पंजाब के शहरी भविष्य की चुनौतियां

आज पंजाब के 8 प्रमुख नगर निगमों जिनमें बठिंडा, मोगा, अबोहर, साहिबजादा अजीत सिंह नगर (मोहाली), बटाला, कपूरथला, पठानकोट और बरनाला शामिल हैं, सहित 102 स्थानीय नगर निकायों की चुनावी प्रक्रिया की घड़ी आ पहुंची है। राजनीतिक और मीडिया हलकों में अक्सर इन स्थानीय निकाय चुनावों को वह महत्व नहीं दिया जाता, जो विधानसभा या लोकसभा चुनावों के हिस्से आता है। परन्तु यदि गहराई से देखा जाए तो आम लोगों के दैनिक जीवन की सुगमता, गलियों-सड़कों की रोशनी, जल-निकासी के प्रबंध और नागरिक सुविधाओं का सीधा सरोकार इन्हीं स्थानीय संस्थाओं की कार्यप्रणाली से जुड़ा होता है। मेरा मकसद किसी उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करने का कोई संदेश जारी करना नहीं है, क्योंकि लोकतंत्र में मत का प्रयोग हर नागरिक का व्यक्तिगत और पवित्र अधिकार है। परंतु एक चिंतक और पंजाब हितैषी होने के नाते हमारा यह कर्तव्य बनता है कि हम इस चुनावी प्रक्रिया की गंभीरता और पंजाब के शहरी भविष्य की दिशा पर एक सार्थक और डेटा-आधारित (आंकड़ा-आधारित) दृष्टि डालें।
यदि पिछले एक दशक के दौरान देश के भीतर हुए शहरी विकास का निष्पक्ष मूल्यांकन करें, तो केंद्र सरकार की नीतियों और वित्तीय सहायता ने बुनियादी बदलाव लाए हैं। इन योजनाओं के केंद्र में न केवल बड़े बजट हैं, बल्कि शहरों के प्रतिस्पर्धात्मक विकास के लिए नए वित्तीय साधन भी शामिल किए गए हैं। 15वें वित्त आयोग ने देश भर की स्थानीय शहरी संस्थाओं के लिए कुल 1,21,055 करोड़ रुपये की एक बड़ी राशि निर्धारित की है, जिसमें से 82,859 करोड़ रुपये छोटे शहरों और कस्बों के लिए हैं, जबकि 38,196 करोड़ रुपये बड़े महानगरों के लिए आरक्षित किए गए हैं। इसी विशेष प्रावधान के अंतर्गत ‘मिलियन-प्लस सिटीज चैलेंज फंड’ की स्थापना की गई है, जो कोई साधारण अनुदान नहीं बल्कि शहरों के प्रदर्शन पर आधारित एक पुरस्कार राशि है। इसके तहत 19,098 करोड़ रुपये शहरों की वायु गुणवत्ता सुधारने और शेष 19,098 करोड़ रुपये स्वच्छ पेयजल की उपलब्धताए रेन-वॉटर हार्वेस्टिंग और जल-निकासी प्रबंधों के सुधार पर जारी किए जाते हैं। इसके साथ ही वर्ष 2015 में शुरू किए गए ‘स्मार्ट सिटीज मिशन’ के तहत चयनित प्रत्येक शहर के लिए केंद्र द्वारा 500 करोड़ रुपये की समान वित्तीय हिस्सेदारी का प्रबंध किया गया है, ताकि शहरों को डिजिटल और आधुनिक बुनियादी ढांचे से लैस किया जा सके। ‘अमृत’ योजना के माध्यम से जहां देश के सभी 4,700 कस्बों में 2.68 करोड़ नल कनेक्शन देने का लक्ष्य रखा गया है, वहीं ‘स्वच्छ भारत मिशन’ और ‘पीएम आवास योजना’ के जरिए शहरी गरीबों को पक्की छत और रेहड़ी-पटरी वाले भाइयों को ‘पीएम स्वनिधि’ के माध्यम से आर्थिक प्रोत्साहन दिया जा रहा है। ये सभी योजनाएं केवल कागजी पुलिंदा नहीं हैं, बल्कि ये वास्तविक फंड और वास्तविक संभावनाएं हैं, जो किसी भी राज्य की तकदीर बदल सकती हैं। शर्त केवल यह है कि स्थानीय नेतृत्व में इन्हें धरातल पर उतारने की क्षमता और नीयत हो।
परन्तु जब हम पंजाब की वर्तमान स्थिति पर दृष्टिपात करते हैं, तो मन अशांत और चिंतित हो जाता है, क्योंकि केंद्रीय योजनाओं और विशेष फंडों का लाभ उठाने में पंजाब का प्रशासनिक रवैया अत्यंत निराशाजनक रहा है। पंजाब के तीन प्रमुख शहर-लुधियाना, अमृतसर और जालंधर-‘मिलियन-प्लस’ शहरों की श्रेणी में आने के बावजूद ‘अर्बन चैलेंज फंड’ का पूरा लाभ नहीं ले सके। हमारे स्थानीय निकाय केंद्र द्वारा निर्धारित सुधारों, जैसे कि शहरी संस्थाओं के खातों का समय पर ऑडिट करवाना और संपत्ति कर (प्रॉपर्टी टैक्स) प्रणाली को डिजिटल करना, को पूरा करने में पूरी तरह विफल रहे। इस प्रशासनिक शिथिलता और राज्य सरकार द्वारा अपने हिस्से का फंड जारी करने में की गई देरी के कारण स्मार्ट सिटी परियोजनाओं की गति अत्यंत धीमी रही है और करोड़ों रुपये के अनुदान केंद्र के पास बिना उपयोग के पड़े रहे हैं। इसी ढुलमुल रवैये के कारण आज भी हमारे कई शहरी परिवार टैंकरों पर निर्भर हैं और मानसून के दिनों में शहरों के नाले उफन जाते हैं क्योंकि सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांटों का विस्तार शहर की बढ़ती आबादी के अनुपात में नहीं किया गया। स्वच्छ भारत मिशन और आवास योजना के मामले में पंजाब, गुजरात के सूरत और मध्य प्रदेश के इंदौर जैसे शहरों से काफी पीछे रहकर ‘ओ.डी.एफ.’ रैंकिंग में पिछड़ गया है, जिसका सीधा खमियाज़ा आम जनता को टूटी सड़कों, दूषित पानी और बदहाल जीवन के रूप में भुगतना पड़ रहा है।
स्थानीय निकाय चुनाव वास्तव में राजनीतिक शक्ति के प्रदर्शन का मैदान नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर शासन की शुद्ध परीक्षा होते हैं, क्योंकि आपका चुना हुआ वार्ड प्रतिनिधि ही बजट प्रक्रिया, निविदाओं (टेंडर्स) की स्वीकृति और शहर के बुनियादी ढांचे की रूपरेखा तय करता है। आज मतदान करते समय हमें अंधी निष्ठा से ऊपर उठकर और भयमुक्त होकर उम्मीदवार की योग्यता, जवाबदेही और वित्तीय प्रबंधन की समझ को मुख्य आधार बनाना होगा, ताकि केंद्रीय फंडों और अर्बन चैलेंज फंड जैसे अनुदानों को बिना उपयोग के बर्बाद होने से बचाया जा सके। लोकतंत्र में मतदान करना केवल एक अधिकार नहीं, बल्कि हमारी नैतिक जिम्मेदारी है— हमारे अपने लिए, हमारे समाज के लिए और हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए। इसलिए आज जब आप पोलिंग बूथ की ओर जाएं, तो अपने मन से यह सवाल ज़रूर पूछें कि कौन है वह उम्मीदवार जो यह सुनिश्चित करेगा कि हमारे शहर के विकास की योजनाएं केवल कागजों में दफन न रहें? कौन है वह नेता जो नौकरशाही को जनता के प्रति जवाबदेह बनाने का साहस रखता है और कौन है वह प्रतिनिधि जो पंजाब के हिस्से के विकास फंडों को पूरे हक, दिलेरी और प्रशासनिक विशेषज्ञता के साथ लाकर हमारे शहरों का उज्ज्वल भविष्य संवार सके? आइए, अपने मत की शक्ति से एक सार्थक बदलाव की शुरुआत करें और पंजाब के शहरों को प्रगति के एक नए और आधुनिक युग की ओर लेकर चलें।

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