कहानी-तलाश
(क्रम जोड़ने के लिए पिछला रविवारीय अंक देखें)
‘सवेरा सिनेमा चौक के पास उतर जाऊंगा।’ वह बोला।
वह उसकी खूबसूरती को एकटक निहारता ध्यानमग्न हो गया।
‘आ गयी आपकी मंजिल।’ वह उसका ध्यानभंग करते हुए बोली।
वह गाड़ी से नीचे उतर गया।
हेली मुस्कुराते हुए बोली- ‘कल क्या आप इस स्थान पर ही मिलेंगे? यहीं से हम दोनों साथ चलेंगे।’
‘कल यहीं पर हम दोनों की मुलाकात होगी और यहीं से साथ चलेंगे।’ वह मुस्कुराते हुए बोला। वह अपने घर आ गया। बिस्तर पर पड़ा था, लेकिन उसकी रातों की नींद हेली ने चुरा ली थी। उसकी आंखों के आगे हेली की खूबसूरती घूम रही थी। वह सारी रात करवटें बदलता रहा। वह बहुत सुबह ही उठ गया और हेली के आने की प्रतीक्षा में अपनी पलकें बिछाये बैठा था। अब वह छीन-झपट नहीं करना चाहता था। वह एक सभ्य इन्सान बनाना चाहता था। हेली की पहली मुलाकात ने ही उसकी जीवन दिशा बदल दी। अब वह बुरे काम को छोड़कर अपनी ज़िंदगी की नयी शुरूआत करना चाहता था। उसे एक-एक पल पहाड़-सा प्रतीत हो रहा था।
शाम होने वाली थी। चौराहे पर गाड़ी आकर रूक गयी। वह फौरन गाड़ी की ओर बड़ा। हेली मुस्कुराते हुए गाड़ी के भीतर बैठने की इशारा की। वह गाड़ी के भीतर बैठ गया। फिर उसे उसकी खूबसूरती अपनी ओर आकर्षित करने लगी। इस प्रकार वह प्रतिदिन हेली के साथ उमानाथ मंदिर जाता और गंगा तट पर घंटों बैठे बातें करता। हेली भी उससे बहुत घुलमिल गयी थी। उसकी आंखों में उसके प्रति प्रेम और अपनापन का भाव झलकता था। यह प्रेम और अपनापन उसे हेली के निकट ला रहा था।
एक दिन हेली बोली- ‘हम दोनों कल भगवान शिव को जल चढ़ायेंगे। ‘
‘क्या तुम्हारी मनोकामना पूर्ण हो गयी। ‘वह बोला।
‘हां, मेरी इच्छा पूरी हो गयी। मेरा राम मुझे मिल गया।’ वह मुस्कुराते हुए बोली। उसकी बातें सुनकर वह दंग रह गया और वह नितांत उदास स्वर में बोला- ‘वह खुशनसीब कौन है, जिसकी तुम सीता बनोगी? फिर इस शहर से कब जा रही हो?’
‘अब मैं इस शहर को छोड़कर नहीं जाऊंगी। जानते हो मेरा राम कौन है? मेरा राम मेरे सामने खड़ा है।’ वह अंगुली से उसकी ओर इशारा करते हुए बोली। यह सुनकर वह चौंका। वह मन ही मन सोचने लगा- ‘मैं राम नहीं हूं। मैं तो एक चोर हूं, जो रात के अंधेरे में लोगों से छीन-झपट करता हूं। इसके जज्बातों से खेल नहीं सकता। यह सात समंदर पार से राम के जीवन दर्शन से प्रभावित होकर अपने राम की तलाश में आयी है। मैं इसके योग्य नहीं हूं। यह तो सचमुच सीता जैसी पवित्र है, जो ऐशो-आराम की ज़िंदगी छोड़कर अपने राम की तलाश में भटक रही है।’
तभी उसके गालों पर स्पर्श करते हुए वह बोली- ‘मेरा राम किस सोच में पड़ गया। क्या मैं तुम्हारी सीता बनने लायक नहीं हूं।’
उसके कोमल हाथों का स्पर्श और गुलाबी साड़ी उसकी खूबसूरती में चार-चांद लगा रही थी। उसका मन कर रहा था कि वह उसे बांहों में भर लें।
तभी उसकी अंतरात्मा ने उसे धिक्कारा- ‘यह क्या करने जा रहे होड़ क्यों उसकी पवित्रता को भंग करना चाहते होड़ यह पाप है। उसकी ज़िंदगी से दूर चले जाओ। शायद उसे राम मिल जाये?’ हेली उसके करीब आते हुए उसे अपनी बांहों में जकड़ने लगी।
वह उसकी बांहों से अपने आपको छुड़ाते हुए बोला-तुम मेरे करीब मत आओ। मैं तुम्हारा राम नहीं हूं। मेरी ज़िंदगी से दूर चली जाओ और अपने राम की कहीं और तलाश करो।’ ‘तुम ही मेरे राम हो। मैं तुम्हारी सीता बनूंगी। आखिर तुम मुझे क्यों अपनी सीता बनाना नहीं चाहते? मुझमें क्या कमी है? ‘वह आंसू बहाते हुए बोली।
‘कमी मुझमें है। मैं राम नहीं हूं। जब मेरा सच जानोगी तो तुम मुझसे नफरत करने लगोगी। मैं राम के जीवन चरित्र को कलंकित नहीं कर सकता। तुम सीता जरूर बन सकती हो, लेकिन मैं राम नहीं बन सकता।’ वह नम आंखों से बोला।
‘लेकिन तुम्हारी आंखों में मेरे लिए सच्चा प्रेम झलकता है। तुम्हारी आंखों में वासना की भूख नहीं झलकती। तुमने आज तक मुझे गलत इरादे से स्पर्श तक नहीं किया। आखिर तुम मुझे अपनाना क्यों नहीं चाहते? मेरा राम मुझे क्यों ठुकरा रहा है? ऐसी क्या मजबूरी है, जो मेरा राम मुझसे दूर रहना चाहता है?’ उसने एक साथ कई सवाल कर दिये।
‘मेरा इस दुनिया में कोई नहीं है। अनाथ हूं और फुटपाथ पर मेरी परवरिश हुई। अपनी पेट की आग बुझाने के लिए छीन-झपट करता हूं। जब से तुम मेरी ज़िंदगी में आयी हो, मैंने गलत कामों को छोड़ दिया। लेकिन मैं तुम्हारे विश्वास के साथ धोखा नहीं कर सकता। राम के चरित्र को दागदार नहीं कर सकता। तुम्हारी खूबसूरती का आनंद उठाना चाहता था, किन्तु मेरी अंतरात्मा मुझे ऐसा करने से रोक देती थी। मुझ फटेहाल, चोर के साथ अपनी ज़िंदगी क्यों नर्क बनाना चाहती होड़ मैं तुम्हारे योग्य नहीं हूं। तुम यहां से चली जाओ और राम की तलाश करो, शायद तुम्हारा राम मिल जाये।’ वह नितांत उदास स्वर में बोला।
‘तुम सच्चे इंसान हो तभी अपने अतीत के पन्नों को खोलकर रख दिया। समय और परिस्थिति इंसान से क्या कुछ नहीं करवा देती? ज़िंदगी जीने के लिए तुमने गलत रास्ते को ज़रूर चुना। इसमें तुम्हारा कोई कसूर नहीं। तुम्हें सही रास्ता दिखाने वाला कोई नहीं था। एक अनाथ अपनी ज़िंदगी जीने के लिए रास्ता ज़रूर भटक, पर आज सद्मार्ग पर चलते हुए तुम पश्चाताप की अग्नि में झुलस रहे हो।
तुम्हारा गुनाह बहुत बड़ा गुनाह नहीं है। इस संसार में क्षमा से बढ़कर कोई और धर्म नहीं हो सकता। दया-करूणा का भाव ही इंसान को महानता की बुलंदियों पर पहुंचाता है। तुम में अब बुराई नहीं रही। अब तुम ही मेरे राम हो। मैं तुम्हें छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी। सीता जैसी तो नहीं बन सकती, लेकिन उनके पदचिन्हों चलकर अपने राम की ज़िंदगी ज़रूर गुलजार करूंगी। देखो! मुझे अपनाने से इंकार मत करना वरना तेरी सीता इसी गंगा में समाहित हो जायेगी। आओ चले! भगवान को साक्षी मानकर अपनी नयी ज़िंदगी की शुरूआत करने। मेरा राम मुझे मिल गया।’ और वह उसका हाथ थामे मंदिर की ओर बढ़ गयी। (समाप्त)



