जेबों में छेद कर रहा है लगातार महंगा होता तेल 

आमिर खान प्रोडक्शंस ने 23 मई 2026 को अपने ऑफिशियल एक्स अकाउंट पर निरंतर बढ़ती महंगाई पर चिंता व्यक्त की साथ ही अपनी 2010 की चर्चित फिल्म ‘पीपली लाइव’, जिसमें महंगाई, ग्रामीण बेचैनी, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ड्रामा व राजनीति पर ज़बरदस्त व्यंग्य था, से ‘सखी, सईयां तो खूब ही कमात हैं, महंगाई डायन खाये जात है’ गाने का क्लिप भी शेयर किया। कुछ ही देर में इस पोस्ट के हज़ारों रि-पोस्ट हो गये, विशेषकर इस पंक्ति की वजह से ‘हर महीना उछले पेट्रोल डीज़ल’। क्लिप के वायरल होते ही उसे अस्पष्ट कारणों से हटा दिया गया, लेकिन सोशल मीडिया पर इस गीत को बहुत अधिक शेयर किया जा रहा है; क्योंकि 15 मई 2026 के बाद अगले 11 दिनों के भीतर चार बार पेट्रोल व डीज़ल के दाम बढाये गये हैं और वह लगभग 8-8 रूपये प्रति लीटर महंगे हो चुके हैं। चूंकि तेल के दाम बढ़ने से ट्रांसपोर्ट का खर्च बढ़ता है, इसलिए हर चीज़ महंगी हो जाती है। इसके अतिरिक्त चिंता यह भी है कि खाद के न सिर्फ दाम बढ़ रहे हैं बल्कि खाद की किल्लत भी है, जिससे किसानों की परेशानी लगातार बढ़ती जा रही है। 
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 25 मई 2026 को सीधी के 37वें स्थापना दिवस पर बोलते हुए कहा कि पश्चिम एशिया संकट के बाद वैश्विक खाद के दामों में अकल्पनीय वृद्धि हो गई है। सीतारमण ने यह तो नहीं बताया कि खाद के दामों में कितनी वृद्धि हुई है, लेकिन उन्होंने जनता से आग्रह किया कि वर्तमान स्थिति में वह 3एफ-फ्यूल (ईंधन), फर्टिलाइज़र (खाद) व फोरेक्स की बचत पर फोकस करें। उनके अनुसार, पश्चिम एशिया का संकट केवल कूटनीतिक या भू-राजनीतिक मुद्दा नहीं है बल्कि इसका दूरगामी परिणाम आम आदमी व छोटे व्यापारों पर भी पड़ रहा है, जिससे यह भारत सहित सभी देशों के लिए चुनौती बन गया है। गौरतलब है कि बेंचमार्क यूरिया के दामों में लगभग 50 प्रतिशत वृद्धि के बाद यह 720-725 डॉलर प्रति मीट्रिक टन हो गया है। यही नहीं स्ट्रेट ऑ़फ होर्मुज के बंद होने से खाद की सप्लाई भी प्रभावित हुई है। इस वजह से किसान बहुत मुसीबत में हैं। 
बहरहाल, 25 मई 2026 की सुबह जब लोगों की आंखें खुलीं तो उन्हें यह जानकर धक्का लगा कि सवेरे 6 बजे ही पेट्रोल के दाम में 2.60 रूपये प्रति लीटर और डीज़ल के दाम में 2.71 रूपये का इज़ाफा कर दिया गया है। यह पिछले 11 दिनों के दौरान चौथी वृद्धि है, जिससे दोनों पेट्रोल व डीज़ल के दामों में कुल मिलाकर लगभग 8-8 रूपये महंगे हो गये हैं। ध्यान रहे कि स्थानीय लेवी के कारण हर राज्य में पेट्रोल व डीज़ल की कीमत समान नहीं होती है। दिल्ली में अब पेट्रोल 102.12 रूपये प्रति लीटर हो गया है और डीज़ल 95.20 रूपये प्रति लीटर हो गया है। मुंबई में पेट्रोल 111.21 रूपये प्रति लीटर और डीज़ल 97.81 रूपये प्रति लीटर हो गया है। कोलकाता में पेट्रोल 113.51 रूपये प्रति लीटर और डीज़ल 99.82 रूपये प्रति लीटर हो गया है। चेन्नै में पेट्रोल 107.77 रूपये प्रति लीटर और डीज़ल 99.55 रूपये प्रति लीटर हो गया है। तेल के दाम अब मई 2022 के बाद इस समय सबसे अधिक हैं, जबकि 2 वर्ष से अधिक तक वह लगभग स्थिर रहे थे, सिवाय मार्च 2024 के जब राष्ट्रीय चुनाव से पहले उनमें 2 रूपये प्रति लीटर की कटौती की गई थी। आश्चर्य की बात तो यह है कि भारत में तेल के दाम उस समय बढ़ाये गये जब ईरान युद्ध की संभावित समाप्ति को देखते हुए तेल के वैश्विक दामों में ज़बरदस्त गिरावट आयी कि ब्रेंट क्रूड, जो वैश्विक तेल दामों का बुनियादी बेंचमार्क है, में 5 प्रतिशत की गिरावट आयी। 
यहां यह बताना भी आवश्यक है कि भारत में तेल पर दोनों केंद्र व राज्यों की लेवी बहुत अधिक है। अगर इसे कम कर दिया जाये तो न सिर्फ तेल के दामों को कम रखा जा सकता है बल्कि अन्य वस्तुओं पर बढ़ती महंगाई को भी नियंत्रित रखा जा सकता है, जिससे ज़ाहिर है आम आदमी को राहत मिलेगी। लेकिन सरकारें अपनी व कम्पनियों की कमाई को कम करने की बजाये आमजन की जेब पर ही बोझ डालना चाहती हैं, उनसे ही बचत व बलिदान की उम्मीद रखी जाती है। गौरतलब है कि केंद्र सरकार की पैट्रोल पर प्रति लीटर लेवी 19.90 रूपये है और राज्य सरकारों का स्थानीय सेस के साथ अलग-अलग वैल्यू एडेड टैक्स (वैट) है। इन करों को जब जोड़ दिया जाता है तो वह पंप पर जिस भाव फुटकर तेल मिलता है उसका लगभग 50-55 प्रतिशत हिस्सा बैठता है। आसान शब्दों में इसका अर्थ है कि अगर आपके शहर में 100 रूपये प्रति लीटर पैट्रोल पंप पर मिल रहा है तो उसमें से 50-55 रूपये केंद्र व राज्य सरकार की जेब में जाते हैं। अगर सरकारें देश हित में अपनी कमाई को आधा कर दें तो पैट्रोल आसानी से 70-75 रूपये प्रति लीटर मिल सकता है। 
लेकिन इस तथ्य पर इलेक्ट्रॉनिक चैनल का कोई एंकर कभी चर्चा नहीं करेगा। वह तो पब्लिक को यह समझाने का प्रयास करेगा कि युद्ध की वजह से संकट है या महंगाई की तुलना पाकिस्तान से करने लगेगा। जंग से निश्चितरूप से परेशानी तो होती है, लेकिन हंगामी हालात का प्रबंधन आउट-ऑ़फ-द-बॉक्स सोच कर भी तो किया जा सकता है, मसलन, सरकारें अपना कर कम कर दें व तेल कम्पनियां अपने मुनाफे को कम करें। जब कच्चा तेल 45-50 डॉलर प्रति बैरल हो गया था, तब भी सरकारों व तेल कम्पनियों ने अपने मुनाफे को कम नहीं किया था और तरह-तरह के बहाने बनाकर महंगा तेल ही बेचा जा रहा था। उस समय अन्य देशों ने अपने यहां तेल के दाम घटाये थे, लेकिन हमारे इलेक्ट्रॉनिक चैनलों के एंकर उस बात का भी ज़िक्र नहीं करते हैं। 
महंगाई का असर यह हुआ है कि जिन घरों की औसत आय 8-10 हज़ार रूपये मासिक है, उन्होंने सुबह नाश्ते में पूरी-कचौड़ी या परांठे की जगह सूखी रोटी खानी शुरू कर दी है; क्योंकि जो सरसों का तेल कुछ माह पहले तक 190 रूपये प्रति लीटर मिल रहा था, अब वह 225 रूपये प्रति लीटर हो गया है; दिन में चाय तीन बार की जगह सिर्फ एक बार बनने लगी है; क्योंकि कुकिंग गैस सिलैंडर 850 रूपये की जगह 910 रूपये का हो गया है; स्कूटर को कपड़ा ढककर एक तरफ खड़ा कर दिया है; क्योंकि पैट्रोल 100 रूपये प्रति लीटर से अधिक का मिलने लगा है और बच्चे सेब, केले आदि फलों के लिए बस तरसते रहते हैं। क्योंकि बचत सारी खत्म हो गई है और आमदनी में वृद्धि होने की बजाये कमी हुई है या वह कुछ वर्षों से स्थिर है। दरअसल, बढ़ते दामों का दबाव उस समय आया है, जब अर्थव्यवस्था अति धीमी मंदी से गुज़र रही है और घरों को वेतन में कटौती, रोज़गार खोने और डॉलर के मुकाबले में रुपया शतक लगाने के करीब पहुंच गया है।

-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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