भारत-पाकिस्तान की आर्थिकता के लिए विशेष महत्व रखता है होसबाले का सुझाव
अपने ही भाई को हम-साया बनाते क्यों हो,
सहन के बीच में दीवार लगाते क्यों हो।
मुश्ताक आज़ार के इस शे’अर से पार भारत के साझे घर (देश) के सहन (आंगन) में दीवार निर्मित करके भारत तथा पाकिस्तान भाइयों से हमसाये (पड़ोसी) बन गए। फिर 1971 में बांग्लादेश की स्थापना ने एक और हमसाया बना दिया, परन्तु अफसोस इस बात का अधिक है कि पड़ोसी बने ये देश अच्छे पड़ोसी नहीं बन सके, अपितु दुश्मन ही बन गए। भारत के दृष्टिकोण से पहल पाकिस्तान ने की जब उसने आज़ादी मिलते ही कश्मीर पर हमला किया। फिर पाकिस्तान ने खुलेआम आतंकवादी संगठनों को भारत के खिलाफ इस्तेमाल किया। नि:संदेह यह नहीं कि भारत ने जवाबी कार्रवाइयां नहीं कीं, अपितु भारत ने तो ईंट का जवाब पत्थर से ही दिया है, परन्तु याद रखें, कोई पड़ोसियों से बिगाड़ कर अमन-चैन से नहीं रह सकता और न ही उतना विकास कर सकता है जितने विकास का वह हकदार तथा समर्थ होता है।
भारत-पाक तनाव में सबसे बड़ा कारण तो यही रहा है कि पाकिस्तान में लोकतंत्र कमज़ोर रहा और सेना हावी रही। नि:संदेह 2014 में भाजपा की भारत में सरकार बनते ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘नेबर फर्स्ट’ (पड़ोसी पहले) की नीति अपनाई, परन्तु पाकिस्तान में मौलानाओं की ज़ोर और भारत में बहुसंख्यकों के ध्रुवीकरण के भाजपा की आंतरिक नीति ने इस ‘नेबर फर्स्ट’ नीति को सफल ही नहीं होने दिया। वैसे भी भारत-पाकिस्तान विभाजन का आधार द्वि-राष्ट्रीय थ्यूरी को एक ओर मुस्लिम लीग एवं मोहम्मद अली जिन्ना ने हवा दी तथा दूसरी ओर भाजपा के नायक विनायक दामोदर सावरकर एवं हिन्दू महासभा भी इसके मुख्य प्रचारक बने। हालांकि देश के विभाजन का सबसे अधिक नुकसान मुसलमानों को ही हुआ है। इस समय भारत में लगभग 110 करोड़ हिन्दुओं के मुकाबले 20-22 करोड़ मुसलमान होंगे। इस विभाजन ने भारतीय मुसलमानों को तीन हिस्सों में बांट दिया। यदि भारत का विभाजन न होता तो आज साझे भारत में मुसलमानों की संख्या 60 करोड़ के आस-पास होती। वैसे भी यदि यह विभाजन न होता तो पंजाबी कौम का ध्वज देश में बुलंद रहता, जो अब नहीं रहा। इस विभाजन ने चाहे बंगालियों का भी नुकसान किया और लगभग 10 हज़ार बंगाली मारे भी गए, परन्तु पंजाबी तो लगभग 8 लाख कत्ल हुए। पंजाबियों, सिखों, हिन्दुओं तथा मुसलमानों को अपने घर छोड़ कर बे-यार-ओ मददगार हो कर भटकना पड़ा। इस बीच भारत-पाक युद्धों ने भी दोनों देशों का नुकसान किया, परन्तु हर बार सबसे अधिक नुकसान पंजाब का ही हुआ है। परिणामस्वरूप बार-बार भारत-पाक सीमा बाघा-अटारी तथा हुसैनीवाला सीमा के ज़रिये सड़क मार्ग से होता व्यापार रोक दिया जाता है। इससे पंजाब, हरियाणा तथा उत्तर भारत को लाखों करोड़ रुपये का नुकसान ही नहीं होता, अपितु बेरोज़गारी भी बढ़ती है। भारत ने पाकिस्तान की तरफ खुलते सभी खिड़कियां व दरवाज़े बंद कर लिए हैं, परन्तु आश्चर्यजनक एवं खुशी की बात यह है कि भाजपा के पैतृक संगठन आरएसएस के राष्ट्रीय सर-कार्यवाह अर्थात संगठन महासचिव तथा आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के बाद सबसे शक्तिशाली नेता दत्तात्रेय होसबाले ने अपील की है कि चाहे पाकिस्तान के आतंकवाद का कड़ा जवाब देना ठीक नीति है, परन्तु पाकिस्तान तथा भारत के लोगों के बीच आपसी संबंध, व्यापार, वीज़ा, खेल तथा सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ाना चाहिए। नि:संदेह उन्होंने यह भी कहा कि हमें पाकिस्तानी सेना तथा राजनीतिक नेताओं पर विश्वास नहीं है, परन्तु बातचीत का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं होना चाहिए। हम समझते हैं कि आरएसएस का इतना बड़ा नेता ऐसा बयान बिना किसी सोच-विचार तथा भाजपा सरकार की सलाह के बिना नहीं दे सकता। इसका साफ अभिप्राय है कि भाजपा पाकिस्तान के प्रति अपनी नीति में किसी बड़े बदलाव की तैयारी कर रही है। चाहे इस अकेले बयान से भारत-पाकिस्तान संबंधों पर मौजूद घनी अंधेरी रात खत्म नहीं होने लगी, परन्तु यह बयान घनी अंधेरी रात में प्रकाश की एक किरण से किसी भी तरह से कम नहीं है। इरफान सिद्दीकी के शब्दों में :
रात को जीत तो पाता नहीं लेकिन ये चराग,
कम से कम रात का नुकसान बहुत करता है।
भारत-पाक संबंधों में सुधार—स्वर्ग की राह
आरएसएस नेता दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि भारत-पाकिस्तान में तालमेल को आर्थिक लाभ में बदलना चाहिए। यह सचमुच भारत-पाकिस्तान दोनों पड़ोसियों के लिए स्वर्ग बनने की राह है। एक ओर धीरे-धीरे हथियारों की दौड़ कम होगी और वही पैसा देश तथा लोगों की उन्नति के लिए उपयोग किया जा सकेगा तथा दूसरी ओर यदि भारत-पाकिस्तान की ज़मीनी सीमाएं व्यापार के लिए खोल दी जाती हैं तो यह पंजाब, हरियाणा तथा उत्तर भारत के किसानों, उद्योगपतियों, मज़दूरों तथा ट्रांस्पोर्टरों एवं युवाओं के रोज़गार के लिए एक वरदान से कम नहीं होगा। अलग-अलग अनुमानों के अनुसार इस मार्ग से पाकिस्तान, अफगानिस्तान तथा ईरान के साथ लगभग 37 बिलियन डॉलर का व्यापार हो सकता है। यदि इसे भारत के सम्भावित भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे से जोड़ लिया जाए तो यह और भी कहीं बड़ा व्यापार मार्ग बन जाएगा। अब भी ज़रा देखें, अफगानिस्तान, ईरान या किसी तीसरे देश के ज़रिये भारतीय सामान पकिस्तान भेजने के लिए लुधियाना से गुजरात की मुंदरा पोर्ट तक जाने के लिए 1200 किलोमीटर से अधिक रास्ता तय करना पड़ता है। फिर समुद्री खर्च जबकि लुधियाना से पाकिस्तान सिर्फ 200 किलोमीटर दूर है और ईरान तथा अफगानिस्तान में सामान ताज़ा तथा जल्द पहुंच सकता है जिससे पंजाब, हरियाणा तथा अन्य उत्तरी राज्यों से सब्ज़ियां, फल आदि जल्दी खराब होने वाले उत्पाद भेजे जा सकते हैं। यह पंजाब को धान-गेहूं के फसली चक्र में से भी निकाल सकता है। हमारे सामने है कि होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से भारतीय चावल निर्यातकों को कितना नुकसान हुआ है और पाकिस्तान के चावल निर्यातकों को कितना लाभ।
दत्तात्रेय की अपील भाजपा की राजनीति को एक नई दिशा दिखा रही है। इसे कमज़ोरी नहीं, अपितु अमन का एक रास्ता माना जाना चाहिए। लोगों के बीच संबंध सुधरना आगे चल कर अखंड भारत के सपने को यूरोपीय यूनियन की तज़र् पर साकार करने का आगाज़ बन सकता है। बड़ी बात है कि इस अपील की भारत के पूर्व सैन्य प्रमुख जनरल एम.एस. नरवणे ने भी प्रशंसा की है। वैसे एक जानकारी के अनुसार अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के दक्षिण एशिया में सक्रिय होने के बाद भारत तथा पाकिस्तान में पिछले दरवाज़े की ट्रैक-2 बातचीत शुरू हो चुकी है। पता चला है कि इस अनौपचारिक बातचीत में दोनों देशों के पूर्व राजदूत तथा भाजपा से संबंधित शख्सियतें भी शामिल थीं। ऐसी बातचीत थाईलैंड जैसे तीसरे देशों में होती है, परन्तु भारत बड़ा तथा ताकतवर देश है। इसलिए शांति की पहल भी उसे ही करनी पड़ेगी कि पड़ोसियों को भारत से डरने की ज़रूरत नहीं।
घर की दीवार को इतना भी तू ऊंचा न बना,
तेरा हम-साया तेरे साये से डरता जाए।
—इफ्तखार नसीम
मनप्रीत सिंह इयाली का इस्तीफा
मनप्रीत सिंह इयाली चाहे श्री अकाल तख्त साहिब द्वारा बनाई गई 5 सदस्यीय भर्ती समिति के प्रमुख सदस्य थे परन्तु वह अकाली दल (पुनर्सुरजीत) तथा भाई अमृतपाल सिंह के अकाली दल (वारिस पंजाब दे) के साथ भी तलामेल करके चलते रहे हैं। वह इस कार्य के लिए दोनों दलों की 8 सदस्यीय समिति के कोआर्डिनेटर भी थे। उनका कहना है कि उन्हें किसी भी पद का कोई लालच नहीं है, परन्तु अकाली दल (पुनर्सुरजीत) के नेता कोई अच्छी सलाह सुनने को भी तैयार नहीं। जिस प्रकार उन्होंने अकाली दल (पुनर्सुरजीत) से इस्तीफा देते समय स्पष्ट किया है कि वह ‘आप’, भाजपा, कांग्रेस या अकाली दल बादल में नहीं जाएंगे, तो साफ है कि उनके पास एक ही रास्ता बचा है कि वह अकाली दल (वारिस पंजाब दे) में चले जाएं। वैसे भी अकाली दल (वारिस पंजाब दे) नेता उनका स्वागत करने के लिए तैयार दिखाई देते हैं, परन्तु राजनीति बड़ी सितमगर होती है। यह वक्त ही बताएगा कि उनका आगामी कदम क्या होगा और उनके साथ उनके कौन-कौन से अन्य साथी अकाली दल (पुनरर्सुजीत) को छोड़ते हैं, क्योंकि :
समझने ही नहीं देती सियासत हम को सच्चाई,
कभी चेहरा नहीं मिलता कभी दर्पण नहीं मिलता।
‘आप’ में दिल्ली तथा पंजाब की तकरार शुरू
लुधियाना में हुई एक बैठक में पंजाब के एक मंत्री तथा ‘आप’ के एक वरिष्ठ नेता के बीच काफी गर्मा-गर्मी के समाचार हैं। हालत यह है कि इसके तुरंत बाद हालात को सम्भालने के लिए ‘आप’ के सुप्रीम नेता अरविंद केजरीवाल को स्वयं पंजाब आना पड़ा। पता चला है कि पंजाब के कई विधायकों तथा अन्य वरिष्ठ नेताओं की उपस्थिति में पंजाब के मंत्री गुरमीत सिंह खुड्डियां तथा विधायक जगरूप गिल ने विधायकों की मज़र्ी के खिलाफ नगर कौंसिल टिकटें देने का विरोध पंजाब ‘आप’ के प्रभारी मनीष सिसोदिया के पास जताया। इस पर सिसोदिया ने खुड्डियां को अपने क्षेत्र लम्बी तक सीमित रहने के लिए कहा, जिस पर काफी गर्मा-गर्मी हुई। बताया जाता है कि यदि विधायक जसवंत सिंह गज्जनमाजरा तथा अन्य मध्यस्थता न करते तो मामला और अधिक बिगड़ सकता था।
सवाल ये है हवा आई किस इशारे पर,
चऱाग किस के बुझे ये सवाल थोड़ी है।
—नादिम नदीम
-1044, गुरु नानक स्ट्रीट, समराला रोड, खन्ना
-मो. 92168-60000



