बंगाल सरकार की चुनौती

पश्चिम बंगाल में विधानसभा के हुए चुनाव में कड़े मुकाबले के बाद भारतीय जनता पार्टी को जीत प्राप्त हुई है। इन चुनावों में मुकाबला भाजपा और तृणमूल कांग्रेस की बजाय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच ही बना दिखाई देता था। ममता ने 15 वर्ष तक प्रदेश का प्रशासन चलाया। हम उनके प्रशासन को अच्छा नहीं मानते क्योंकि इस अवधि में बंगाल आर्थिक रूप से मूलभूत सुविधाओं के पक्ष से पिछड़ा ही दिखाई देता रहा है। प्रदेश और केन्द्र सरकार के बीच लगातार खिचाव बना रहा था। इसलिए केन्द्र सरकार द्वारा भी यहां के विकास कार्यों में उचित उत्साह नहीं दिखाया गया था। ममता ने भी केन्द्र के प्रति लगातार अपना बेरुखी वाला रवैया ही धारण किये रखा। इस अवधि में कोई भी बड़ा उद्योग यहां न लगा सका और बड़ी कम्पनियां भी यहां आने से परहेज़ करती रहीं।
इससे पहले लम्बी अवधि तक यहां मार्क्सवादी पार्टी के नेतृत्व में वामपंथी पार्टियों का शासन रहा। ज्योति बसु बड़े ऊंचे कद वाले नेता थे। आखिर उन्होंने भी प्रदेश को आर्थिक मंदी से निकालने के लिए भारतीय उद्योगपतियों के साथ-साथ विदेशी कम्पनियों को भी प्रदेश में अपने प्रोजैक्ट लगाने और कारोबार बढ़ाने की अपीलें की थीं, परन्तु इस पक्ष से वह ज्यादा सफल नहीं हो सके। चाहे वामपंथी पार्टियों का अपना एजेंडा था जिस पर वे चलने का यत्न भी करती रहीं परन्तु इसके साथ ही उन्होंने भारतीय संविधान की मुख्य भावनाओं को हमेशा अपने सामने रखा, परन्तु उनके लम्बी अवधि तक चले प्रशासन में भारी त्रुटियां आना शुरू हो गई थीं। निम्न स्तर तक भी तानाशाही रुचियां पनपने लगी थीं, जिस कारण बड़ी संख्या में जन-साधारण सरकार से नाराज़ होने शुरू हो गए थे, परन्तु वामपंथी प्रशासन ने भी और ममता के प्रशासन ने भी अपने समय में अपनी पुरानी परम्पराओं को कायम रखते हुए समाज में भाईचारक नैतिक-मूल्यों को बनाये रखने का यत्न किया था। चाहे बंगाली मुख्य रूप में देवी के पुजारी रहे हैं परन्तु प्रशासनिक स्तर पर उस समय सभी धर्मों और विश्वासों को एक समान सम्मान मिलता रहा था। किसी के साथ भी जाति-बिरादरी या धर्म के आधार पर भेदभाव सामने नहीं आए। इससे पहले वहां कांग्रेस शासन का भी लगातार ऐसा ही व्यवहार बना रहा परन्तु भाजपा ने पांव जमाते ही बंगाली समाज में धर्म के आधार पर सचेत रूप में फूट डालना शुरू कर दिया है। बहुसंख्यक बंगालियों को धर्म के आधार पर भड़का कर अपने साथ खड़ा करने का यत्न किया है। इस यत्न में वे बड़ी सीमा तक सफल भी हुए। चुनाव के दौरान भी फूट डालने की ये भावनाएं अक्सर उभरती रहीं, जिन्हें भाजपा अपने पक्ष में भुगताने में सफल रही। पहली बार वहां भाजपा की हुई भारी जीत में उपरोक्त नीतियों को भी कारगर माना गया है। सुवेन्दु अधिकारी ने कुर्सी सम्भालते ही राष्ट्रीय गीत के नाम पर लोगों में मन में कई तरह प्रश्न खड़े कर दिए हैं। मदरसों तक में भी इस गीत को गाना ज़रूरी बनाने के निर्देश जारी किए गये हैं, जिससे एक बड़े समुदाय के मन में कई तरह के प्रश्न पैदा हो गए हैं।
हम पश्चिम बंगाल में बांग्लादेशियों की घुसपैठ को किसी भी तरह से जायज़ नहीं समझते, परन्तु इसके साथ ही इस मामले को जिस ढंग से निपटाने के दावे किए जा रहे हैं, उनसे माहौल के अधिक दूषित होने की सम्भावना बन गई है। आगामी समय में भी सामाजिक और धार्मिक मामलों में भी लिये गये ऐसे फैसले बंगाली समाज में बड़ी दरारें डालने का कारण बन सकते हैं। ऐसे क्रियान्वयन और पैदा की जा रही मानसिकता नि:संदेह देश के धर्म-निरपेक्ष और लोकतांत्रिक नैतिक-मूल्यों वाले संविधान की भावनाओं के विपरीत सिद्ध हो सकते हैं। ऐसी नीतियां पहले ही खंडित होते जा रहे देश और समाज की मान्यताओं को और भी कमज़ोर करने में ही सहायक होंगी।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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