मौजूदा ऊर्जा संकट के दृष्टिगत तेल आयात में कमी अपरिहार्य
केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा कोयला और लिग्नाइट से गैस बनाने के लिए 37,500 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन योजना को मंज़ूरी देने को न तो केवल एक औद्योगिक सब्सिडी के तौर पर देखा जाना चाहिए और न ही इसे भारत की कोयला अर्थव्यवस्था को एक अलग तकनीकी शब्दावली के तहत पुनर्जीवित करने का महज एक और प्रयास समझना चाहिए, बल्कि इसे भारत के आर्थिक-सुरक्षा सिद्धांत के एक कहीं अधिक व्यापक और तेज़ी से उभरते पुनर्गठन के हिस्से के रूप में समझा जाना चाहिए। इस पुनर्गठन में राष्ट्रीय नीति में ऊर्जा-लचीलापन, आयात-प्रतिस्थापन, राजकोषीय-रूढ़िवादिता और भू-राजनीतिक जोखिम-प्रबंधन जैसे तत्व शामिल हो रहे हैं।
वर्षों तक, भारत की ऊर्जा नीति एक अंतर्निहित धारणा पर आधारित थी कि वैश्विक कमोडिटी बाज़ार (समय-समय पर आने वाले उतार-चढ़ावों के बावजूद) व्यापक रूप से सुलभ, तरल और इतने भरोसेमंद बने रहेंगे कि वे देश की विकास महत्वाकांक्षाओं को बनाए रख सकें। अब, लगातार आ रहे भू-राजनीतिक झटकों के बोझ तले यह धारणा ढहती जा रही है। रूस-यूक्त्रेन संघर्ष ने पहले ही उर्वरक, कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति-श्रृंखलाओं की कमज़ोरी को उजागर कर दिया था। अब पश्चिम एशिया में जारी संकट ने दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण हाइड्रोकार्बन गलियारों में से एक को खतरे में डालकर उन कमज़ोरियों को और भी गहरा कर दिया है। इसके साथ ही, इस संकट ने पूरे एशिया में माल-ढुलाई, बीमा और ऊर्जा की लागतों में भी भारी वृद्धि कर दी है।
इसी संदर्भ मेंए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हाल ही में ईंधन बचाने और आयातित उत्पादों पर निर्भरता कम करने के लिए की गई अपील का महत्व केवल बयानबाज़ी तक सीमित न रह कर, कहीं अधिक संरचनात्मक हो जाता है। सरकार का कोयला गैसीकरण पर ज़ोर देने का कदम, उस ‘किफायत’ के संदेश को प्रभावी ढंग से एक औद्योगिक नीति में बदल देता है। इसका उद्देश्य भारत के विशाल घरेलू कोयला भंडारों को एक ऐसे रणनीतिक कवच के रूप में इस्तेमाल करना है, जो आयातित एलएनजी, मेथनॉल, अमोनिया, उर्वरकों और पेट्रोकेमिकल फीड स्टॉक पर देश की बढ़ती निर्भरता के जोखिमों से सुरक्षा प्रदान कर सके।
केवल आंकड़े ही इस बात की तात्कालिक महत्व को स्पष्ट कर देते हैं। भारत अपनी कच्चे तेल की ज़रूरत का लगभग 89 प्रतिशत, अपनी एलएनजी की मांग का आधे से अधिक हिस्सा, अपनी अमोनिया की लगभग पूरी ज़रूरत और मिथेनॉल की खपत का लगभग 80-90 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है। इसके साथ ही, वह अपनी यूरिया की ज़रूरतों के लगभग पांचवें हिस्से के लिए भी आयात पर ही निर्भर बना हुआ है। कुल मिलाकर भारत पर एलएनजी, एलपीजी, मिथेनॉल, अमोनिया, कोकिंग कोल, यूरिया और संबंधित रासायनिक फीड स्टॉक के वार्षिक आयात का बोझ लगभग 2.77 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, जिससे एक रणनीतिक कमजोरी पैदा हो गई है जो भू-राजनीतिक उथल-पुथल और मुद्रा अस्थिरता के दौर में विशेष रूप से खतरनाक हो जाती है। कोयला गैसीकरण इस समीकरण को आंशिक रूप से बदल सकता है।
भारत को उम्मीद है कि कोयले को सिंथेटिक गैस (हाइड्रोजन और कार्बन मोनोऑक्साइड के एक कृत्रिम मिश्रण) में परिवर्तित करके वह आयात पर निर्भरता कम कर सकेगा, उससे जुड़ी समस्याओं से काफी हद तक मुक्ति पा लेगा। जो बात ध्यान देने योग्य है, वह केवल इस कार्यक्रम की तकनीकी महत्वाकांक्षा ही नहीं, बल्कि वह वैचारिक बदलाव भी है जिसका यह प्रतिनिधित्व करता है। दशकों तकए भारतीय आर्थिक नीति बाजार उदारीकरण और रणनीतिक संरक्षणवाद के बीच अनिश्चित रूप से डगमगाती रही, जिसके चलते अक्सर विकास के साथ-साथ ऊर्जा पर निर्भरता भी बढ़ती गई। हालांकि, आज नीति निर्माता मानते हैं कि आपूर्ति श्रृंखला पर निर्भरता स्वयं एक व्यापक आर्थिक खतरा बन गई है।
यह सोच अब वैश्विक संस्थानों द्वारा किए जा रहे रणनीतिक आकलन में भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रही है। एस एंड पी ग्लोबल ने अपनी हालिया रिपोर्ट ‘इंडिया फॉरवर्ड’ में तर्क दिया है कि भू-राजनीतिक अस्थिरता भारत को ‘रणनीतिक आत्मनिर्भरता’ की अवधारणा के इर्द-गिर्द औद्योगिक नीति पर पुनर्विचार करने के लिए मज़बूर कर रही है और आत्मनिर्भरता को आपूर्ति में व्यवधान और बाहरी झटकों के विरुद्ध देश का ‘रणनीतिक बीमा’ बताया है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान ने आधुनिक इतिहास के सबसे बड़े ऊर्जा संकटों में से एक को जन्म दिया है जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 16 प्रतिशत प्रभावित हुआ है, साथ ही एलएनजी, एलपीजी और उर्वरक आपूर्ति श्रृंखलाओं में भी भारी व्यवधान उत्पन्न हुआ है। इस संदर्भ में राष्ट्रीय सीमाओं के भीतर उपलब्ध ऊर्जा को अब केवल एक आर्थिक संसाधन के रूप में नहीं, बल्कि एक भू-राजनीतिक कदम के रूप में देखा जा रहा है। यही कारण है कि कोयला गैसीकरण एक विशिष्ट औद्योगिक चर्चा से आगे बढ़कर मंत्रिमंडल स्तर की रणनीतिक प्राथमिकता बन गया है।
इस मॉडल की लोकप्रियता का एक कारण चीन का अनुभव भी है। चीन के पास इस समय लगभग 350 मिलियन टन की कोयला गैसीकरण क्षमता है (जो भारत के 2030 के पूरे लक्ष्य से तीन गुना से भी अधिक है) और हाल के वैश्विक व्यवधानों के दौरान उसने इस बुनियादी ढांचे का उपयोग एलएनजी की कमी, उर्वरक संकट और पेट्रोकेमिकल बाज़ार में उतार-चढ़ाव के विरुद्ध एक घरेलू औद्योगिक सुरक्षा कवच के रूप में किया। भारत के नीति निर्माता अब चीन के कोयले से केमिकल बनाने वाले इकोसिस्टम को प्रदूषण उत्सर्जन के छोटे नज़रिए से नहींए बल्कि आर्थिक मज़बूती और औद्योगिक सम्प्रभुता के बड़े नज़रिए से देख रहे हैं।
भारत के कोयला गैसीकरण के सपने के पीछे जो गहरा विरोधाभास है, उसे नज़रअंदाज़ करना नामुमकिन है। देश उन्नीसवीं सदी के खनिज ईंधन संसाधन के ज़रिए इक्कीसवीं सदी के ऊर्जा सुरक्षा संकट को हल करने की कोशिश कर रहा है, भले ही इसके लिए इक्कीसवीं सदी के रसायनशास्त्र का इस्तेमाल किया जा रहा हो। भारतीय नीति-निर्माताओं के सामने एक अहम सवाल यह है कि क्या कोई ऐसा देश, जो एक बड़ी औद्योगिक शक्ति बनने की आकांक्षा रखता है, उन ईंधनों, उर्वरकों और रासायनिक कच्चे माल के लिए बाहरी आपूर्तिकर्ताओं पर पूरी तरह निर्भर रहने का जोखिम उठा सकता है, जिन पर उसकी अर्थव्यवस्था टिकी है। (संवाद)



