घुसपैठियों की समस्या का समाधान करने की हो रही तैयारी

नक्सल समस्या की तरह अब घुसपैठियों की समस्या का निदान भी होने जा रहा है। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी द्वारा घुसपैठियों को देश से बाहर करने की मुहिम से तय है कि देश का जनसंख्यात्मक घनत्व बिगाड़ रहे और राष्ट्र की सुरक्षा के लिए खतरा बने बांग्लादेशयों और रोहिंग्या मुस्लिमों की विदाई तय है। अधिकारी ने बंगाल में भाजपा की जीत के साथ ही ‘सबका विकास, सबका साथ’ नारे को बदलते हुए तय कर दिया है कि ‘जिसका साथ, उसका विकास’ किया जाएगा। घुसपैठियों के बंगाल में बसने और जन कल्याणकारी योजनाओं का लाभ ममता बनर्जी के मुख्यमंत्री रहते मिल रहा था, किन्तु अधिकारी ने ‘डिटेक्ट, डिलीट एंड डिपोर्ट’ नीति लागू करने और ज़िला स्तर पर होल्डिंग सेंटर बनाने का निर्णय लेकर जता दिया है कि आखिरकार अवैध प्रवासियों को बाहर जाना ही होगा। इसी कड़ी में गृहमंत्री अमित शाह ने प्लेटफार्म एक्स पर ऐलान कर दिया कि ‘घुसपैठ और अप्राकृतिक जनसांख्यिकीय परिवर्तन किसी भी राष्ट्र के लिए वर्तमान और भविष्य के लिए बड़ी चुनौती है। इससे निपटने के लिए 15 अगस्त, 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में आबादी का संतुलन बिगड़ने की जांच के लिए उच्च स्तरीय जांच समिति गठित करने की बात कही थी, जो अब कर दी गई है। 
यह समिति धार्मिक और सामाजिक समुदायों के स्तर पर असामान्य जनसंख्या बदलाव के तरीके की जांच व समीक्षा करेगी।’ यह समिति सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति प्रकाश प्रभाकर नावलेकर की अध्यक्षता में काम करके एक साल के भीतर अपनी रिपोर्ट पेश करेगी।      
बंगाल, असम और पूर्वोत्तर राज्यों में स्थानीय बनाम विदेशी नागरिकों का मामला एक बड़ी समस्या बन गया है। जो यहां के सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक जीवन को लम्बे समय से झकझोर रहा है। बड़ी संख्या में घुसपैठ करके आए मुस्लिमों ने स्थानीय लोगों के न केवल आजीविका के संसाधनों को हथिया लिया है, बल्कि कृषि भूमि पर भी काबिज़ हो गए हैं। इस कारण राज्यों का जनसंख्यात्मक घनत्व बिगड़ रहा है। लिहाजा यहां के मूल निवासी और घुसपैठियों के बीच जानलेवा हिंसक झड़पें भी होती रहती हैं। नतीजतन अवैध और स्थायी नागरिकों की पहचान के लिए सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर राष्ट्रीय नागरिकता पत्रक (एनआरसी) बनाने की पहल की थी। इस निर्देश के मुताबिक 1971 से पहले असम में रह रहे लोगों को मूल नागरिक माना गया है। इसके बाद के लोगों को अवैध नागरिकों की सूची में दर्ज किया गया है। दरअसल घुसपैठिए अपनी नागरिकता सिद्ध नहीं कर पाते हैं, तो यह उन राजनीतिक दलों के लिए वजूद बचाए रखने की दृष्टि से खतरे की घंटी है, जो मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करते हुए घुसपैठ को बढ़ावा देकर अवैध नागरिकता को वैधता देने के उपाय करते रहे हैं। पहले सीपीएम और बाद में तृणमूल कांग्रेस इन घुसपैठियों को न केवल शरण देते रहे हैं, बल्कि उनके आधार, राशन और वोटर कार्ड भी बनवाते रहे हैं। नतीजा रहा कि बंगाल का हर चौथा वोटर मुस्लिम बताया जा रहा है। छह ज़िले तो ऐसे हैं, जहां मुस्लिमों की आबादी 66 प्रतिशत से भी अधिक हैं। इस बिगड़े जनसंख्यात्मक घनत्व का ही परिणाम रहा कि 34 साल सीपीएम और 15 साल तृणमूल ने बंगाल पर शासन करते हुए घुसपैठियों को संरक्षण देते रहे। 
यदि असम में अवैध घुसपैठ की बात करें तो 1951 से 1971 के बीच यहां में मतदाताओं की संख्या अचानक 51 प्रतिशत बढ़ गई। 1971 से 1991 के बीच यह संख्या बढ़कर 89 फीसदी हो गई। 1991 से 2011 के बीच मतदाताओं की तादाद 53 प्रतिशत बढ़ी। 2001 की जनगणना के आंकड़ों के हिसाब से यह भी देखने में आया कि असम में हिंदू आबादी तेज़ी से घटी और मुस्लिम आबादी तेज़ी से बढ़ी। 2011 की जनगणना में मुस्लिमों की आबादी और तेज़ी से बढ़ी। 2001 में जहां यह बढ़ोत्तरी 30.9 प्रतिशत थी, वहीं 2011 में बढ़कर 34.2 प्रतिशत हो गई। घुसपैठ के कारण असम में जनसंख्यात्मक घनत्व गड़बड़ा गया और सांप्रदायिक दंगों का सिलसिला शुरू हो गया। इसका सबसे ज्यादा खमियाजा बोडो आदिवासियों ने भुगता। 
इन घुसपैठियों को भारतीय नागरिकता देने के काम में असम राज्य कांग्रेस की भूमिका रही है। घुसपैठियों को अपना वोट बैंक बनाने के लिए कांग्रेसियों ने इन्हें बड़ी संख्या में मतदाता पहचान पत्र एवं राशन कार्ड तक हासिल कराए। असम को बांग्लादेश से अलग ब्रह्मपुत्र नदी करती है। इस नदी का पाट इतना चौड़ा और दलदली है कि इस पर बाड़ लगाना या दीवार बनाना नामुमकिन है। केवल नावों पर सशस्त्र पहरेदारी के ज़रिए घुसपैठ को रोका जाता है। लेकिन अब नरेंद्र मोदी और असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा के घुसपैठियों के विरुद्ध कड़े रुख के चलते अब इनकी वापसी  शुरू हो गई है। 
दरअसल 1971 से ही पूर्वोत्तर भारत, बंगाल, बिहार और दूसरे प्रांतों में घुसपैठ का सिलसिला जारी है। म्यांमार से आए 60,000 घुसपैठिए रोहिंग्या मुस्लिम भी कश्मीर, बेंगलुरु और हैदराबाद में गलत तरीकों से भारतीय नागरिक बनते जा रहे हैं। प्रधानमंत्री राजीव गांधी सरकार ने तत्कालीन असम सरकार के साथ मिलकर फैसला लिया था कि 1971 तक जो भी बांग्लादेशी असम में घुसे हैं, उन्हें नागरिकता दी जाएगी और शेष को भारत की ज़मीन से निर्वासित किया जाएगा। इस फैसले के तहत ही अब तक कई बार एनआरसी ने नागरिकों की वैध सूची जारी करने की कोशिश की, लेकिन मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति के कारण कांग्रेस, वामपंथी और तृणमूल कांग्रेस एनआरसी का विरोध करते रहे हैं। अतएव 2005 में सर्बानंद सोनोवाल बनाम भारत संघ मामले में असम में अवैध प्रवासियों के पहचान से जुड़े एक पुराने कानून को रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए कहा था कि असम में होने वाली भारी घुसपैठ ने राज्यों के नागरिकों के जीवन को आमूलचूल प्रभावित किया है। यह स्थिति एक तरह के अघोशित बाहरी आक्रमण जैसी है। 
बांग्लादेश के साथ भारत की कुल 4097 किलोमीटर लम्बी सीमा पट्टी है, जिस पर ज़रूरत के मुताबिक सुरक्षा के इंतजाम नहीं हैं। इस कारण गरीबी और भुखमरी के मारे बांग्लादेशी असम और बंगाल में घुसे जाते हैं। राशन कार्ड की उपलब्धता इन्हें बीपीएल के दायरे में होने के कारण मुफ्त अनाज की सुविधा दिला देती हैं। आसानी से बन जाने वाले बहुउद्देशीय पहचान वाले आधार कार्ड भी इन घुसपैठियों ने बड़ी मात्रा में हासिल कर लिए हैं। इन सुविधाओं की आसान उपलब्धता के चलते देश में घुसपैठियों की तादाद चार करोड़ से भी ज्यादा बताई जा रही है। यह अच्छी बात है कि अब इन्हें बाहर का रास्ता दिखाने की मुहिम युद्ध स्तर पर चल रही है। 

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