सहायक अभिनेता व चरित्र कलाकार थे सुदेश कुमार
पेशावर की मिट्टी में कुछ तो खास अवश्य है कि हिंदी सिनेमा के अनके दिग्गज अभिनेताओं के जीवन तार फ्रंटियर के इसी शहर से जुड़े हुए हैं। यह बात सब जानते हैं कि पृथ्वीराज कपूर, दिलीप कुमार व राज कपूर पेशावर से ही बॉम्बे आये और शाहरुख खान के पूर्वजों का संबंध भी इसी पठान शहर से है। लेकिन यह सूची यहीं समाप्त नहीं हो जाती है। सुदेश कुमार, जिनका चेहरा देखते ही 1961 की दुखद प्रेम कथा ‘सारंगा’ का वह सीन याद आ जाता है जिसमें वह उदासी भरा कालजयी गीत ‘सारंगा तेरी याद में नैन हुए बेचैन’ गाते हैं, का जन्म भी पेशावर में 17 मार्च 1931 को सुदेश प्रकाश धवन के रूप में हुआ था।
सुदेश जब बच्चे ही थे तो उनका परिवार बॉम्बे शिफ्ट हो गया था। बॉम्बे में सुदेश ने एल्फिस्टन कॉलेज से विज्ञान में स्नातक की डिग्री हासिल की। उनके पिता चाहते थे कि वह डॉक्टर बनें, लेकिन सुदेश की दिलचस्पी तो एक्टिंग में थी, इसलिए उन्होंने पृथ्वीराज कपूर (जो उनके दूर के रिश्तेदार भी थे) का थिएटर ग्रुप ज्वाइन कर लिया। थिएटर से फिल्मों तक का सफर उन दिनों स्वभाविक प्रगति थी। दिलचस्प यह है कि फिल्मों में आने के बाद सुदेश का स्क्रीन नाम निरंतर बदलता रहा, किसी फिल्म में वह सिर्फ सुदेश थे, किसी में सोंदेश कुमार और अधिकतर में सुदेश कुमार। सुदेश की पहली फिल्म राज कपूर की ‘सरगम’ थी, जो 1950 में रिलीज़ हुई थी और उसमें उनकी एक छोटी सी भूमिका थी। ‘आंसू’ (1953) में भी उनका छोटा ही रोल था। उनकी शुरुआती फिल्मों में पृथ्वीराज कपूर के निर्देशन में बनी ‘पैसा’ (1957) थी। लेकिन उन्हें असल पहचान मिली 1961 में आयी फिल्म ‘सारंगा’ से, जिसके लिए उन्हें आज तक याद किया जाता है।
‘सारंगा’ की अपार सफलता के बावजूद सुदेश का एकल हीरो के रूप में कॅरियर कुछ खास सफल नहीं रहा, लेकिन एक सहायक अभिनेता व चरित्र कलाकार के रूप में वह बहुत कामयाब रहे, विशेषकर दक्षिण भारत में निर्मित फिल्मों में, जैसे ‘छोटी बहन’, ‘भरोसा’ और ‘खानदान’, जिन्होंने बॉक्स ऑफिस पर ज़बरदस्त कमाई की। सुदेश ने कुछ अति सफल फिल्मों का निर्माण भी किया, जैसे थ्रिलर ‘उलझन’ जो 1975 में आयी थी। सुदेश को शुरू-शुरू में छोटे बजट वाली कोस्टयूम ड्रामा और भक्ति फिल्मों में ही अभिनय करने का अवसर मिला। फिर उन्हें मुख्यधारा की फिल्मों में छोटे-छोटे रोल मिलने लगे। प्रसाद प्रोडक्शन की सुपरहिट पारिवारिक फिल्म ‘छोटी बहन’ (1959) में जब उन्हें एक डॉक्टर की भूमिका निभाने का अवसर मिला, तब अन्य निर्माताओं ने उनकी प्रतिभा को स्वीकार करना आरंभ किया और उन्हें बड़े बजट की फिल्में मिलने लगीं।
यह अजीब संयोग रहा कि सुदेश के पिता उन्हें डॉक्टर बनाना चाहते थे, वह नहीं बने, लेकिन बड़े पर्दे पर जब वह डॉक्टर बने तो उनके लिए सफलता के द्वार खुल गये। साठ के दशक में सुदेश के पैर दक्षिण की सामाजिक फिल्मों में पूरी तरह से जम गये थे और वह के शंकर, वासु मेनन, ए भीमसिंह और सीवी श्रीधर जैसे स्थापित निर्देशकों के साथ काम कर रहे थे। सत्तर के दशक में सुदेश ने अपना ध्यान फिल्म निर्माण पर केंद्रित करना आरंभ कर दिया। लेकिन इससे पहले उन्होंने राज खोसला के साथ फिल्म ‘दो बदन’ (1966) में सहायक निर्देशक की भूमिका अदा की। निर्माता के रूप में सुदेश की पहली फिल्म ‘मन मंदिर’ (1970) थी। सुदेश ने रघुनाथ झालानी के साथ मिलकर निर्देशक-निर्माता की कामयाब जोड़ी बनायी- दो स्मार्ट व ऑ़फ-बीट सफल थ्रिलर बनायीं, ‘उलझन’ (संजीव कुमार को लेकर) और ‘बदलते रिश्ते’ (जितेंद्र, रीना रॉय व ऋषि कपूर को लेकर)। इसके बाद ‘जान हथेली पे’ (1987) बनायी, जो बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप साबित हुई।
सुदेश ने 1982 में मुंबई की मॉडल जया नायक उर्फ धवन से शादी की। दोनों पड़ोसी थे और उनकी पहली मुलाकात गीतकार राजेंद्र कृष्ण के घर के बाहर हुई थी, जो सुदेश के गहरे दोस्त थे। राजेंद्र कृष्ण के बेटे राजेश दुग्गल के अनुसार, सुदेश एक साल पहले तक भी जीवन व ऊर्जा से भरे हुए थे। जया के मुताबिक इस साल फरवरी में वे दोनों दक्षिण के मंदिरों के दर्शन करने के लिए गये थे। अपनी अधिक आयु के बावजूद सुदेश बहुत फिट थे और चलने के लिए छड़ी का इस्तेमाल नहीं करते थे। लेकिन होनी को कौन टाल सकता है, मौत तो सभी को आनी है। सुदेश को 27 अप्रैल 2026 को सांस लेने में तकलीफ हुई, उन्हें ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया गया। उनके आग्रह पर उन्हें 30 अप्रैल 2026 को वापस घर लाया गया, जहां अस्थायी मैडीकल यूनिट सेट अप किया गया था। लेकिन अगली सुबह उन्होंने अपने जीवन की अंतिम सांस लिया। 1 मई 2026 को ही उनका अंतिम संस्कार शिवाजी पार्क के शवदाह गृह में कर दिया गया। वह 95 वर्ष के थे।
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