डिजिटल तकनीक आधारित होनी चाहिए परीक्षा प्रणाली
भारत में भर्ती परीक्षा या प्रतियोगी परीक्षा के पेपर लीक होने के समाचार आते रहते हैं। कभी शिक्षक भर्ती परीक्षा, कभी पुलिस भर्ती, कभी मेडिकल या इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा और कभी सरकारी नौकरियों की परीक्षाएं। लाखों युवाओं की मेहनत कुछ लोगों के भ्रष्ट नेटवर्क और कमज़ोर परीक्षा व्यवस्था की वजह से बर्बाद हो जाती है। पेपर लीक अब केवल एक प्रशासनिक समस्या नहीं रह गई है बल्कि यह देश की प्रतिभा, युवाओं के भविष्य और व्यवस्था पर जनता के विश्वास के लिए गंभीर चुनौती बन चुकी है। वर्षों तक मेहनत करने वाले छात्र जब परीक्षा से पहले ही प्रश्न पत्र बाज़ार में बिकते हुए देखते हैं तो उनके मन में व्यवस्था के प्रति निराशा और आक्रोश पैदा होना स्वाभाविक है। सरकारें हर बार सख्त कानून बनाने, गिरफ्तारियां करने और जांच एजेंसियों को सक्रिय करने की बात करती हैं, लेकिन इसके बावजूद पेपर लीक की घटनाएं नहीं रुकतीं। इसका कारण यह है कि समस्या केवल अपराधियों की नहीं, बल्कि पूरी परीक्षा प्रक्रिया की संरचना में मौजूद कमज़ोरियों की है। जब तक परीक्षा प्रणाली को तकनीकी रूप से आधुनिक और सुरक्षित नहीं बनाया जाएगा, तब तक ऐसी घटनाओं पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता।
वर्तमान परीक्षा प्रणाली की सबसे बड़ी कमज़ोरी उसकी लम्बी और बहु-स्तरीय प्रक्रिया है। प्रश्न पत्र तैयार होने से लेकर उसके अंतिम रूप देने तक लम्बा समय लगता है, जैसे प्रिंटिंग, पैकेजिंग, ट्रांसपोर्टेशन और अंतत: परीक्षा केंद्र तक पहुंचना। इस पूरी प्रक्रिया में कई लोग शामिल होते हैं। यदि किसी परीक्षा का प्रश्न पत्र परीक्षा से कई दिन पहले ही प्रिंटिंग प्रेस, वितरण एजेंसी, गोदाम, ट्रांसपोर्ट या प्रशासनिक स्तर पर उपलब्ध हो तो उसे पूरी तरह सुरक्षित रखना बेहद कठिन हो जाता है। आज तकनीक और डिजिटल संचार के दौर में इस प्रकार की किसी भी सामग्री को किसी तक आसानी से पहुंचाया जा सकता है।
यही कारण है कि अब पारम्परिक परीक्षा मॉडल को बदलने का समय आ चुका है। जिस प्रकार बैंकिंग, रेलवे, टैक्सेशन और सरकारी सेवाएं डिजिटल हो चुकी हैं, उसी प्रकार परीक्षा प्रणाली को भी ए.आई और डिजिटल तकनीक आधारित बनाना होगा। पेपर लीक रोकने का सबसे प्रभावी तरीका यह है कि फाइनल प्रश्न पत्र पहले से तय न हो। यदि प्रश्न पत्र परीक्षा शुरू होने से कुछ मिनट पहले ही कम्प्यूटर द्वारा तैयार और जारी किया जाए तो लीक होने की संभावना लगभग समाप्त की जा सकती है।
इसके लिए सबसे पहले राज्यों को परीक्षा ज़ोन में विभाजित किया जा सकता है। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य को पांच अलग-अलग परीक्षा जोन में बांटा जा सकता है। इससे हर क्षेत्र में अलग प्रश्न पत्र भेजने की व्यवस्था की जा सकती है। इसके बाद अलग-अलग विशेषज्ञ पैनल से कई प्रश्न पत्र तैयार कराए जाएं। मान लीजिए दस विशेषज्ञ समूह दस अलग-अलग प्रश्न बैंक तैयार करें। इसके बाद ए.आई. और कम्प्यूटर आधारित सॉफ्टवेयर इन सभी प्रश्नों को विषय, कठिनाई स्तर और सिलेबस कवरेज के आधार पर बेतरतीब (रैंडम) तरीके से पुन: संयोजित करे। इस प्रक्रिया की सबसे बड़ी विशेषता यह होगी कि किसी भी व्यक्ति चाहे वह विशेषज्ञ हो, अधिकारी हो या तकनीकी टीम, उसे यह पता नहीं होगा कि अंतिम प्रश्न पत्र कौन-सा बनेगा।
फिर परीक्षा शुरू होने से लगभग 20 से 30 मिनट पहले ए.आई. सिस्टम स्वत: अलग-अलग जोन के लिए बेतरतीब तरीके से प्रश्न पत्र चुने और सीधे संबंधित परीक्षा केन्द्रों को कोडित (एन्क्रिप्टेड) डिजिटल नेटवर्क के माध्यम से भेज दे। हर परीक्षा केन्द्र पर सुरक्षित हाई-स्पीड प्रिंटर और डिजिटल कंट्रोल सिस्टम लगाए जा सकते हैं। प्रश्न पत्र वहीं स्थानीय स्तर पर तुरंत प्रिंट हो और सीधे छात्रों में बांट दिया जाए। इससे प्रिंटिंग प्रेस, ट्रांसपोर्ट, गोदाम और वितरण जैसी लम्बी भौतिक प्रक्रिया लगभग समाप्त हो जाएगी। यदि और अधिक सुरक्षा चाहिए तो परीक्षा कक्ष के पास ही कंट्रोल प्रिंटिंग यूनिट बनाई जा सकती है, जहां अंतिम मिनटों में प्रश्न पत्र प्रिंट होकर तुरंत सीलबंद तरीके से कक्ष में पहुंच जाए। यह मॉडल केवल सुरक्षित ही नहीं बल्कि आर्थिक रूप से भी अधिक प्रभावी हो सकता है।
ए.आई. आधारित रैंडमाइजेशन का एक और बड़ा लाभ यह होगा कि संगठित पेपर माफिया का नेटवर्क कमज़ोर पड़ जाएगा। आज कई बार पूरे राज्य में एक ही प्रश्न पत्र होता है। इसलिए यदि एक कॉपी लीक हो जाए तो पूरी परीक्षा प्रभावित हो जाती है, लेकिन यदि अलग-अलग जोन में अलग प्रश्न पत्र हों तो बड़े स्तर पर पेपर लीक की सम्भावना कम होगी। (अदिति फीचर्स)



