चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता

सुप्रीम कोर्ट का मतदाता सूचियों का विशेष पुन: संशोधन का फैसला देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में बहुत अहम कहा जा सकता है। संविधान ने प्रत्येक योग्य भारतीय को अपने प्रतिनिधियों का चयन करने हेतु वोट देने का अधिकार दिया है, जिसके आधार पर ही स्थानीय विधानसभा और लोकसभा के चुनाव द्वारा राज्य स्तर पर और केन्द्र में सरकारें बनती हैं। इस उद्देश्य के लिए राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव आयोग की स्थापना की गई है। राज्यों में स्थानीय सरकारों के चुनाव हेतु भी चुनाव अधिकारी नियुक्त किए जाते हैं। वर्ष 1950 से यह प्रक्रिया जारी है। पिछले वर्ष भारतीय चुनाव आयोग द्वारा देश भर में मतदाता सूचियों में विशेष रूप से पुन: संशोधन करने की घोषणा की गई थी। उसके बाद ही इस मामले पर अनेकानेक प्रतिक्रियाएं सामने आती रही हैं। शुरू की गई इस प्रक्रिया की इस कारण भी आलोचना होती रही क्योंकि इसके लिए तैयार किए गए फार्म और मांगे गए दस्तावेज़ का दायरा बहुत विस्तार वाला था, जिससे आमजन की उलझनें बढ़ीं थीं। इस संबंध  में मामले अदालतों में भी गए और अदालतों के निर्देश पर इस प्रक्रिया को आसान और संक्षिप्त करने का भी यत्न किया जाता रहा। देश की जनसंख्या विश्व भर में शिखर पर है। इसका निरीक्षण करना बेहद जटिल और कठिन काम है।
पिछले 40 वर्ष में जनसंख्या के मामले में बहुत कुछ बदल चुका है। लाखों-करोड़ों लोगों की मौतें, लोगों का स्थान बदलना, देश और प्रदेशों में प्रवास के साथ-साथ सीमाओं पर बड़ी संख्या में घुसपैठियों और शरणार्थियों का दाखिल होना आदि ऐसे कारण हैं, जिनका प्रत्येक पक्ष से सर्वेक्षण होना ज़रूरी है। ऐसी कवायद बेहद मुश्किल और उलझन भरी ज़रूर है परन्तु इसका हल किया जाना बेहद ज़रूरी है। चुनाव आयोग द्वारा शुरू की गई इस अहम कार्रवाई की बड़ी आलोचना इस कारण भी होती रही है कि कुछ प्रदेशों में चुनाव होने वाले थे, जहां तक निर्धारित समय में इस कार्रवाई को पूरा करना बेहद मुश्किल था। ऐसी हुआ भी।
बंगाल और बिहार जैसे राज्यों में चुनाव के समय लाखों ही मतदाताओं के काटे गए नामों के फैसले का समय पर समाधान न हो सका, जिससे बड़ा बवाल बन गया और अदालतें ऐसी शिकायतों से भर गईं। आज भी संबंधित राज्यों में ऐसा बवाल जारी है। नि:संदेह इस आधी-अधूरी प्रक्रिया में लाखों ही योग्य मतदाता अपने अधिकारका इस्तेमाल करने से वंचित रह गए हैं, परन्तु इसके बावजूद भारतीय चुनाव आयोग ने अपनी यह प्रक्रिया जारी रखी, जो निर्धारित अलग-अलग तिथियों के अनुसार चल रही है। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं संबंधी चीफ जस्टिस सूर्याकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने 29 जनवरी, 2026 को इस मामले की लम्बी सुनवाई के बाद फैसला आरक्षित रख लिया था, जिसका फैसला सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अब सुनाया गया है। अदालत ने स्पष्ट रूप से यह कहा है कि यह प्रक्रिया निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित बनाने के संवैधानिक अधिकार की गवाही देता है और यह संशोधन प्रक्रिया आयोग की मनमज़र्ी नहीं थी और न ही कानूनी दायरे से बाहर है, परन्तु इसके साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया की मूल ज़रूरत है और उचित उद्देश्य की ओर कदम है, परन्तु आयोग सीमित उद्देश्य से ही नागरिकता की जांच कर सकता है। दस्तावेज़ पर सन्देह होने या उनके सन्तोषजनक न लगने पर मतदाता सूची से नाम हटाए जाने या शामिल न किए जाने का वह फैसला कर सकता है, परन्तु इससे यह परिणाम नहीं निकाला जा सकता कि उक्त व्यक्ति भारतीय नागरिक नहीं है। नागरिकता का अंतिम फैसला सिर्फ नागरिकता एक्ट कानून 1955 के तहत ही किया जा सकेगा। आयोग का फैसला सिर्फ चुनावों के मामले तक ही सीमित होगा।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले संबंधी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कहा है कि आयोग मतदाताओं के साथ था और हमेशा रहेगा, क्योंकि राष्ट्र निर्माण का पहला कदम मतदाता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि चुनाव आयोग की सूचियों संबंधी संज्ञान, सुनवाई, एतराज़ संबंधी अपील करने के अधिकार सुरक्षित रखे गए हैं। कोर्ट ने यह भी कहा है कि आगामी विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूचियों के विशेष गहन संशोधन की प्रक्रिया का पूरा होना ज़रूरी है ताकि आगामी समय में चुनाव प्रक्रिया में अधिक से अधिक पारदर्शिता लाई जा सके।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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