चौराहे पर खड़ी है हमारी शिक्षा नीति

आज़ादी के बाद राजनीतिज्ञों ने भारत की शिक्षा व्यवस्था को इस सीमा तक तबाह कर दिया है कि शायद ही किसी अन्य देश में ऐसा हुआ होगा। एक प्रकार से शिक्ष को चौराहे पर लाकर कर उसका ‘चीरहरण’ किया जाता रहा है। जो जैसे चाहे लूटे, बदनाम करे, भ्रम का जाल बुने और लूट की कमाई करता रहे। विडंबना यह कि जिन बच्चों के भविष्य के लिए सारी नीतियां बनाने के लिए बहसें होती हैं, वही सबसे अधिक तनाव, अनिश्चितता और प्रयोगों का बोझ झेलते हैं। 
भाषाई टकराव
स्वतंत्रता के बाद सबसे बड़ा प्रश्न था कि विशाल और बहुभाषी देश को शिक्षा के माध्यम से कैसे जोड़ा जाए। संविधान सभा में भाषा को लेकर हुई बहसें केवल भाषाई नहीं थीं, वे सत्ता पर कब्ज़ा करने का अवसर थीं। हिन्दी को राजभाषा बनाया गया था, लेकिन अंग्रेज़ी के वर्चस्व को खत्म करना असंभव कर दिया गया। दक्षिण भारत के तमिलनाडु में हिन्दी विरोध आंदोलनों ने यह स्पष्ट कर दिया कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक अस्मिता का प्रश्न है। ‘तीन-भाषी फार्मूला’ लाया गया था, लेकिन यह व्यावहारिक न होने से बेकार सिद्ध हुआ।
दरअसल भाषा का मुद्दा भावनाओं से अधिक अवसरों यानी नौकरी या रोज़गार से जुड़ा होता है। कुछ नेताओं ने अंग्रेज़ी को वैश्विक ज्ञान, विज्ञान और तकनीक की भाषा बता कर हमेशा के लिए इसका वर्चस्व स्थापित कर दिया  है। उल्लेखनीय है कि जापान, चीन, रूस, फ्रांस और जर्मनी तथा अनेक विकसित और विकासशील देशों ने अपनी भाषाओं में आधुनिक शिक्षा देकर विश्व में पहचान बनाई है। भारत में उच्च शिक्षा, न्यायपालिका, कॉर्पोरेट जगत मुख्यत: अंग्रेज़ी के इर्द-गिर्द घूमते हैं। अंग्रेज़ी ज़रूरी है तो उसे पढ़ाया जाए, परन्तु अपनी मातृ भाषा के साथ-साथ दो अन्य भाषाएं पढ़ने की नीति अपनाकर सभी मुश्किलों से मुक्ति पा सकते हैं।
नकल यानी पेपर लीक उद्योग 
शायद ही कोई व्यक्ति होगा जिन्होंने पढ़ाई-लिखाई के दौरान किसी अध्यापक का विशेष स्नेह, पेपर तैयार करने वाले से ट्यूशन लेना, परीक्षा में अपने आगे-पीछे बैठे विद्यार्थियों की मदद से किसी सवाल का जवाब लिखने में मदद न ली हो। हमारी शिक्षा व्यवस्था अधिक अंक लेने को प्रेरित करती है,जिससे नकल योग्यता को पीछे धकेल कर आगे बढ़ने का साधन बन गई है। नकल की प्रवृति शिक्षा व्यवस्था में मौजूद चोर दरवाज़ों के कारण आगे बढ़ती हुई आज हज़ारों करोड़ का एक अनैतिक और गैर-कानूनी कारोबार बन गई है। 
आज स्थिति यह है कि विद्यार्थी, शिक्षक, प्रश्न-पत्र बनाने, पेपर चैक करने वाले और परिणाम घोषित करने वाले सब लोग इस गैर-कानूनी काम को बड़ी सफाई से कर रहे हैं। आधुनिक तकनीकी संसाधनों की मदद से नकल व्यक्तिगत नहीं, अपितु एक संगठित उद्योग बन गई है। भर्ती परीक्षाओं, मेडिकल दाखिला परीक्षाएं, शिक्षक और पुलिस भर्ती में पेपर लीक होने से पता चलता है कि हमारे देश में सिर्फ वही लोग इसका लाभ ले सकते हैं जिनकी जेबों में पैसे हों। कोचिंग उद्योग, दलाल नेटवर्क, फर्जी अभ्यर्थी और डिजिटल हैकिंग कब इसी दबाव की उपज हैं। विद्यार्थी ज्ञान से अधिक ‘कटऑफ ’ और ‘रैंक’ में फंस गए हैं। शिक्षा अब सीखने की प्रक्रिया कम और चयन की मशीन अधिक बन गई है। 
हमारी पहली राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने समान शिक्षा और विज्ञान पर ज़ोर दिया। 1986 की नीति ने ‘सबके लिए शिक्षा’ का नारा दिया ताकि ग्रामीण तथा महिला शिक्षा को बढ़ावा मिले। फिर वर्तमान सरकार के समय 2020 में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति लाई गई, जिसने मातृ भाषा, कौशल विकास, डिजिटल शिक्षा और लचीले पाठ्यक्रम की बात की। नई नीति में 5+3+3+4 संरचना, कौशल आधारित शिक्षा, मल्टीपल एंट्री-एग्जिट सिस्टम और बोर्ड परीक्षा सुधार जैसे कई महत्वाकांक्षी सपने बुने गए। भारत की पुरानी समस्या अब भी वही है—नीति बनाना आसान, क्रियान्वयन कठिन। सबसे बड़ी बात यह कि शिक्षा बजट में लगातार कटौती। 
शिक्षा का उद्देश्य क्या है?
यदि शिक्षा का उद्देश्य सोचने की क्षमता, कौशल, आत्मनिर्भरता और नवाचार है, तो पूरा ढांचा बदलना पड़ेगा क्योंकि दुनिया तेज़ी से बदल रही है। एआई, डिजिटल मीडिया, कंटेंट क्रिएशन, एग्री-टेक, पर्यटन, डिजाइन, एनीमेशन, यू-ट्यूब और ऑनलाइन सेवाओं में नए अवसर बन रहे हैं। आज एक युवा बिना सरकारी नौकरी के भी विश्व स्तर पर पहचान बना सकता है। लेकिन हमारी शिक्षा व्यवस्था अभी भी रटने और अंक आधारित प्रतिस्पर्धा में फंसी हुई है। विद्यार्थियों को केवल इतिहास, गणित और विज्ञान नहीं, बल्कि संवाद कौशल, डिजिटल साक्षरता, वित्तीय समझ, उद्यमिता और मानसिक संतुलन भी सिखाना होगा। भविष्य में वही सफल होगा जो बदलती दुनिया के साथ रहना सीख सके। शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्रीधारी नहीं बल्कि ऐसा युवा जो अपनी भाषा में सोच सके, दुनिया से संवाद कर सके और अपने देश के लिए नई राह बना सके। यदि भारत यह संतुलन बना पायाए तभी शिक्षा वास्तव में राष्ट्र निर्माण का माध्यम बन सकेगी। 
भारत आज केवल नई शिक्षा नीति नहीं, बल्कि नई ‘शिक्षा दृष्टिकोण’ की आवश्यकता महसूस कर रहा है। एक ओर लाखों डिग्रीधारी बेरोज़गार हैं, दूसरी ओर उद्योगों को कुशल लोग नहीं मिल रहे। आज सचमुच नई शिक्षा नीति बनानी हो, तो उसका उद्देश्य केवल ‘पढ़ाई’ नहीं बल्कि ‘जीवन के लिए तैयारी’ होना चाहिए। परीक्षा, असफलता और बेरोज़गारी का भय जीवन की तैयारी करने ही नहीं देता। विद्यार्थी केवल नंबर के खेल में आगे रहना चाहता है।

#चौराहे पर खड़ी है हमारी शिक्षा नीति