बच्चे जब आपकी बात न सुनें

अब परिवार छोटे होने लगे हैं। आज की जीवन शैली ऐसी है कि बस एक या दो बच्चे ही होते हैं जिन्हें अच्छी से अच्छी परवरिश देना ही पेरेंट्स का उद्देश्य होता है। अकेले बच्चे की खूब पेंपरिंग होती है। मुंह से बात निकलती नहीं कि पूरी कर दी जाती है। अकेले बच्चे में शेयर करने की आदत बिल्कुल नहीं होती। वह बेहद पज़ेसिव बन जाता है।
दादा दादी तो अक्सर इस बात को लेकर कि वे पोते पोतियों को अत्यधिक लाड़ प्यार में बिगाड़ देते हैं, कटघरे में खड़े किये जाते हैं। कभी-कभी तो यह सच भी होता है। जहां घर में उनकी चलती है, वे बच्चे के सामने ही उसकी मां को उसके फेवर में डांट देंगे। ऐसे में बच्चे का जिद्दी हो जाना स्वाभाविक है। 
कभी-कभी ऐसा भी होता है कि बच्चा किसी क्रॉनिक रोग से ग्रस्त होता है। वो अनीमिक, एस्थेमेटिक, डाइबिटिक, दिल का रोगी या किसी तरह से चैलेंज्ड हो सकता है। ऐसे में उनकी अतिरिक्त देखभाल होती हैं। इससे भी वे अपनी मनवाने लगते हैं। 
हायपर एक्टिव बच्चों के साथ भी यही समस्या रहती है कि वे पेरेंट्स का ध्यान आकर्षित करने के लिये तरह-तरह के कारनामे करते रहते हैं। रोकने टोकने पर फैल जाते हैं।
अब समस्याएं हैं तो समाधान भी हैं। यहां कोई एलोपैथी, होमियोपैथी पैथी काम नहीं आयेगी। काम आता है बच्चों के साथ उचित व्यवहार, उनकी सही देखभाल और उन्हें दिया गया क्वालिटी टाइम। केवल लाड़ दुलार से ही काम नहीं चलता। ज़रूरत पड़ने पर उनके साथ स्ट्रिक्ट भी होना पड़ता है।
उन्हें स्पेस भी दें। उनकी निजता का भी सम्मान करें। शुरूआती बरस यानी कि एक से पांच साल तक बच्चों का मन कुछ इस तरह रिसेप्टिव होता है कि जो कुछ समझाया बताया जाए, वहीं उनके संस्कारों में आ जाता है।
बच्चे के आत्मविश्वास को ठेस लगे, ऐसा कुछ कभी न करें। बच्चे में भी ‘ईगो’ होता है ये न भूलें। बार-बार उसके सामने ये बात न दोहरायें क्या करें, ये तो सुनता ही नहीं। (उर्वशी)

#बच्चे जब आपकी बात न सुनें