डेढ़ टांग वाली इमारत
अगर हम अपने देश के नव-निर्माण की तुलना किसी नई भव्य इमारत को बना देने से करें, तो यह इमारत ऐसी होगी कि जिसे देख हम डेढ़ टांग वाली इमारत कहने पर मज़बूर हो जाएंगे। हंसिये मत, न ही पूछिये, कि भला किसी इमारत की भी टांगें होती हैं, और वे भी दो नहीं, मात्र डेढ़?
जी हां, क्यों नहीं हो सकतीं? जब एक नेता जी का शासन पच्चीस बरस तक चल सकता है, इस बूते पर कि एक टांग केवल आपके लिए आसमान से सितारे लेकर आने वाली नित्य दिन की घोषणाओं से बने, और आंधी टांग उस मिथ्याचार के बल पर निर्मित हो कि ये सितारे उन्होंने आपकी गोद में डाल दिये हैं। इन सितारों का रंग-रूप कुछ भी हो सकता है। महंगाई को शून्य स्तर पर ले जाने की घोषणा का, या भ्रष्टाचार को शून्य स्तर पर ही सहन करने की घोषणा का, या बेरोज़गारी को इतना घटा देने का, कि बेकारों की संख्या शून्य हो जाये। और इस एक टांग पर खड़े हो कर की गई घोषणाओं के साथ रहता है वह झूठ परोसती आधी टांग का शून्य, कि महंगाई तो क्या शून्य होनी थी, आपकी जेब के सिक्कों की संख्या ही शून्य हो गई। भ्रष्टाचार को ऐसे शून्य बनाया कि आज हर भूतपूर्व नेता जनता की भ्रष्ट आचरण के साथ जेब काटने वाला गिरहकट बन गया, और जो आज सत्ता पर काबिज़ है, वह ऐसा महान क्रांतिकारी कि जो इन दोगले अब अतीत हो गये नेताओं के भ्रष्टाचार का नकाब उतार रहा है। फिर ऐसा एक नकाब ओढ़ कर फिलहाल अपने आपको भ्रष्टाचार नाशक कह रहा है। इसी नकाब के नीचे उसका भ्रष्टाचार पलता है, तो पलने दो, क्योंकि इस देश के लोगों को ‘सब चलता है’ के दर्शन शास्त्र के अनुसार सब सहने की आदत हो गई है। तभी तो जब भ्रष्टाचार के सूचकांक हमें यह बताते हैं कि भ्रष्ट देशों की रैंकिंग में हम बरसों से वहां के वहां खड़े हैं, और अपने-आप को एशिया ही नहीं, दुनिया के महाभ्रष्ट देशों में से एक होने की उपाधि मिलने से हम तनिक भी नहीं सकुचाते, कतराते, बल्कि खुश रहते हैं, कि चलो अपने देश को मिले बहुत से रिकार्डों में एक और रिकार्ड की वृद्धि हो गई।
ऐसी बातों पर इस देश का प्रशासन इतराने से कोई कोताही नहीं करता कि हम दुनिया का वह एकलौता देश हैं जो अस्सी करोड़ लोगों को बरसों से सस्ता या मुफ्त राशन बांट रहा है बल्कि हम तो विसंगतियां जीने के इतने आदी हो गये हैं, कि एक ओर तो हम अपने आपको अमरीका और चीन के बाद दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति होने का सपना देखते या बताते नहीं थकते, और दूसरी ओर अस्सी करोड़ लोगों को वंचित कह उनमें सस्ता राशन बांटने की तिथि का विस्तार करते हुए अपने आपको दानवीर कर्ण से नीचे समझने की कोई गुस्ताखी नहीं करते।
कोई हमसे यह क्यों नहीं पूछता, कि भई जब तुमने इतनी आर्थिकता में समृद्धि हासिल कर ली तो मुफ्त या सस्ता राशन बांटने की तिथि क्यों बढ़ाते जा रहे हैं? आप कहते हैं, देश पर खुशहाल दिनों की बारिश हो रही है, लेकिन बन्धुवर आपसे कोई यह क्यों नहीं पूछता कि भाईजान समृद्धि या खुशहाली की यह बारिश पंचतारा भवनों की ऊपरी फुनगियों तक ही क्यों रुक जाती है। यहां अधिकांश यानि करोड़ों लोग कल भी अपनी विफलता को झेलते हुए अपनी झोलियां फैला महामानवों द्वारा फैंकी गई मुफ्त रेवड़ियों का इंतज़ार कर रहे थे, आज भी कर रहे हैं। हां, अब समय के मसीहा इनका शीर्षक बदलने में माहिर हो गये हैं। न्यायपीठ ने चेताया, भई, यह रेवड़ियां बांटनी बन्द करो, तो हमने इसका नाम बदल कर जन-कल्याण कर दिया। यह कैसा जन-कल्याण है भई, जो जन-भागीदारी या परिश्रम के बिना हो रहा है। बिना काम के आपके खातों में पैसा आ जाना क्या कल्याण होता है? यह सोचे बिना कर्मशील लोगों की कतार मुफ्तखोरी को गले लगाते हुए जयघोष करती है। ऐसी विजय का जयघोष कि जिसके पीछे देश का कोई नया पूंजी निर्माण नहीं है। मात्र ‘दया धर्म का मूल है’ किस्म का एक सब्र है। नारा लगा कर आपके खाते में पैसा आ जाने का एहसास बना रहता है।
दूर से देखो तो क्या यह सब आपको डेढ़ टांग वाली इमारत-सा नहीं लगता? आपने नौकरी मांगने वाली कतारों को रोज़गार खिड़कियों से परे हटा कर लंगर बांटने वाली खिड़कियों के बाहर लगा दिया। अब सबसे कहते हो, आओ अपनी समस्याओं के तुरन्त समाधान का उत्सव मना लो। हमने रोज़गार की भूख की समस्या का हल लोगों में सस्ता लंगर बांट कर, और किसी को भी भूख से न मरने देने की कसम खाकर निकाल लिया।
हम कसमें खाते हैं, गारंटियां देते हैं, तो वो भी बस डेढ़ टांग वाली क्योंकि इनके पीछे रोटी देने की गारण्टी होती है, रोज़गार देने की नहीं। भ्रष्टाचार मिटाने की गारण्टी होती है, लेकिन बीते युग में कच्चे चिट्ठे बांच कर। महंगाई मिटाने की कसम खाते हैं, तो जमाखोरों और कमी का मनोविज्ञान पैदा करने का धंधा करने वालों के घर दीवाली हो जाती है। किसी भी नये शहर को स्मार्ट बना देने की घोषणा का अर्थ क्या यह होता है कि अब यहां कुछ और नई सड़कें बनाने की घोषणा की टांग टूटी नज़र आई, और कूड़े के नये डम्प इस शहर की मुंह दिखाई करने लगेंगे।



