 को मुख्यमंत्री की शपथ दिला दी गई थी। तब सिद्धारमैया दूसरी बार कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने थे। तब स्पष्ट संकेत यह थे कि आधी अवधि के लिए सिद्धारमैया और शेष आधी अवधि के लिए शिवकुमार मुख्यमंत्री बनेंगे, लेकिन एक बार कुर्सी पाने के बाद कौन उसे छोड़ना चाहता है, इसलिए आधी अवधि पूरा होने के बाद भी अघोषित संभावित व्यवस्था, बीच-बीच में अंदरूनी राजनीतिक तनाव के चलते स्थगित होती रही। 
बहरहाल, इतना तो स्पष्ट है कि कांग्रेस ने मुख्यत: दो कारणों से अपना मुख्यमंत्री बदलने का फैसला किया है। एक, भाजपा की शैली (जैसा कि वह अक्सर गुजरात में करती है) को अपनाते हुए सत्ता विरोधी लहर को कम करने के लिए। दूसरा शिवकुमार से किये गये वायदे को पूरा करने के लिए। लेकिन सिद्धारमैया के उक्त वक्तव्य को अगर पंक्चियों के बीच में पढ़ा जाये तो शिवकुमार के लिए राह आसान नहीं होने जा रही है; क्योंकि पूर्व मुख्यमंत्री राज्य में राजनीतिक दृष्टि से पैसिव नहीं रहने के, उन्होंने राज्यसभा में जाने से इंकार कर दिया है। दूसरा यह कि कर्नाटक में बहुत गहरी क्षेत्रीय व जातिगत असमानताएं हैं जिन्हें संबोधित करना आसान नहीं है। फिर अब भी ऐसे दर्जनों विधायक हैं जो सिद्धारमैया से वफादारी का दम भरते हैं।  भाजपा के चाणक्य ऐसे ही अवसर की तलाश में रहते हैं। फिलहाल सिद्धारमैया खुद को कांग्रेस के लिए समर्पित बता रहे हैं। इस्तीफा देने से पहले मंत्रिमंडल की बैठक में शिवकुमार ने उनके चरण स्पर्श किये व उन्होंने शिवकुमार को अपने गले लगाया। लेकिन राजनीति में जो दिखता है वह अक्सर होता नहीं है। इसलिए कम से कम अभी के लिए यह अनुमान लगाना कठिन है कि कर्नाटक में यह फेरबदल कांग्रेस के लिए क्या गुल खिलायेगा? वैसे इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि कांग्रेस के संकटमोचक शिवकुमार स्थितियों को संभालने में बहुत माहिर हैं। 
कर्नाटक में 1980 के दशक से किसी भी पार्टी ने लगातार दूसरी बार सरकार नहीं बनायी है। सिद्धारमैया को बदलने से क्या कांग्रेस के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर भी चली जाएगी और पार्टी 2028 के विधानसभा चुनाव का सामना ताज़ा छवि से कर पायेगी? इस जुए में सफलता न सिर्फ त्वरित राजनीतिक उथल-पुथल के प्रबंधन पर निर्भर करेगी बल्कि इस पर भी कि नई सरकार आर्थिक संकट का किस तरह से प्रबंधन करेगी जो लोगों को हर रंग की पार्टियों को ठुकराने के लिए विवश करता है। ऐसा प्रतीत होता है कि कांग्रेस ने ऐसी स्थितियों के प्रबंधन में जो अतीत में गलतियां कीं, उन सबसे बचने का प्रयास कर रही है। राजीव गांधी ने 1990 में एयरपोर्ट पर वीरेंद्र पाटिल को बतौर मुख्यमंत्री बर्खास्त कर दिया था, जिसके लिए राज्य की सबसे बड़ी जाति लिंगायत ने अभी तक कांग्रेस को माफ नहीं किया है। राहुल गांधी ने सिद्धारमैया के इस्तीफे की मांग खामोश शालीनता व राज्यसभा सदस्यता के साथ की। सिद्धारमैया ने भी बदलाव को स्वीकार किया, लेकिन उनका एक्शन विद्रोह के संकेत के बिना न था। उन्होंने राज्यसभा सीट की पेशकश को भी ठुकरा दिया। 
हाई कमान से मुलाकात करने के बाद उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि जाति सर्वे रिपोर्ट सौंप दी जाये। चूंकि रिपोर्ट में कर्नाटक में नये आरक्षण फार्मूले की मांग की गई है, इसलिए वह अगले मुख्यमंत्री के लिए किसी टाइम बम से कम नहीं है। इससे सिद्धारमैया को मंच भी मिल जाता है कि वह अहिंदा (अल्पसंख्यक, पिछड़ी जातियों व दलितों) की राजनीति में लौट आएं। वह कर्नाटक में कांग्रेस के एकमात्र वरिष्ठ नेता हैं, जिनका जनाधार है। ज़ाहिर है विपक्ष उनकी इस चाल को अनदेखा नहीं करेगा। 
       -इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर

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