अकेले हम नहीं, पूरा एशिया है आर्थिक संकट में

संभव है कि प्रधानमंत्री देशवासियों से कोविड-काल के अनुशासन को फिर से अपनाते हुए पेट्रोल गैस, ईंधन के इस्तेमाल पर अंकुश लगाने, घर से काम करने और विदेश यात्राओं में कटौती के साथ लोगों से सोना न खरीदने जैसी अपील जल्द ही फिर दोहरायें। पहले कुछ अदूरदर्शियों ने इसे अतिरेकी बताया था पर तमाम एशियाई देशों के समाचार स्रोतों से मिली जानकारियों और तथ्यों ने भी अब यह साबित किया है कि प्रधानमंत्री मोदी की अपील अतिरेकी नहीं, समयानुकूल थी। एक पखवाड़े के भीतर ही ईरान और अमरीका के बीच फिर से बन रही युद्ध की स्थितियां, खाड़ी में ओमान, संयुक्त अरब अमीरात जैसे कई देशों तक युद्ध पसरने की बढ़ती आशंकाओं ने यह साबित कर दिया है कि उनका कथन कितना दूरदर्शितापूर्ण था। अब उनकी आलोचना करने वालों को अपनी सोच के बारे में कई बार सोचना होगा। अगर हम अपने अड़ोस पड़ोस में देखें, समूचे एशिया पर नज़र डालें तो यह पता चलता है कि पश्चिम एशिया के संघर्ष ने तमाम एशियाई देशों की आर्थिक व्यवस्था की चूलें हिला दी हैं। यह अवस्था उन देशों की राजनीतिक, सामाजिक व्यवस्था को लम्बे समय तक के लिये बदलकर रख देगी; क्योंकि युद्ध खत्म होने के काफी समय बाद तक इसके दुष्प्रभाव बने रहेंगे। 
प्रधानमंत्री जैसी ही अपील कई एशियाई देशों के प्रधानमंत्री पहले ही कर चुके हैं। अब भारत भी उन देशों में से शामिल हो गया है, जो लोगों से अपने खर्चों में कटौती करने, आने वाली परिस्थितियों से संघर्ष करने के लिए उन्हें कमर कसने का आग्रह कर रहे हैं। अमरीका की मॉनिटरिंग संस्था, एसीएलईडी के अनुसार, पाकिस्तान, बांग्लादेश, फिलीपींस और दक्षिण कोरिया में दर्जनों विरोध प्रदर्शन होने के बाद ईंधन और दूसरी इस्तेमाल होने वाली चीज़ों का कम इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित करने के साथ-साथ, सरकारें आपूर्ति के वैकल्पिक स्रोत तलाश रही हैं। तकरीबन सभी विकासशील एशियाई देशों में ईंधन की आपूर्ति खत्म होने के कगार पर है। इंडोनेशिया के पास तो तीन सप्ताह से ज्यादा का ईंधन भंडार नहीं बचा है। वियतनाम के पास भी अब एक महीने से भी कम का भंडार है। पाकिस्तान और बांग्लादेश के लोग जो खाड़ी देशों से आने वाली प्राकृतिक गैस पर निर्भर हैं, वहां त्राहिमाम मचा है। वे लोग लंबे-लंबे ब्लैक आउट की समस्या झेल रहे हैं। यहां के ग्रामीण इलाकों में पेट्रोल पंपों पर ईंधन लगातार खत्म होता जा रहा है। इंडोनेशिया एनर्जी सब्सिडी पर हर दिन लगभग 6 हजार डॉलर खर्च कर रहा है। भारत को ईंधन की कीमतें स्थिर रखने के लिए हर दिन करोड़ों रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं। ऊपर से बुवाई के मौसम में खाद पर सब्सिडी देने के लिए कई अरब रुपये खर्चने होंगे। 
वॉशिंगटन के थिंक-टैंक सेंटर फॉर ग्लोबल डेवलपमेंट के अनुसार, क्रूड ऑयल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल पर स्थिर रखने से एशियाई सरकारों को हर साल सकल घरेलू उत्पाद का लगभग एक प्रतिशत खर्च करना पड़ेगा। कम ही एशियाई देश ऐसा कर सकते हैं। डीजल और खाद की कमी के चलते पाकिस्तान, बांग्लादेश और इंडोनेशिया के किसान खासा चिंतित हैं। यूरिया जो ज्यादातर खाड़ी देशों में बनता है, उसकी कीमत युद्ध शुरू होने के बाद से 50 प्रतिशत बढ़ गई है। लाखों किसान लागत के कारण धान बोने से कतरा रहे हैं। फिलीपींस में इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट ने कहा है, ‘अभी धान की खेती घाटे का सौदा हो सकती है। युद्ध जारी रहा, तो यह खाद्य सुरक्षा की समस्या बनेगा।’ वहां किसान वैकल्पिक फसलों के बारे में सोच रहे हैं। थाईलैंड और फिलीपींस जैसे कुछ देशों ने पश्चिम एशिया में संघर्ष शुरू होने के कुछ दिन बाद ही ऊर्जा के उपयोग को नियंत्रित करने के लिए कदम उठा लिए थे। 
कई एशियाई देश बायोफ्यूल का ज्यादा इस्तेमाल करने की ओर बढ रहे हैं। यह एक अलग तरह की समस्या को जन्म देने वाला है। सिंगापुर जैसे कुछ देश रिन्यूएबल एनर्जी में निवेश कर रहे हैं। यह अच्छी पहल है, लेकिन मजबूरी में और अनियोजित है। कुछ एशियाई देश इस आपाधापी से फायदा कूट रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया, जो कोयले और प्राकृतिक गैस का एक बड़ा निर्यातक देश है, अपने प्राकृतिक संसाधनों का ज्यादा निर्यात करने के बदले में रिफाइंड ईंधन की खरीद बढ़ा रहा है। उसने ब्रूनेई, जापान, मलेशिया, सिंगापुर और दक्षिण कोरिया के साथ नए सौदे किए हैं। इस दौर में जिस देश से कुछ देश दूरी बनाना चाहते थे, उस देश चीन से उन्हें न केवल ज्यादा सोलर पैनल और विंड टर्बाइन खरीदना पड़ रहा है बल्कि उसे अपने जीवाश्म ईंधनों के ज़रिए प्रभाव बढ़ाने से रोकना कठिन हो रहा है। दुनिया में कच्चे तेल का सबसे बड़ा आयातक होने के बावजूद, इस देश के पास तेल का विशाल भंडार है, जिसे वह सुरक्षा और कूटनीतिक ताकत के लिए इस्तेमाल कर सकता है। चीन ने युद्ध से पहले लगाई गई रोक में ढील देकर अपने उत्तरी पड़ोसियों को अपनी रिफाइनर कंपनियों को पेट्रोल, डीज़ल और जेट-फ्यूल कार्गो भेजने की इजाज़त दी है। भविष्य में वह वियतनाम और लाओस के अलावा जिनके साथ कूटनीतिक रिश्ते बनाने हैं, उनके लिए तेल का इस्तेमाल करेगा। फिलीपींस में हुए एक सम्मेलन में दक्षिण-पूर्व एशियाई नेताओं ने एक शेयर्ड फ्यूल स्टॉक बनाने का प्रस्ताव रखा तो एशियन डेवलपमेंट बैंक ने 2035 तक एशियाई पावर ग्रिड्स को आपस में जोड़ने के लिए  50 अरब डॉलर जुटाने का वादा किया है। एशियाई सरकारें लंबे समय से अपनी बिजली साझा करने को लेकर सतर्क रही हैं और किसी भी ऐसे सिस्टम से डरती रही हैं, जो पड़ोसी देशों को उनकी सप्लाई पर नियंत्रण दे सकता हो। फिर भी, अब वे आसन्न खतरे के मुकाबले इसे भय को कमतर मान रही हैं।  
बांग्लादेश के सकल घरेलू उत्पाद में टेक्सटाइल फैक्ट्रियों का लगभग 13 प्रतिशत का हिस्सा है। महंगे डीज़ल और पेट्रोकेमिकल-बेस्ड डाई की वजह से इनपुट कॉस्ट 15 प्रतिशत तक बढ़ गई है। इससे देश का कुल फैक्ट्री आउटपुट लगभग 30 से 40 प्रतिशत कम हो गया है। फिलीपींस में महंगाई अप्रैल तक के साल में बढ़कर 7.2 प्रतिशत हो गई और 2026 की पहली तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर धीमी होकर महामारी के बाद सबसे कम 2.8 प्रतिशत रह गई। संयुक्त राष्ट्र का मानना है कि लड़ाई, लंबी चली तो दक्षिण एशिया के जीडीपी में 3.6 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। जर्मनी का थिंक-टैंक, केल इंस्टीट्यूट कहता है, इस साल भारत, पाकिस्तान और श्रीलंका में खाने-पीने की चीज़ों की कीमतों में बढ़ोतरी 10 प्रतिशत से ऊपर जा सकती है। चिंता इस बात की है कि पूरे एशिया में बढ़ती कीमतें वैसी ही अशांति पैदा कर सकती हैं, जैसी 2022 में श्रीलंका की सरकार को गिराने का कारण बनी थी।

-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

#अकेले हम नहीं
# पूरा एशिया है आर्थिक संकट में