ऊर्जा संकट के बीच करना पड़ सकता है अल नीनो का सामना

भारत इस समय कुछ संकटों से घिर गया है। एक तरफ जहां होर्मुज संकट अपना असर दिखाने लगा है और पिछले एक पखवाड़े के भीतर महंगाई अढ़ाई से तीन फीसदी तक बढ़ गई है। जिस कारण सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भले वो अभी भी 10 फीसदी से नीचे हो, लेकिन व्यवहारिक धरातल पर जब से होर्मुज संकट खड़ा हुआ, तब से अब तक महंगाई 15 से 20 फीसदी तक बढ़ गई है, जो देश के निम्नवर्ग को तो छोड़िये मध्यवर्ग को भी प्रभावित कर रही है। अब उससे भी बड़े संकट के रूप में अल नीनो का खतरा मंडराता दिख रहा है। प्रशांत महासागर में तेज़ी से विकसित होता अल नीनो भारतीय मानसून को जबरदस्त ढंग से प्रभावित कर सकता है। इसलिए मौसम वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि इस साल भारत के बहुत बड़े हिस्से में जबरदस्त सूखा पड़ने की सम्भावना जताई जा रही है। 
ऐसा इसलिए माना जा रहा है कि अल नीनो का जो प्रभाव पिछले 75 सालों में नहीं देखा गया, वो इस साल देखने को मिल सकता है। अगर ऐसा हुआ तो दुनिया में एक दर्जन से ज्यादा देशों पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है और इनमें एक भारत भी होगा। अमरीकी मीडिया और जलवायु एजेंसियों के मुताबिक कुछ क्लाइमेट मॉडल संकेत दे रहे हैं कि 1950 के बाद से दर्ज सबसे शक्तिशाली घटनाआें में से एक इस साल अल नीनो का असर बन सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक इससे मौसम, कृषि, पानी और अर्थव्यवस्था पर अनुमान से भी ज्यादा संकट देखा जा सकता है। दरअसल अल नीनो जिसका मतलब स्पेनिश भाषा में ‘छोटा बच्चा’ होता है, यह प्रशांत महासागर में समुद्र के तापमान और हवाओं के पैटर्न में बदलाव से पैदा होने वाली प्राकृतिक जलवायु घटना है। आमतौर पर भू-मध्य रेखा के आसपास चलने वाली ‘ट्रेड विंड्स’ पूर्व से पश्चिम की दिशा में बहती हैं, लेकिन जब ये हवाएं कमज़ोर पड़ जाती हैं, तो फिर उल्टी दिशा में बहने लगती हैं, तब मध्य और पूर्वी प्रशांत में गर्म पानी जमा होने लगता है। यह बदलाव पूरी दुनिया के मौसम तंत्र को बुरी तरह प्रभावित करता है। 
विशेषज्ञों के मुताबिक इस बार यह असर इसलिए भी बहुत ज्यादा प्रभावी हो सकता है, क्योंकि धरती पहले से ही वैश्विक तपिश (ग्लोबल वार्मिंग) के कारण अधिक गर्म हो चुकी है। ऐसे में वैज्ञानिकों के मुताबिक अल नीनो के कारण बढ़े हुए तापमान से कहीं ज्यादा गम्भीर स्थितियां पैदा हो सकती हैं। इससे कहीं बाढ़, कहीं चक्रवात और कहीं लंबी-लंबी दूरी तक सूखे देखने को मिलेंगे। साथ ही जंगलों में आग लगने की घटनाएं भी इस समय अब तक के मुकाबले सबसे ज्यादा देखने को मिल सकती हैं। कई अमरीकी टीवी रिपोर्ट्स के मुताबिक विभिन्न तरह के मौसम मॉडल संकेत दे रहे हैं कि इस बार आने वाला अल नीनो 1982-83, 1997-98 और 2015-16 में आये अल नीनो के प्रभाव से कहीं ज्यादा भयावह होगा। वैसे अब तक में 1997-98 के अल नीनो प्रभाव को सुपर अल नीनो कहते हैं। 
लेकिन वैज्ञानिकों को आशंका है कि इस बार का अल नीनो, सुपर अल नीनो को भी पीछे छोड़ देगा। इसे अभी से ही दुनिया के इतिहास की सबसे विनाशकारी जलवायु घटनाओं में से एक गिना जा रहा है। जबकि 1997-98 के अल नीनो प्रभाव के कारण विश्व अर्थव्यवस्था में 5.7 ट्रिलियन डॉलर की आर्थिक क्षति पहुंची थी। अगर इस बार उससे ज्यादा  असर होता है, तो किस हद तक यह विनाशकारी होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है। भारत के लिए यह चेतावनी दुनिया के दूसरे देशाें के मुकाबले इसलिए भी ज्यादा चिंताजनक है, क्योंकि भारतीय मानसून केवल मौसम नहीं बल्कि अर्थव्यवस्था की भी धुरी है। देश की लगभग 54 फीसदी आबादी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आज भी कृषि पर ही निर्भर है। ऐसे में 2026 के मानसून को जिस तरह ‘बिलो नॉर्मल’ बताया है, वह बहुत भयावह है। कुछ मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक इस साल औसत से केवल 92 से 94 प्रतिशत तक ही बारिश हो सकती है। जबकि आमतौर पर जब मानसून 104 से 115 प्रतिशत तक होता है, तब वह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए राहत वाला समझा जाता है।
सवाल यह है कि अगर वास्तव बारिश कम हुई तो इसका असर कृषि कि किन फसलों पर पड़ेगा? अगर सीधे तौर पर देखें तो लगता है इससे धान, दालें, तिलहन, कपास और सोयाबीन जैसी फसलें ही प्रभावित होंगी। खरीफ की फसलों से ज्यादा इसका असर रबी की फसलों यानी गेहूं और तिलहनों पर पड़ सकता है, क्योंकि अगर बारिश कम होगी, तो गेहूं बोने के लिए मिट्टी में ज़रूरी नमी का अभाव होगा। साथ ही जलाशयों और बांधों में सिंचाई के लिए ज़रूरी पानी भी नहीं होगा। ऐसे में जहां खाद्यान्न उत्पादन पर संकट के कारण देश में बड़े पैमाने पर खाद्य संकट पैदा हो सकता है, वहीं मानसून से जुड़ी हमारी अर्थव्यवस्था पर भी इसका अधिक नुकसान देखने को मिल सकता है। 2023 में जब मानसून में अपेक्षाकृत कम बारिश हुई थी, तो खाद्य मुद्रास्फीति 11 प्रतिशत तक ऊपर चली गई थी। लेकिन अब यदि इस बार अल नीनो का प्रभाव सामने आया तो खाद्य संकट तो होगा ही होगा, उससे अलावा मौसमी सब्ज़ियों पर भी इसका काफी असर होगा। 
भारत की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा गांवों की खपत पर चलता है और कुछ सालों से भारत की अर्थव्यवस्था का बड़ा आधार ग्रामीण क्रय शक्ति भी रही है। अगर होर्मुज संकट के साथ-साथ आसन्न सामने खड़ा दिख रहा अल नीनो संकट भी हकीकत बन गया, तो भारत में ग्रामीण क्रय शक्ति की कमर टूट जायेगी, क्योंकि ग्रामीण क्रय शक्ति का एक बड़ा हिस्सा लगभग 45 से 50 फीसदी तक कृषि से और इतना ही ग्रामीण लोगों के शहरों से भेजे गये धन से होता है। 
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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