अंतर-जाति और अंतर्राज्यीय रिश्तों के मेल-मिलाप

इन दिनों सरहिंद के निकट पड़ते इंडो-अमरीकन डाइनर स्थान पर एक ऐसे विवाह में शामिल होने का सबब बना जिसमें मेरा नेपाली ड्राइवर केशव बहादुर ही नहीं मेरा झारखंड का मुहाफिज़ गिरधारी लाल तथा अन्य कई राज्यों के लोगों को मिलने का अवसर मिला। विवाह वाली लड़की के माता-पिता तो वामपंथी सोच को समर्पित हैं और पिता गुलज़ार सिंह की पृष्ठभूमि मुसलमानी है। उसके दादा टहिल सिंह मुगल बादशाहों की चढ़त के समय मुसलमान हो गए थे। टहिल सिंह के दादा-परदादा फतेहगढ़ साहिब (सरहिंद) के निवासी थे। गुलज़ार सिंह स्वयं पगड़ीधारी हैं। उनकी शादी राजपूतों की कोठी में पल कर बड़ी हुई राज रानी से हुई है। उनकी एक बेटी का नाम ऩगमा सिंह है, जो मेरी पाठक होने के नाते मुझसे मिली थी। आज वह मुझे तथा मेरी पत्नी को अपने माता-पिता के समान समझती है और स्वयं को हमारी बेटी कहती है। वैसे उसके पिता का नाम भी गुलज़ार सिंह है।
सरहिंद का निकटवर्ती उक्त मेल-मिलाप का कारण गुलज़ार सिंह की दूसरी बेटी ममता का विवाह बना। ममता ने चिराग नामक जीवन साथी स्वयं चुना है। वे दोनों गोबिन्दगढ़ पढ़ते थे। ममता कम्प्यूटर की शिक्षा लेती थी और चिराग वहां के एक कालेज में कानून की पढ़ाई करता था। हुआ यह कि दोनों एक ही बस में सफर करते थे, जो चंडीगढ़ से ज़ीरकपुर तथा राजपुरा के रास्ते गोबिन्दगढ़ जाती थी। ममता उसमें ज़ीरकपुर से चढ़ती थी और चिराग राजपुरा से। मंज़िल दोनों की एक ही थी। ममता के पिता ज़ीरकपुर काम करते थे और चिराग का परिवार राजपुरा के निकट गांव गद्दो माजरा में कृषि।
यह बात भी नोट करने वाली है कि गुलज़ार सिंह के सबसे बड़े भाई का नाम नज़ीर शाह था और उससे छोटे का दरबारा जिसे भीरा कहते थे। भीरा फकीर हो गया था और खुद मनीमाजरा के निकट दासीया नामक गांव में रहता था। सबसे छोटे भाई का नाम दिलदार मुहम्मद है और बहनों के नाम दलबीर तथा कुरशैदा। बहने अपने-अपने घर में सुखद जीवन व्यतीत कर रही हैं। फकीरी वेश वाले भाई का किसी रिश्ते से कोई संबंध नहीं। शेष सदस्य भी उसे कभी-कभार मिलते हैं। दिलदार मुहम्मद छत्त बनूड़ में सब्ज़ी की दुकान करता है। उसकी हमसफर भी मुसलमान है, परन्तु नाम हिन्दू-सिख वाला है, अमरजीत।
जहां तक चिराग का संबंध है, उसके दादा-परदादा राजपुरा के हैं और माता का नाम रिप्ला मैनरो है तथा स्वर्गीय संजीव कुमार। वह कुरुक्षेत्र के सहगल परिवार से हैं। चिराग की बहन नवांशहर के चौजर परिवार की बहू है। गोबिन्दगढ़ में पढ़ा चिराग राजपुरा के अतिरिक्त डेराबसी भी वकालत करता है। चाहे इस एकत्रता में कुल व्यक्ति 50-60 ही थे, परन्तु इनमें से आधे दूरवर्ती तथा अलग-अलग जातियों के थे। मैंने इस तरह की एकत्रता अपनी 92 वर्ष की आयु तक पहले कभी नहीं देखी थी। जाते-जाते यह भी बता दूं कि नगमा की सहेली मेनका शर्मा हिमाचल के ऊना क्षेत्र से आई थी और उसकी माता की एक सहेली सुशीला सिन्हा बिहार से। यह भी बता दूं कि इस एकत्रता में पावेल नामक युवक भी था, जो गुलज़ार सिंह का बेटा है। उसके पिता ने अपनी धारणा के अनुसार उसका यह नाम रूसी मर्यादा के अनुसार रखा है।   
अंतिका
(अक्खीयां/हरबंस कौर गिल)
उल्फत विच्च लबरेज़ सुनेहे,
बिन बोले पहिचावण अक्खीयां।
चुप रह कर किना कुझ बोलण, 
राज़ बड़े समझावण अक्खीयां।
धरती अम्बर हिल्लन लगदे, 
बण-ठण के जद आवण अक्खीयां।
लहि जावण धुर दिल दे अंदर,
बिन साज़ां दे गावण अक्खीयां। 
तूं इहनां नूं सांभ के रखीं।
पिछों ना पछतावण अक्खीयां। 

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