पहाड़ों और फूलों का जीवंत लोक उत्सव है येरकौड उत्सव

दक्षिण भारत के खूबसूरत हिल स्टेशनों की बात हो और तमिलनाडु के शांत, हरियाले और सुगंधित पर्वतीय नगर येरकौड का नाम न लिया जाए, ऐसा संभव ही नहीं है। अपने कॉफी बगानों, संतरे के बागीचों और धुंध से ढकी पहाड़ियों व झीलों के लिए मशहूर पर्वतीय नगर येरकौड केवल प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही नहीं जाना जाता बल्कि अपने रंगीन सांस्कृतिक उत्सव ‘येरकौड उत्सव’ के लिए भी पूरी दुनिया में मशहूर है। यही कारण है कि हर साल येरकौड उत्सव के दौरान देश-विदेश से हजारों पर्यटक विशेषकर विदेशों में बसे तमिल लोग इसमें शामिल होने के लिए भारत आते हैं। हर वर्ष आयोजित होने वाला यह उत्सव येरकौड की स्थानीय संस्कृति, जनजातीय परम्पराओं, कृषि, फूलों और लोक उत्सव का अनोखा संगम होता है। आम तौर पर मई के महीने में ये होने वाला यह उत्सव इस साल 24 मई से शुरु होकर 26 मई 2026 तक मनाया जायेगा।
इस सांस्कृतिक उत्सव का आयोजन तमिलनाडु पर्यटन विभाग करता है। जिस कारण इस मौसम में यह शहर पर्यटकों के लिए चरम आकर्षण का केन्द्र बन जाता है। येरकौड दरअसल सेलम ज़िले में स्थित एक प्रसिद्ध हिल स्टेशन है। इसे गरीबों का ऊटी भी कहा जाता है। क्योंकि यहां का प्राकृतिक सौंदर्य किसी भी मामले में ऊटी से कम नहीं है। बावजूद इसके ऊटी के मुकाबले इसे काफी कम खर्च में भी घूमा जा सकता है। समुद्र तल से 1500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह हिल स्टेशन शेवरॉय पहाड़ियों पर बसा है, जहां कॉफी, मसालों, फूलों और फलों की शानदार और सघन खेती होती है। लेकिन येरकौड सिर्फ अपनी प्राकृतिक सुंदरता और फल-फूलों की खेती के लिए ही नहीं जाना जाता बल्कि यह जनजातीय संस्कृति, लोकनृत्य, पारंपरिक संगीत और स्थानीय हस्तशिल्प का भी गढ़ है। ये सब खूबियां मिलकर इसे सांस्कृतिक रूप से बेहद समृद्ध बनाती हैं। इन्हीं खूबियों को दुनिया के सामने लाने के लिए हर साल येरकौड उत्सव मनाया जाता है।
इस उत्सव की शुरुआत तमिलनाडु पर्यटन विभाग और स्थानीय प्रशासन ने मुख्यत: दो उद्देश्यों के लिए की थी। पहला येरकौड की सांस्कृतिक पहचान और स्थानीय परंपराओं को बढ़ावा देने के लिए तथा दूसरा पर्यटन को प्रोत्साहित करने के लिए। धीरे-धीरे यह आयोजन केवल पर्यटकों को लुभाने वाला उत्सव ही नहीं रहा बल्कि स्थानीय लोगों की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का प्रमुख मंच बन गया। आज इस उत्सव से जुड़कर सैकड़ों कलाकारों, किसानों, जनजातीय समुदायों, हस्तशिल्पियों, लोकनर्तकों और संगीतकारों की भी न केवल पहचान बनी है बल्कि यह उनकी समृद्धि का जरिया भी बना है। तमिलनाडु की पहचान को चमकदार बनाने में भी येरकौड उत्सव ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। येरकौड का सांस्कृतिक उत्सव शेवरॉय पहाड़ियों में रहने वाली जनजातियों की सांस्कृतिक आत्मा है। उनके लोकनृत्य, उनकी पारंपरिक वेशभूषा, उनका स्थानीय लोकसंगीत, रीति-रिवाज, इस उत्सव के न केवल आकर्षण हैं बल्कि उन्होंने तमिलनाडु और दुनिया के दूसरे हिस्सों को भी अपनी ओर आकर्षित किया है। यही कारण है कि दक्षिण भारत में बड़े पैमाने पर लोग इस मौके पर यहां आकर अपनी रोजमर्रा की भागदौड़ भरी ज़िंदगी के बीच आह्लादित करने वाला सुकून के पल महसूस करते हैं। 
इस उत्सव में तमिल लोकसंगीत, नादस्वरम, करगट्टम, और कवड़ी की पारंपरिक धुनों तथा स्थानीय नृत्य प्रस्तुतियों के कारण यह उत्सव अलौकिक बन जाता है। शाम ढलते ही पूरा शहर लोकधुनों और अलग-अलग जगहों पर हो रहे सांस्कृतिक कार्यक्रमों से जीवंत हो उठता है। इस उत्सव में हिस्सा लेने आये लोग यहां की विशेष रूप से मशहूर कॉफी और कालीमिर्च को लौटते वक्त अपने साथ लेकर जाते हैं और संतरे का स्वाद तथा फूलों की खुशबू यहां रहने के दौरान खूब महसूसते हैं। इस उत्सव में स्थानीय फलों और कृषि उत्पादों की विशेष झांकियां लगायी जाती हैं, जिससे आने वाले पर्यटकों को शुद्ध और विशिष्ट कृषि उत्पाद तो हासिल होते ही हैं, यहां के किसानों की अच्छी-खासी आय भी इस उत्सव के जरिये हो जाती है। इसलिए यह सिर्फ स्थानीय लोक संस्कृति का उत्सव भर नहीं है बल्कि जीवनशैली और जीवन यापन का भी संगीतमय उत्सव है। यहां का हस्तशिल्प भी अपनी तरह की विशेष खूबी रखता है। विशेषकर बांस के उत्पादों के लोग दीवाने हैं और इस सबके साथ-साथ येरकौड लोक उत्सव की दो और महत्वपूर्ण साझेदारियां होती हैं, जिसमें एक है फ्लावर शो और दूसरा है नौका दौड़। फ्लावर शो के दौरान यहां पाये जाने वाले सैकड़ों किस्म के खुशबूदार रंग-बिरंगे फूलों की कलात्मक सजावट देखने को मिलती है, जो पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देती है। साथ ही इस उत्सव के दौरान येरकौड झील में एक बहुचर्चित बोट रेस भी आयोजित की जाती है, जो इस उत्सव का एक विशेष आकर्षण होती है। दूर-दूर से आये पर्यटक उत्सव के दौरान नौकायन का भरपूर आनंद लेते हैं। 
अंत में स्थानीय कलाकार अपनी लोकलुभावन वेशभूषाओं में जुलूस निकालते हैं तथा तमिल लोक जीवन की शानदार झांकी प्रस्तुत करते हैं। यह उत्सव एक साथ न केवल यहां की सांस्कृतिक उत्सवधर्मिता को प्रस्तुत करता है बल्कि आधुनिक जीवनशैली और पारंपरिक लोक संस्कृति का एक लुभावना फ्यूजन भी प्रदर्शित करता है। इसलिए येरकौड उत्सव को स्थानीय संस्कृति के संरक्षण का महत्वपूर्ण जरिया माना जाता है। क्योंकि यह नई पीढ़ी को जितनी उत्सुकता और रोमांच के साथ आकर्षित करता है, उतनी ही तीव्रता के साथ पुरानी पीढ़ी को भी इस उत्सव के साथ जोड़ता है। कुल मिलाकर यह प्रकृति, स्थानीय संस्कृति और सामुदायिक जीवन का साझा उत्सव है। इसमें फूलों की खुशबू के साथ लोक धुनें गूंजती हैं और पहाड़ों की ठंडी हवाओं के साथ परंपराओं की गर्माहट का लुत्फ देती हैं।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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