सोने पर रोक की अपील के मायने
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा देश के लोगों को एक वर्ष तक सोना न खरीदने हेतु की गई अपील और केन्द्र सरकार द्वारा सोने के आयात पर शुल्क 6 प्रतिशत से 15 प्रतिशत कर दिये जाने को लेकर विभिन्न वर्गों में तीव्र प्रतिक्रिया हुई है। विशेष तौर पर देश के स्वर्णकार परिवारों में तो इस समाचार ने जैसे एक प्रकार से खलबली पैदा की है। इन परिवारों में इस बात को लेकर बड़ी चिन्ता व्यक्त की जा रही है कि प्रधानमंत्री की इस अपील पर थोड़ा-बहुत अमल हो जाने पर ही देश के लगभग एक करोड़ स्वर्णकार परिवारों और उनसे जुड़े अन्य सहभागी करोड़ों कारिन्दों एवं कर्मचारियों का कारोबार बड़ी सीमा तक प्रभावित होगा। तत्काल रूप से प्राप्त एक प्रतिक्रिया के अनुसार प्रधानमंत्री के भाषण के अगले ही दिन देश के विभिन्न बड़े शहरों में सोने की बिक्री में 30 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। स्वर्णकार प्रतिनिधियों के अनुसार इस कमी का एक और बड़ा कारण सोने पर आयात शुल्क का बढ़ाया जाना भी हो सकता है। तथापि, विशेषज्ञों का यह भी मत है कि यह कमी इस पथ पर एक अस्थायी चरण है। इस वर्ग का मानना है कि प्रधानमंत्री के सोने के विदेशों से आयात पर अंकुश लगाये जाने के जिस उद्देश्य को लेकर आयात शुल्क को बढ़ाया गया है, वह तो सम्भवत: हासिल न हो। अलबत्ता सोने की तस्करी और कालाबाज़ारी के बढ़ जाने की आशंका अवश्य पैदा हो सकती है। स्वर्ण कारोबार से सम्बद्ध विशेषज्ञों के अनुसार आयात शुल्क वृद्धि से, सोने की कीमतें बढ़ जाने के बावजूद, सोने की सार्वजनिक खरीद में कोई कमी आने की सम्भावना नहीं है।
सोने और चांदी की धातु भारतीय समाज के रीति-रिवाज़, वित्त व्यवस्था एवं धार्मिक क्षेत्र के साथ सदियों पहले से जुड़ी रही हैं। देश में देवी माता के मंदिर और प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर इस तथ्य के बड़े स्पष्ट और तात्कालिक प्रमाण हैं। इसी कारण देश में सोने-चांदी की मांग प्राय: प्रत्येक वर्ष बढ़ती रहती है। ब्याह-शादी एवं त्योहारों के मौसमों पर यह मांग बड़े-बड़े उछाल ले जाती है। भारत के लोगों में सोना खरीदना और निवेश के दृष्टिगत इसे सम्भाल कर रखना सुख-समृद्धि का प्रतीक भी माना जाता है। इसी भावना के अन्तर्गत विगत दो वर्षों में भारतीयों ने 130 अरब अमरीकी डॉलर अर्थात 12,35,000 करोड़ रुपये का 1,478 टन सोना खरीदा। देश के कुल घर-परिवारों एवं स्वर्णकारों के पास एक अनुमान के अनुसार लगभग 3460 टन स्वर्णाभूषण मौजूद हैं। निवेश हेतु संरक्षित सोना इसके अतिरिक्त है।
इसी के दृष्टिगत सोने की कीमतों में समय-समय पर वृद्धि होती रहती है। आज़ादी के तत्काल पश्चात सोने की कीमतें लगभग एक सौ रुपये प्रति तोला हुआ करती थीं। तब सोने की कीमतें गेहूं के साथ वाबस्ता मानी जाती थीं। जैसे-जैसे गेहूं की कीमतें बढ़ीं, सोने के दाम भी बढ़ते चले गये। 1980 के दशक तक सोना 1330 रुपये का दस ग्राम हो गया। दो दशक बाद ही यह पहले 4500 रुपये और फिर एक बड़े उछाल के साथ लगभग 20 हज़ार रुपये प्रति दस ग्राम तक जा पहुंचा और आज इस मूल्य वृद्धि का आलम यह है कि सोना देश में आज तक के सर्वोच्च शिखर अर्थात पौने दो लाख रुपये के आस-पास जा पहुंचा है। सोने के आयात शुल्क में की गई वृद्धि यदि जारी रहती है, तो स्वर्ण-कीमतें आकाश-कुसुम हो सकती हैं।
प्रधानमंत्री की इस अपील का दूसरा पक्ष यह भी है कि विश्व में जारी दो-दो बड़े युद्धों खासकर खाड़ी युद्ध के कारण भारत को भी तेल और वित्तीय धरातल पर संकटों का सामना हो सकता है। तेल, गैस की भांति देश को सोने का आयात भी विदेशी मुद्रा विनिमय से करना पड़ता है। इस विदेशी मुद्रा के भण्डार को अक्षुण्ण बनाये रखने हेतु ही प्रधानमंत्री ने सम्भवत: भारतीयों को कुछ समय अथवा एक वर्ष तक सोना न खरीदने का आह्वान किया है ताकि विदेशी मुद्रा को बचाया जा सके। ऐसा नहीं कि केन्द्र सरकार और प्रधानमंत्री स्वयं इस आशंकित समस्या से अवगत नहीं रहे होंगे। सोने के कारोबार पर अंकुश लगाने से देश के करोड़ों लोगों के बेकार और बेरोज़गार हो जाने का खतरा दैत्य की भांति सामने आ खड़ा होगा। तथापि राष्ट्रीय हितों के संरक्षण की बात जब सामने हो, तो ऐसे सामाजिक मुद्दे गौण हो जाते हैं। ऐसे में कोई मध्य मार्ग तलाश करना ही एकमात्र उपाय बचता है। देश की सरकार को विदेशी मुद्रा बचानी है। तेल-गैस के संकट पर पार पाना है, किन्तु करोड़ों लोगों को बेरोज़गार भी नहीं किया जा सकता। इससे देश के एक बड़े वर्ग के लोगों में अराजकता पैदा होने की आशंका भी बनती है। अत: हम समझते हैं कि सरकारों को कोई ऐसा उपाय तलाश करना चाहिए जिससे देश के किसी वर्ग में नैराश्य की भावना न उपजे। सोने के क्रय-विक्रय पर पूर्ण प्रतिबन्ध तो कदापि नहीं लगना चाहिए। स्वर्ण-निवेश और सोने की घरेलू खरीद आज भी एक सर्वाधिक सुरक्षित उपाय है। हम समझते हैं कि भारत की सरकार इतनी सक्षम तो अवश्य है कि वह एक साथ इन दोनों मोर्चों की कमान सम्भाल सके। नि:संदेह इससे समाज के किसी वर्ग में घबराहट भी पैदा नहीं होगी और प्रधानमंत्री की अपील का म़कसद भी हासिल किया जा सकेगा।

