ट्रम्प की चीन यात्रा : बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले
अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने गत 13-14 मई को चीन का दौरा किया। विश्व की इन दोनों महाशक्तियों के प्रमुखों की मुलाकात पर पूरे विश्व की निगाहें लगी हुई थीं। खासकर अमरीका-ईरान के मध्य चल रहे तनाव के बीच इस मुलाकात को काफी अहम माना जा रहा था। जिस अमरीकी राष्ट्रपति के आगमन पर दुनिया के तमाम देश अपनी पलकें बिछाये रहते हैं और प्राय: अमरीकी राष्ट्रपति के समकक्ष ही हवाई अड्डे पर उनका स्वागत करते हैं, वहीं बीजिंग में उनके स्वागत के लिये चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग स्वयं नहीं पहुंचे बल्कि उप-राष्ट्रपति हान झेंग ने राष्ट्रपति ट्रम्प का स्वागत किया।
ट्रम्प और जिनपिंग के बीच बीजिंग में हुई एक उच्च-स्तरीय बैठक के दौरान घटी एक असामान्य घटना ने पूरे विश्व का ध्यान अपनी तरफ खींचा। ट्रम्प चीन में अत्यंत संतुलित भाषा का प्रयोग करते और अपने चीनी समक्ष के सामने पूरी नरमी से पेश आते दिखाई दिये। अपनी चीन यात्रा के बाद अमरीकी प्रशासन और स्वयं राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा कई स्तरों पर बयान जारी किए गए जिनमें इस यात्रा को ऐतिहासिक और सफल बताया गया। ट्रम्प ने अमरीका वापस लौटने के बाद कहा कि शी जिनपिंग के साथ हुई बैठक को इतिहास में दो महान शक्तियों (जी-2) की ऐतिहासिक मुलाकात के रूप में याद किया जाएगा। उन्होंने इस मुलाकात को अविस्मरणीय भी कहा। उन्होंने बताया कि यह ‘दो महान देशों’ के नेताओं की मुलाकात थी। चीन यात्रा के बाद ईरान पर बोलते हुए ट्रम्प ने कहा कि अमरीका और चीन दोनों यह मानते हैं कि ईरान को परमाणु हथियार नहीं मिलने चाहिए और हॉर्मुज जलडमरूमध्य को तुरंत खोलना ज़रूरी है, परन्तु यह बात ट्रम्प ने अमरीका जा कर तो कही जबकि चीन की ओर से अपने बयान में इस बात का कोई ज़िक्र नहीं हुआ। ट्रम्प ने अपनी इस यात्रा को सौदेबाज़ी की सफलता और अमरीकी उद्योगों के लिए बड़े अवसर के रूप में भी पेश किया। उधर चीन की ओर से ट्रम्प को ताइवान को लेकर सख्त शब्दों में चेतावनी दी गयी जिसके बाद ताइवान मुद्दे पर ट्रम्प की भाषा और रुख दोनों ही बदल गये। ट्रम्प की यात्रा के बाद चीन ने अपनी ‘रेड लाइन’ को दोहराया और खासकर ताइवान मुद्दे पर अपना सख्त लहज़ा रखा। चीनी विदेश मंत्रालय और राष्ट्रपति पक्ष के बयानों में ताइवान को अपना ‘अविभाज्य हिस्सा’ बताया गया और यह चेतावनी दी गई कि अगर अमरीका ने ताइवान के साथ सैन्य-रणनीतिक संबंध बनाए या ताइवान को अधिक हथियार बेचे, तो यह दोनों ताकतों के बीच ‘टकराव और यहां तक कि संघर्ष’ को न्यौता दे सकता है। शी जिनपिंग ने ट्रम्प के समक्ष चेतावनी भरे अंदाज़ में स्पष्ट शब्दों में ज़ोर देकर कहा कि ताइवान मुद्दा पूरी तरह चीन का आंतरिक मामला है और किसी बाहरी ताकत को इसमें हस्तक्षेप करने की इजाज़त नहीं दी जाएगी। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर इसे सही तरीके से नहीं संभाला गया तो दोनों देश टकराव या यहां तक कि संघर्ष की स्थिति में पहुंच सकते हैं। संभवत: यह पहला अवसर था जबकि किसी राष्ट्राध्यक्ष ने अमरीकी राष्ट्रपति के समक्ष चेतावनी भरे लहजे में ‘टकराव और संघर्ष’ की बात कही हो।
चीन की इस चेतावनी के बाद जो अमरीका व्यवहार में ताइवान को अपना सबसे बड़ा राजनीतिक व सैन्य सहयोगी मानता आया है, उसे चीन से अपनी सुरक्षा के नाम पर हथियार देता है और चीन के विरोध के बावजूद उसकी स्वतंत्र-जैसी स्थिति को बनाए रखने के लिए रणनीतिक तौर पर समर्थन देता है, उसी अमरीकी राष्ट्रपति ने ताइवान को चीन से वापसी के बाद अब औपचारिक रूप से ताइवान को आज़ादी का ऐलान करने के खिलाफ चेतावनी दे दी है। ट्रम्प ने कहा है कि मैं नहीं चाहता कि कोई स्वतंत्रता की ओर बढ़े। ट्रम्प ने यह भी कहा कि सोचिए, हमें युद्ध लड़ने के लिए 9,500 मील दूर जाना पड़ेगा। मैं ऐसा नहीं चाहता। मैं चाहता हूं कि हालात शांत हों। मैं चाहता हूं कि चीन भी शांत रहे। गौरतलब है कि जो अमरीका कानूनी तौर पर ताइवान को आत्मरक्षा के लिए संसाधन मुहैया कराने के लिए बाध्य था, उसी अमरीका को चीनी राष्ट्रपति की चेतावनी के बाद चीन के साथ कूटनीतिक संबंध बनाए रखने के कारण अब संतुलन साधना पड़ रहा है।
उधर चीन स्पष्ट रूप से ताइवान को अपने क्षेत्र का हिस्सा मानता है। चीन ने ईरान युद्ध को लेकर भी अमरीकी रुख का समर्थन करने के बजाये इसे इस तरह की लड़ाई बताया जो मूल रूप से होनी ही नहीं चाहिए थी। चीन ने अमरीका और ईरान के बीच जल्द समाधान की ज़रूरत पर भी ज़ोर दिया। व्यापारिक स्तर पर भी ट्रम्प को उतनी बड़ी सफलता हासिल नहीं हुई जितनी उम्मीद की जा रही थी, क्योंकि उनके साथ एलन मस्क, टिम कुक, जेन्सेन हुआंग, संजय मेहरोत्रा, केली ऑर्टबर्ग जैसे विश्व के 17 प्रमुख अमरीकी उद्योगपति और कॉर्पोरेट अधिकारी बीजिंग गए थे। कुल मिलाकर ट्रम्प को बीजिंग से जहां ताइवान को लेकर चेतावनी मिली वहीं ईरान मामले को लेकर भी अपेक्षित सहयोग नहीं मिल सका। ट्रम्प की इस यात्रा के लिये बस यही कहा जा सकता है कि ‘बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले।’
-मो. 98962-19228



