नीट : परीक्षा नहीं, मानसिक जंग 

‘नीट का पेपर लीक हो गया’ यह सिर्फ एक वाक्य नहीं था। यह वह झटका था जिसने एक ही समय पर लाखों लोगों की धड़कनें तेज़ कर दी हैं। किसी ने टी.वी. की आवाज़ बढ़ा दी, किसी ने मोबाइल हाथे से गिरा दिया, किसी मां की आंखें भर आईं, किसी बच्चे ने चुपचाप अपनी किताब बंद कर दी और किसी ने इस सदमे में अपनी जान गंवा दी। कुछ पल के लिए लगा जैसे लाखों सपनों पर किसी ने एक ही बार सवाल खड़े कर दिए हैं। 22 लाख से अधिक विद्यार्थी, एक ही परीक्षा, एक ही सपना और अब एक ही डर—‘क्या हमारी मेहनत सच में सुरक्षित है?’ भारत में नीट अर्थात् नैशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टैस्ट अब सिर्फ एक परीक्षा ही नहीं रह गई। यह एक जंग बन चुकी है। एक ऐसी जंग जिसमें बच्चे अपना बचपन हार रहे हैं, माता-पिता अपनी पूंजी हार रहे हैं और कई घर अपनी खुशी तक हार रहे हैं। देश के हज़ारों घरों में प्रतिदिन एक ही दृश्य दिखाई देता है। सुबह अंधेरे में उठता एक बच्चा। मेज़ पर खुली किताबें। दीवारों पर लगे शरीर के चित्र। आंखों में नींद, दिमाग में डर और दिल में एक ही आवाज़ ‘इस बार चयन होना ही चाहिए।’
कोई पिता खेत बेचकर तैयारी की फीस भर रहा है। कोई मां अपने गहने गिरवी रख रही है। कोई बच्चा अपने गांव से सैकड़ों किलोमीटर दूर एक छेटे कमरे में अकेला रह रहा है। न त्यौहार, न दोस्त, न खेलें। सिर्फ किताबें, परख पत्र और दर्जे की दौड़ पर इस सपने के पीछे एक डरावनी सच्चाई भी छिपी हुई है। वह सच्चाई जिसके बारे में अक्सर देर से बात होती है। प्रश्न-पत्र लीक। धोखाधड़ी के गिरोह। लाखों रुपये में बिकता भविष्य और वे ईमानदार बच्चे जो हर खबर के साथ अंदर से टूट जाते हैं। इस वर्ष हुई परीक्षा में लगभग 22 से 23 लाख विद्यार्थियों ने भाग लिया। करीब 22 लाख से अधिक बच्चे देश के अलग-अलग केन्द्रों तक पहुंचे। यह संख्या अपने आप में बताती है कि इस परीक्षा का महत्त्व कितना बड़ा है। यह सिर्फ आंकड़े नहीं हैं। यह वह बच्चे हैं जिन्होंने अपनी छोटी आयु से ही मनोरंजन, खेलें, त्यौहार और आम जीवन से दूर रह कर दिन रात पढ़ाई की। किसी ने गांव से शहर की ओर रुख किया। किसी ने घर छोड़कर होस्टल में रहना शुरू किया, किसी ने मां-बाप की आर्थिक हालत कमजोर होने के बावजूद महंगी तैयारी के लिए कज़र् लिया। एक सीट प्राप्त करने के लिए बच्चों को सालों की ज़िंदगी इस भट्ठी में झोंकनी पड़ती है। जब इतनी बड़ी गिनती का भविष्य एक ही परीक्षा के साथ जुड़ा हो, तो इसकी पवित्रता और विश्वसनीयता बचाए रखना देश की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी बन जाती है परन्तु जब प्रश्न-पत्र लीक होने की खबरें सामने आती हैं, तो सबसे पहले झटका उन लाखों ईमानदार विद्यार्थियों को लगता है जिन्होंने सिर्फ अपनी मेहनत पर भरोसा किया होता है। उनको लगता है कि यदि कुछ लोग पैसे या पहुंच के ज़रिये पहले ही प्रश्न-पत्र प्राप्त कर सकते हैं तो फिर मेहनत की क्या कीमत रह जाती है। यह अहसास एक नौजवान के मन को अंदर से झंझोड़ कर रख देता है। कई बच्चे अपने आपको ठगा हुआ महसूस करते हैं। वह सोचते हैं कि उन्होंने वर्षों तक जो त्याग किया, क्या उसका फैसला अब किसी और की धोखाधड़ी से होगा।
प्रश्न-पत्र लीक होने की प्रक्रिया कोई खेल नहीं असल में यह एक बहुत गम्भीर और संगठित ढंग से चलने वाला कारोबार बन चुका है। सबसे पहले प्रश्न तैयार किये जाते हैं। यह काम बहुत गुप्त माना जाता है, परन्तु जहां मनुष्य शामिल हो, वहां लालच का दरवाज़ा भी खुला रहता है। यदि प्रश्न तैयार करने वालों या उनके साथ जुड़े कर्मचारियों में से कोई गलत मंसूबा रखे, तो जानकारी बाहर पहुंच सकती है। इसके बाद प्रश्न-पत्र प्रिंटिंग के लिए जाते हैं। यहां सुरक्षा के कई प्रबंध होते हैं, परन्तु फिर भी यदि अंदर के लोग मिले हैं तो नकल या तस्वीर बाहर जा सकती है। फिर यह पत्र सीलबंद पैकेटों में केन्द्रों तक भेजे जाते हैं। इस दौरान आवागमन प्रणाली में गड़बड़ हो सकती है। कई बार यहां प्रश्नपत्र रखे होते हैं वहां की सुरक्षा कमजोर होने के कारण भी लीक की सम्भावना बनती है। आज के समय में तो दूरसंचार के माध्यम ने इस खतरे को और बढ़ा दिया है। एक तस्वीर कुछ मिनटों में हज़ारों लोगों तक पहुंच जाती है। इस कारण परीक्षा माफिया एक बड़ा जाल बन चुका है जो लाखों रुपये लेकर नौजवानों के भविष्य के साथ खेलता है। यह पहली बार नहीं कि इस परीक्षा पर सवाल उठे हैं। पिछले दस वर्षों में कई बार अलग-अलग राज्यों में धोखाधड़ी, नकली उम्मीदवारों, प्रश्नपत्र लीक और अंकों की गड़बड़ के आरोप सामने आये हैं। खासतौर पर 2024 की घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। उस समय कुछ राज्यों से खबरें आईं कि प्रश्नपत्र पहले ही कुछ लोगों तक पहुंच चुके थे। इस मामले की जांच हुई, गिरफ्तारियां हुईं और मामला देश की सबसे बड़ी अदालत तक गया। उस समय भी लाखों विद्यार्थियों ने दोबारा परीक्षा करवाने की मांग की थी। हालांकि पूरे देश में दोबारा परीक्षा नहीं हुई, परन्तु इस घटना ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया कि यदि देश की सबसे महत्वपूर्ण परीक्षा भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं, तो फिर नौजवान किस पर भरोसा करें।
सरकार की ज़िम्मेदारी सिर्फ परीक्षा करवाने तक सीमित नहीं होती, बल्कि लाखों नौजवानों के भविष्य की रक्षा करना भी उसका फज़र् होता है। जब एक ही परीक्षा पर पूरे देश के बच्चों की ज़िंदगी टिकी हो, तो उस प्रणाली में एक छोटी लापरवाही भी लाखों सपनों को खत्म कर सकती है। प्रश्नपत्र लीक होने का मतलब सिर्फ सुरक्षा की नाकामी नहीं, यह उस भरोसे का टूटना भी है जो विद्यार्थी और माता-पिता सालों से इस प्रणाली पर करते आ रहे हैं। सरकारें अक्सर घटना के बाद जांच, कमेटियों और गिरफ्तारियों की बातें करती हैं, परन्तु असली सवाल यह है कि हमेशा नुकसान हो जाने के बाद ही कार्रवाई क्यों होती है? यदि लाखों रुपये लेकर प्रश्न बेचने वाले गिरोह बन सकते हैं, तो इसका मतलब है कि प्रणाली के अंदर कहीं न कहीं बड़ी कमजोरियां मौजूद हैं। सरकार की ज़िम्मेदारी सिर्फ आरोपियों को पकड़ने की नहीं, बल्कि ऐसा ढांचा बनाने की है जिसमें किसी को धोखाधड़ी करने की हिम्मत ही न हो। इसके साथ-साथ नौजवानों की मानसिक स्वास्थ्य की ओर ध्यान देना भी उतना ही ज़रूरी है। जब देश के विद्यार्थी डर, तनाव और निराशा में जी रहे हैं, तो यह सिर्फ शिक्षा का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर संकट बन जाता है।
आज की शिक्षा प्रणाली बच्चों को ज्ञान से अधिक डर सिखा रही है। एक बच्चे की कीमत उसके अंकों से तय की जा रही है। बढ़िया अंक आए तो वाह-वाह, थोड़ा पीछे रह गए तो चुप। धीरे-धीरे बच्चे अपने आपको इन्सान नहीं, बल्कि परिणाम बन कर देखने लग जाते हैं। समाज की सोच भी इसलिए कम ज़िम्मेदार नहीं। हम बच्चों को बचपन से यही सिखाते हैं कि कुछ पेशे ही इज्जत वाले हैं। डाक्टर, अधिकारी या बड़ी नौकरी— इनसे बाहर की दुनिया के बारे में हम बच्चों को बताते ही नहीं। इस कारण जब कोई बच्चा एक परीक्षा में कामयाब नहीं होता, तो उसको लगता है कि उसकी पूरी ज़िंदगी बेमतलब हो गई। माता-पिता की उम्मीदें भी कई बार अनजाने में बोझ बन जाती हैं। हर माता-पिता अपने बच्चे के लिए अच्छा चाहते हैं, परन्तु जब हर बात का केन्द्र सिर्फ अंक बन जाएं तो बच्चे डर में जीना शुरू कर देते हैं। उनको लगता है कि यदि वह असफल हो गए तो वह अपने माता-पिता का सिर झुका देंगे। यही डर कई बार उनको अंदर से खा जाता है। 
सरकार और परीक्षा करवाने वाली संस्थाओं की ज़िम्मेदारी भी बहुत बड़ी है। जब लाखों विद्यार्थियों का भविष्य एक परीक्षा से जुड़ा है, तो उसकी सुरक्षा में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए। जहां भी लापरवाही हो, वहां सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। क्योंकि यदि नौजवानों को यह महसूस होने लगा कि सिस्टम में मेहनत से ज्यादा पैसे और पहुंच की कदर है तो फिर उनका भरोसा टूटना स्वाभाविक है। समाधान सिर्फ सुरक्षा बढ़ाने से नहीं निकलेगा। ज़रूरत पूरी सोच बदलने की है। बच्चों को यह समझाने की ज़रूरत है कि एक परीक्षा जीवन का अंत नहीं होती। स्कूलों और तैयारी केन्द्रों में मानसिक सहायता की प्रणाली होनी चाहिए। बच्चों को अपने मन की बात कहने का मौका मिलना चाहिए। उनको यह महसूस होना चाहिए कि उनकी ज़िंदगी किसी भी दर्जे या अंक से बड़ी है। आज ज़रूरत इस बात की है कि हम अपने बच्चों को सिर्फ मुकाबले के लिए नहीं, बल्कि जीवन के लिए तैयार करें। उनको यह सिखाएं कि नाकामी शर्म नहीं होती। प्रत्येक मनुष्य की अपनी योग्यता होती है और कामयाबी के रास्ते एक नहीं, अनगिनत होते हैं।
यदि हम आज भी न समझे, तो आने वाले वर्षों में और कई घर खामोश हो जाएंगे। कई माता-पिता अपने बच्चों की तस्वीर के सामने बैठकर रोएंगे। और कई नौजवान चुपचाप अपने अंदर टूटते रहेंगे। एक देश की असली ताकत उसके नौजवान होते हैं। यदि वही नौजवान डर, तनाव और निराशा में जीने लगे तो यह सिर्फ शिक्षा का नहीं, पूरे समाज के भविष्य का संकट बन जाता है।

तपा मंडी, ज़िला बरनाला
मो. 94635-10941

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