गर्मी में बच्चे, बूढ़े और जवान सभी रहें सावधान !
मई और जून के महीनों में भारत में केवल गर्मी का मौसम नहीं होता, बल्कि यह स्वास्थ्य संबंधी अनेक चुनौतियां लेकर आते हैं। उत्तर भारत सहित देश के अधिकांश हिस्सों में इस समय तापमान 40 से 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। तेज धूप, लू, उमस, दूषित पानी और तेजी से खराब होने वाले खाद्य पदार्थ स्त्री, पुरुषों, बच्चों, किशोरों और युवाओं के साथ-साथ प्रौढ़ तथा वृद्धों के भी के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। इन महीनों में डिहाइड्रेशन, लू लगना, वायरल बुखार, डायरिया, फूड पॉइजनिंग, त्वचा रोग और आंखों के संक्रमण जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ जाती हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार इस मौसम में सबसे अधिक खतरा बच्चों, किशोरों, कामकाजी युवाओं और वृद्धजनों को होता है, क्योंकि उनकी शारीरिक क्षमता व रोग प्रतिरोधक शक्ति अलग-अलग कारणों से प्रभावित होती है। गर्मी के दिनों में सबसे आम और खतरनाक समस्या लू लगने की होती है। लंबे समय तक तेज धूप में रहने या अत्यधिक गर्म वातावरण में काम करने से शरीर का तापमान असामान्य रूप से बढ़ जाता है जिससे तेज सिरदर्द, चक्कर, बेचैनी, उल्टी, अत्यधिक कमजोरी और कभी-कभी बेहोशी तक की स्थिति का सामना करना पड़ सकता है।
यदि समय पर उपचार न मिले तो यह स्थिति जानलेवा भी बन सकती है। चिकित्सकों का कहना है कि दोपहर 12 बजे से शाम 4 बजे तक अनावश्यक रूप से धूप में निकलने से बचना चाहिए। यदि बाहर जाना ज़रूरी हो तो सिर को कपड़े, टोपी या छाते से ढककर रखें और पर्याप्त मात्रा में पानी, छाछ, नींबू पानी कच्ची प्याज और कच्चे आम का शरबत या ओआरएस का सेवन करते रहें। हल्के रंग के सूती कपड़े शरीर को अपेक्षाकृत ठंडा बनाए रखने में सहायक होते हैं। गर्मी के मौसम में शरीर में पानी की कमी यानी डिहाइड्रेशन की समस्या भी बहुत तेजी से बढ़ती है। लगातार पसीना निकलने से शरीर में पानी के साथ-साथ आवश्यक लवण भी कम हो जाते हैं। इसके कारण मुंह सूखना, अत्यधिक थकान, चक्कर आना, पेशाब कम होना और कमजोरी जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। विशेष रूप से बच्चे खेलते समय और युवा काम में व्यस्त रहने के कारण पर्याप्त पानी पीना भूल जाते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि इस मौसम में सामान्य दिनों की तुलना में अधिक पानी पीना चाहिए। नारियल पानी, मौसमी फल, तरबूज, खीरा, ककड़ी और दही जैसे खाद्य पदार्थ शरीर में पानी की मात्रा बनाए रखने में मदद करते हैं। अत्यधिक चाय, कॉफी और बाज़ार में मिलने वाले मीठे शीतल पेय पदार्थों से बचना चाहिए क्योंकि ये शरीर में पानी की कमी को और बढ़ा सकते हैं। मई और जून के महीनों में भोजन और पानी से होने वाले संक्रमण भी तेजी से फैलते हैं। गर्मी के कारण भोजन जल्दी खराब हो जाता है और दूषित पानी अनेक बीमारियों का कारण बनता है। डायरिया, उल्टी-दस्त और फूड पॉइजनिंग के मामले इस मौसम में अस्पतालों में सामान्य रूप से बढ़ जाते हैं। खुले में बिकने वाले खाद्य पदार्थ, कटे फल और अस्वच्छ पानी विशेष रूप से संक्रमण का कारण बनते हैं। चिकित्सकों के अनुसार हमेशा ताजा और स्वच्छ भोजन ही करना चाहिए तथा पानी उबालकर या फिल्टर करके पीना चाहिए। खाने से पहले और शौच के बाद हाथों को साबुन से धोने की आदत अनेक बीमारियों से बचाव का सबसे सरल उपाय है। यदि किसी व्यक्ति को लगातार उल्टी-दस्त, तेज़ बुखार या अत्यधिक कमज़ोरी महसूस हो तो तुरंत चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए, क्योंकि शरीर में पानी की कमी गंभीर स्थिति पैदा कर सकती है।
इस मौसम में वायरल बुखार और फ्लू के मामले भी बढ़ जाते हैं। बदलते तापमान और कमजोर प्रतिरोधक क्षमता के कारण संक्रमण तेजी से फैलता है। बुखार, खांसी, जुकाम, बदन दर्द और थकान इसके सामान्य लक्षण हैं। लोग अक्सर बिना डॉक्टर की सलाह के दवाइयां ले लेते हैं, जो कई बार नुकसानदायक साबित हो सकता है। पर्याप्त आराम, पौष्टिक भोजन, स्वच्छता और चिकित्सकीय परामर्श इस स्थिति में आवश्यक है।
मौसम में गर्मी और पसीने के कारण त्वचा संबंधी समस्याएं भी आम हैं। घमौरियां, खुजली, एलर्जी और फंगल संक्रमण विशेष रूप से बच्चों और युवाओं में अधिक दिखाई देते हैं। सिंथेटिक और तंग कपड़े पसीने को बढ़ाते हैं जिससे संक्रमण की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए सूती और ढीले कपड़े पहनने चाहिएं। शरीर को साफ और सूखा रखना तथा नियमित स्नान करना त्वचा रोगों से बचाव में सहायक होता है। इसी प्रकार धूल और गर्म हवाओं के कारण आंखों में संक्रमण, जलन और एलर्जी की शिकायतें भी बढ़ जाती हैं। धूप में चश्मे का उपयोग और आंखों को बार-बार हाथ न लगाने जैसी छोटी सावधानियां आंखों को सुरक्षित रखने में मदद करती हैं। बच्चों के लिए यह मौसम विशेष सावधानी की मांग करता है। बच्चे अक्सर खेलते समय धूप और गर्मी की तीव्रता को नजरअंदाज कर देते हैं। स्कूल जाने वाले बच्चों को पर्याप्त पानी, हल्का भोजन और मौसमी फल देना आवश्यक है। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों का ध्यान रखें।

