हम नहीं सुधरेंगे
एक बहुत बड़े टोकरे में कई मेंढक रहते थे। अब टोकरा बड़ा और ऊंचा था, इसलिए उन्हें तो वह कुएं जैसा ही लगता था। कुआं क्यों, अन्धकूप क्योंकि नीचे जहां वे रहते थे वहां तो अंधेरा भी घिरा रहता। चाहे उनके टोकरे के बाहर ऊंचे प्रासादों से कुछ बड़े लोग चिल्लाते रहते, अरे सवेरा हो गया। देखो, कितना उजाला है। जैसे नया सूरज उगा हो। सब ओर कितना आनन्द है। देश का नव-निर्माण हो गया है। नये देश के चन्द लोग हैं जहां हर आपदा या विपदा उनके लिए खुशियों का सन्देश लाती है। उनकी कुर्सी का कद और ऊंचा कर देती है। उनके खजानों में अकूत धन भरने का एक और रास्ता मिल जाता है।
देश की आपदा कमी के मनोविज्ञान से खिलवाड़ करती है। चोर दरवाज़ों के रास्ते खोल देती थी और कुछ लोग मूंछें उमेठ कर कहते हैं, हम हर आपदा का सिर अपने कदमों में झुका लेते हैं। ऐसे-ऐसे दांव चलते हैं, कि बड़े-बड़े शातिर भी शरमा जाएं। महामारी फैलती है तो हम अपने देश में टीकों के स्वनिर्माण का गर्व करते हैं। चाहे विदेशी मंडियों से वे प्रभावहीन, थोक के भाव लौटा दिया जाएं। यहां तरक्की दर बढ़ती है, तो हम कहते हैं, यह दुनिया में सबसे अधिक हो गई।
लेकिन बड़े टोकरों में गिरे हुए मेंढकों जैसे लोग इस तरक्की दर को कहां तलाश करें? उनके लिए तो अंधेरा और भी घना हो गया, और कर्महीनता का विकल्प लंगर, रियायती अनाज बन गया। देखते नहीं हो, इसके नाम पर जमघट अब नौकरी दिलाऊ खिड़कियों के बाहर नहीं लगता, रियायती रेवड़ियां बांटने वाली दुकानों के बाहर यह कतार सजती है। चुनाव करीब आते हैं तो यहां खेल प्रतियोगिताओं की जगह राजनीतिक दलों की एजेंडा प्रतियोगिताएं ले लेती हैं। ये एजेंडा प्रतियोगिताएं एक दूसरे के साथ अधिक से अधिक रियायती रेवड़ियां बांटने की होड़ लगाते हैं। कहीं बिजली-पानी मुफ्त है, तो कहीं यात्राओं में बेटिकट जाने की इजाज़त, और कहीं खातों में बिना काम पैसे आ रहे हैं। देखा यह जाता है कि किसने दूसरे से अधिक इन खातों से पैसे भेजने का वायदा किया। जिसने मीठा अधिक डाला, उसकी विजयश्री भी अधिक मीठी।
यहां तरक्की का अर्थ है आपके यहां कितने अरबपति बढ़े। यहां फटीचर की न कोई गिनती है, न उन्हें गिनने की ज़ेहमत। उनकी खोज खबर अनुकम्पा की राजनीति ले रही है न। इसीलिए तो दुनिया में आर्थिक शक्ति के सूचकांक में जब आप एक सीढ़ी ऊपर चढ़ते हो, तो सस्ते रियायती अनाज बांटने की अवधि में एक विस्तार और हो जाता है।
दुनिया में सबसे अधिक आबादी हो जाने वाला देश हो जाने का गर्व है तो इस बात का भी गर्व कि हम अस्सी करोड़ लोगों में सस्ता अनाज बांट रहे हैं, जोकि दुनिया के सभी देशों से अधिक है। उम्मीद है कि जब हमने आज़ादी का शतक मनाते हुए अपने देश की आर्थिक सामर्थ्य के सर्वोपरि हो जाने का सपना देखा है, वहां सांस्कृतिक गौरव के शिखर पर चढ़ कर दुनिया का गुरुदेव बन जाने का सपना भी देख लिया है। चाहे इस बीच टोकरों की कतार जो अब मेंढकनुमा करोड़ों लोगों के लिए अन्धकूप बन गई है, वह यह सुसंवाद भी पा रही है, कि उनके लिए रियायती अनाज बांटने की अवधि अनिश्चित काल के लिए बढ़ा दी गई है। बेशक यह आर्थिक विषमताओं और विसंगतियों भरा देश है। तभी तो शायद शुरू से सुनते आये हैं, कि यहां शेर और बकरी एक ही घाट पर पानी पीते हैं। यह दीगर बात है कि पानी पर कब्ज़ा सदा की तरह चन्द शेरों का रहता है, और बकरियां घूंट भर पानी के लिए मिमियाती रहती हैं।
इससे कोई हैरान नहीं होता, क्योंकि यहां ‘सब चलता है’ का माहौल है। नेतागण नई योजनाओं की घोषणा और उनकी सफलता का उत्सव कभी कभी साथ-साथ मना लेते हैं और टोकरों के अंधेरे में कैद प्राणी कहते हैं ‘पानी विच मनी प्यासी, मोहे सुन-सुन आवत हंसी।’ लेकिन टोकरों में दशकों से कैद मेंढकनुमा लोगों का व्यवहार भी स्थितप्रज्ञ हो गया है। कभी बदलता नहीं। एक सी धरातल पर जीते ये प्राणी हमेशा एक दूसरे को गाली देते हैं, और अपने आपको दूसरे से बेहतर होने का विश्वास पालते हैं, लेकिन जैसे ही कोई मेंढक गुप्त कंधों का सहारा लेकर इन टोकरों से बाहर कूद जाने की गुस्ताखी करता है, दूसरे मेंढक उसकी टांग पकड़ कर उसे नीचे गिरा लेने की भरपूर कोशिश करते हैं। अगर कोई किस्मत का धनी न गिरे और बाहर निकल जाए, तो बाहर प्रांगण में एक बन्दर कीली उसका स्वागत करती है। ऊंचे प्रासादों वाले बड़े लोग उसकी पीठ थपथपा दें तो बाहर आया प्राणी कूद कर कीली के शिखर पर चढ़ जाता है। थपथपाहट हटी तो उसे नीचे गिर कर धरातल पर पहुंच जाना है। बस बन्दर कीली पर चढ़ना उतरना ही उसका भाग्य है। इससे ऊपर जाने की वह न सोचे क्योंकि आगे परिवारवाद ने सर्वाधिकार सुरक्षित कर रखे हैं। जानते तो हो, यहां राजा का बेटा राजा होता है, और नेता का बेटा नेता।



