वर्तमान में अनावश्यक खरीदारी से बचना समय की मांग
भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 58.5 लाख करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच गया है। हाल ही में वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारतीय रिज़र्व बैंक के हस्तक्षेप और विदेशी मुद्रा की कमी के मद्देनज़र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आम जनता से ईंधन बचाने और सोना कम खरीदने की अपील की थी। प्रधानमंत्री की अपील के बाद से सोने के आयात और ईंधन की खपत में कमी दर्ज की गई, जिसने भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा (लगभग ़37.8 अरब तक) बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार 8 मई को समाप्त सप्ताह में विदेशी मुद्रा भंडार में ़6.295 अरब का शानदार उछाल आया।
जब पेट्रोल-डीज़ल महंगे होते हैं, रसोई गैस का बोझ बढ़ता है, दूध के दाम चढ़ते हैं और रोजमर्रा की चीज़ों की कीमतें ऊपर जाने लगती हैं, तो इसका असर सिर्फ बाज़ार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि हर घर के बजट को हिला देता है। आज देश एक बार फिर ऐसे ही दौर से गुजरता दिखाई दे रहा है, जहां महंगाई की चौतरफा मार ने आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतों को प्रभावित किया है। भारत जैसे देश के लिए यह स्थिति ज्यादा गंभीर है, क्योंकि हमारी ऊर्जा ज़रूरतों का बड़ा हिस्सा आयात पर निर्भर है। कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का सीधा असर पेट्रोल, डीज़ल, रसोई गैस, परिवहन, बिजली और उत्पादन लागत पर पड़ता है। जब ईंधन महंगा होता है, तो खेत से मंडी, मंडी से बाज़ार और बाज़ार से घर तक हर वस्तु की ढुलाई महंगी हो जाती है। यही कारण है कि ईंधन की कीमतों में वृद्धि धीरे-धीरे पूरे बाज़ार में महंगाई का रूप ले लेती है। मई महीने के शुरुआती दिनों में ही महंगाई के कई संकेत सामने आ गए। डीज़ल की कीमतें बढ़ने का असर किसानों पर भी पड़ता है, क्योंकि सिंचाई, ट्रैक्टर और कृषि परिवहन में इसका उपयोग होता है। जब किसान की लागत बढ़ती है, तो खाद्य पदार्थों की कीमतों पर भी दबाव बनता है। इस तरह ईंधन की महंगाई एक ऐसी श्रृंखला बनाती बनाती है, जिसका अंतिम बोझ उपभोक्ता पर ही आता है। सीएनजी की कीमतों में बढ़ोतरी भी शहरों के लिए चिंता का विषय है। दिल्ली, मुम्बई और अन्य महानगरों में ऑटो, टैक्सी और सार्वजनिक परिवहन का बड़ा हिस्सा सीएनजी पर निर्भर है। सीएनजी महंगी होने से यात्रियों को अधिक किराया देना पड़ सकता है। रोज़ाना काम पर जाने वाले कर्मचारी, विद्यार्थी, छोटे व्यापारी और आम परिवार इससे सीधे प्रभावित होंगे। जब देश की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ता है, तब गैर-जरूरी आयात कम करना भी आवश्यक हो जाता है। इस दौर में नागरिकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। ईंधन की बचत, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग, अनावश्यक खरीदारी से बचना और घरेलू खर्चों में अनुशासन समय की मांग है।
आम आदमी से त्याग की अपील तभी प्रभावी होती है जब व्यवस्था में बैठे लोग भी मितव्ययिता का उदाहरण प्रस्तुत करें। सरकार, उद्योग, व्यापारी और उपभोक्ता सभी को मिलकर इस कठिन समय का सामना करना होगा।(एजेंसी)

