पंजाब में अभी जारी रहेगा पार्टियां बदलने का सिलसिला
देखे हैं हम ने दौर कई अब खबर नहीं,
पांव तले ज़मीन है या आसमान है।
प्रसिद्ध शायर दुश्यंत कुमार का यह शे’अर पंजाब की राजनीति में चल रही ‘टूट-फूट’ के दौर पर पूरी तरह चरितार्थ होता है। इस समय एक ओर पंजाब में रानजीतिक पर्टियां अन्य पार्टियों में से नेताओं को तोड़ कर अपनी स्तिथि मज़बूत करने के प्रयास कर रहीं हैं, वहीं दूसरी ओर नेता भी अपने-अपने क्षेत्रों के स्थानीय समीकरणों, लाभ और भविष्य के अनुमान के अनुसार पार्टियां बदल रहे हैं जबकि इस उद्देश्य के लिए साम-दाम-दंड-भेद तो सभी पार्टियां ही इस्तेमाल कर रही हैं, परन्तु इस उद्देश्य के लिए एजेंसियों तथा अधिकारियों के इस्तेमाल की शिकायतें भी आम हैं।
इस प्रकार प्रतीत होता है कि 2027 के विधानसभा चुनाव की घोषणा तक यह सिलसिला बदस्तूर जारी रहेगा। इस समय सबसे बड़ी तोड़-फोड़ तो अकाली दल पुनर्सुरजीत में होती प्रतीत हो रही है और सबसे अधिक भाजपा में जाने को प्राथमिकता दे रहे हैं। इस प्रकार लगता है कि भाजपा पश्चिम बंगाल में अपनाई गई रणनीति को थोड़ा बदल कर पंजाब में भी दोहरा रही है। बंगाल में भी भाजपा ने सत्तारूढ़ पार्टी टीएमसी पर इतने तीव्र हमले किए कि पहले वह मुख्य विपक्षी पार्टी बनी और इस बार सत्तारूढ़। अब भाजपा पंजाब में ‘आप’ पर सबसे अधिक हमले कर रही है ताकि पंजाब में कांग्रेस और अकाली दलों को उसी तरह अप्रासंगिक कर सके जैसे बंगाल में कांग्रेस तथा वामपंथी पार्टियों को करने में सफल रही थी। पंजाब में समाचारों में और वृत्तांत में कांग्रेस और अकाली गुट ‘आप’ तथा भाजपा से पिछड़ रहे हैं, परन्तु अभी चुनावों में कुछ माह का समय शेष है, इसलिए यह अनुमान लगाना बहुत कठिन है कि कौन-सी पार्टी चुनाव के समय तक अपने चुनाव अभियान में आगे निकलेगी। कौन लोगों की पहली पसंद बनेगा, परन्तु एक बात स्पष्ट दिखाई दे रही है कि अभी तक पंजाब के ज़मीनी मुद्दे किसी पार्टी की ओर से नहीं उठाए जा रहे। इस बार चुनाव मुकाबला 5 से 7 कोणीय होने के आसार हैं।
मुख्य रूप में ‘आप’, कांग्रेस, अकाली दल बादल, अकाली दल वारिस पंजाब दे तथा भाजपा के बीच पांच कोणीय तथा कई स्थानों पर अकाली दल पुनर्सुरजीत द्वारा बनाए जा रहे अकाली दलों के गठबंधन, बसपा तथा कुछ आज़ाद उम्मीदवार मुकाबले को 6-7 या 8 कोणीय भी बना देंगे।
वैसे हमारी जानकारी के अनुसार अकाली दल वारिस पंजाब दे तथा अकाली दल (पुनर्सुजीत) ने चाहे आपसी सहयोग के लिए तालमेल कमेटी बनाई है, परन्तु दोनों की बीच मिलकर चुनाव लड़ने की अधिक सम्भावना नहीं लगती। दोनों गुट जल्दी ही अपनी-अपनी राह अलग कर लेंगे जबकि पुनर्सुरजीत के कुछ प्रमुख नेता इस हालत में या तो स्वयं ही ‘वारिस पंजाब दे’ की ओर चले जाएंगे या फिर पार्टी भी उन्हें बाहर का रास्ता दिखा सकती है। इस बीच अकाली दल पुनर्सुरजीत अन्य अकाली गुटों को साथ लेकर गठबंधन बनाने के यत्न भी कर रहा है।
वैसे कमाल की बात है कि एक ओर पंजाब में सिख राजनीति बिखरी हुई दिखाई दे रही है और फिलहाल सिख वोट कई गुटों में ‘हन्ने हन्ने दी मीरी’ का शिकार होते दिखाई देते हैं। परन्तु सच अभी यह भी है कि पंजाब की राजनीति पर सिख राजनीति ही हावी रहती है। 2022 में ‘आप’ की जीत के कारणों में चाहे ‘मुफ्त सुविधाओं’ की भी भूमिका है तथा ‘बदलाव’ की उम्मीद भी शामिल थी, परन्तु मुख्य भूमिका बेअदबियों और नशे से नाराज़ सिख वोटरों द्वारा अदा की गई। ऐसे अधिक वोटर ‘आप’ की ओर चले गए थे। फिर 2024 में भी भाई अमृतपाल सिंह तथा भाई सरबजीत सिंह खालसा की जीत भी सिख मतदाताओं के कारण ही हुइ थी। अब इस समय जब हिन्दू वोट भाजपा या कांग्रेस के पीछे इकट्ठी होते दिखाई देते हैं, वहीं आम आदमी पार्टी तथा मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान सिख वोट को फिर ‘आप’ की तरफ करने के लिए पूरा ज़ोर लगा रहे हैं जबकि अकाली दल भी इस समय चाहे देर से ही सही, सरकार द्वारा बेअदबी संबंधी बनाए गए कानून में दोषों तथा सिख कौम को होने वाले नुकसान को लेकर घेरने की राणनीति बना रहा है। देखना होगा कि यह टकराव क्या वृत्तांत सृजित करता है। हमारी समझ के अनुसार चाहे सिख वोट इस समय बुरी तरह बंटे हुए हैं, परन्तु 2027 के चुनावों तक सिख वोट फिर स्वत: किसी एक गुट की ओर झुकेगी और विश्लेषकों के सभी अनुमान एक बार फिर गलत सिद्ध होंगे।
ये दौर-ए-मुहब्बत नहीं ये दौर-ए-तरक्की है,
‘हासिल’ के लिए कुछ भी ़गलत ठीक नहीं है यहां।
रखड़ा तथा सरगोशियां ही सरगोशियां
पूर्व मंत्री सुरजीत सिंह रखड़ा के आम आदमी पार्टी में शामिल होने की औपचारिक घोषणा चाहे अभी नहीं हुई, परन्तु उनके शामिल होने की चर्चा के पीछे सुनाई दे रही ‘सरगोशियां’ इतनी अधिक हैं कि शायद ही पंजाब के किसी अन्य नेता के पार्टी बदलते समय सुनाई दी हों। सबसे पहली चर्चा तो यही है कि बातचीत मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान तथा रखड़ा भाइयों के बीच लगभग दो सप्ताह पहले हुई मुलाकात के बाद शुरू हुई। इस सिलसिले की पहली कड़ी सुरजीत सिंह रखड़ा के भाई चरणचीत सिंह धालीवाल के साइकलिंग एसोसिएशन पंजाब का अध्यक्ष चुने जाने को बताया जा रहा है। मुख्यमंत्री से मुलाकात के बाद अगली बातचीत मुख्यमंत्री के एक बहुत ही विश्वसनीय तथा समर्थ सहायक द्वारा सम्पन्न किये जाने की चर्चा भी है।
हमारी जानकारी के अनुसार सुरजीत सिंह रखड़ा ने अकाली दल (पुनर्सुरजीत) के अध्यक्ष ज्ञानी हरप्रीत सिंह को 2-3 दिन पहले ही इस संबंध में जानकारी दे दी थी, परन्तु उनकी ओर से मनाने के यत्न सफल नहीं हुए। एक वक्त था जब सुरजीत सिंह रखड़ा को अकाली दल (पुनर्सुरजीत) की अध्यक्षता के दावेदार बताया जाता था।
रखड़ा के ‘आप’ में शामिल होने का सबसे बड़ा कारण उनके क्षेत्र समाना में बअदबी विरोधी कानून की मांग को लेकर लगे ‘टावर मोर्चे’ के प्रभाव को माना जाता है। समझा जाता है कि सफल मोर्चे के कारण समाना के गांवों में ‘आप’ का प्रभाव बढ़ा है। परन्तु यहां रखड़ा के लिए बहुत बड़ी मुश्किल यह हो सकती है कि यहीं से ही पंजाब मंडी बोर्ड के चेयरमैन तथा प्रमुख ‘आप’ नेता हरचंद सिंह ‘बरसट’ जो ‘आप’ हाईकमान के बहुत नज़दीक बताए जाते हैं, टिकट के दावेदार ही नहीं, अपितु प्रचार भी कर रहे हैं। इस बीच एक ‘सरगोशी’ यह भी है कि रखड़ा को कोई बड़ी चेयरमैनी भी दी जा सकती है। इसी बीच रखड़ा परिवार को पटियाला जिले में कोई अन्य टिकट दिये जाने की भी चर्चा है। परन्तु यहां यह ज़िक्र करना भी ज़रूरी है कि रखड़ा परिवार विशेषकर दर्शन सिंह धालीवाल भाजपा के दो सबसे बड़े नेताओं के भी काफी निकट हैं। वह कई बार उनसे मुलाकातें भी कर चुके हैं। फिर सवाल उठता है कि वह भाजपा में क्यों नहीं गए? ऐसी चर्चाएं भी हैं कि वह भाजपा नेताओं को पूछ कर ही ‘आप’ में जा रहे हैं, परन्तु इस सभी ‘सरगोशियों’ एवं चर्चाओं की पुष्टि करना लगभग असम्भव है।
मंज़िल अभी वही है जो पहले थी कभी,
राहें बदल के फिर से जाना है उस तलक।
(लाल फिरोज़पुरी)
प्रधानमंत्री की अपील
नि:संदेह विपक्षी पार्टियों का यह सवाल हक-बजानब है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यह अपील करने के लिए 5 राज्यों के चुनाव परिणामों का क्यों इंतज़ार किया, क्योंकि जैसे ही भारत को अमरीका-ईरान युद्ध के कारण तेल, खाद तथा अन्य चीज़ों भी महंगे दाम पर खरीद करनी पड़ीं तो चाहिए तो यह था कि ऐसी अपील चुनावी राजनीति की परवाह न करते हुए पहले ही कर दी जाती, परन्तु देर से ही सही, यह अपील भारतीय आर्थिकता के लिए बहुत ज़रूरी है। विशेषकर उस समय जब भारतीय रुपया विश्व की बड़ी करंसियों के मुकाबले दोहरी मार खा रहा है। अमरीकी डालर के मुकाबले भारतीय रुपया 5 से 6 प्रतिशत गिरा है, परन्तु यह यूरो, पौंड, युआन, जापानी येन तथा अन्य करंसियों के मुकाबले भी गिरा है। इसका मुख्य कारण हमारा बढ़ता हुआ व्यापार घाटा तथा आयात बिल है। यह ठीक है कि जब विश्व बाज़ार में तेल बहुत सस्ता हो गया था तो उस समय इसका लाभ रिलायंस जैसी निजी तथा सरकारी कम्पनियों ने भरपूर उठाया। उन्होंने अरबों डालर की कमाई की परन्तु सरकार ने कीमत कम करके लाभ लोगों को नहीं पहुंचाया। अब यदि सरकार कीमत बढ़ाने की अनुमति देती है तो देश में महंगाई की एक नया दौर चल पड़ेगा। दूसरी ओर यदि जैसे प्रधानमंत्री चाहते हैं कि भारतीय लोग एक वर्ष सोना न खरीदेें , तेल कम फूंकें, खाद्य तेल कम इस्तेमाल करें और विदेशी सैर न करें की ओर ध्यान न दिया गया तो भारतीय रुपये को और गिरने से बचाना कठिन हो जाएगा।
नि:संदेह भारत के पास इस समय 690 से 700 बिलियन डालर का विदेशी मुद्रा का भंडार है। परन्तु यदि इसी रफ्तार से आयात जारी रहा तो यह मुद्रा भंडार भी कम होगा और रुपये की कीमत भी गिरेगी। 2025-26 में भारत ने 6 लाख करोड़ रुपये से अधिक का सोना आयात किया था जबकि इस वर्ष 83 टन प्रति माह आयात हुआ जो पहले से अधिक है। सोना आयात करने के लिए डालर खर्च करने पड़ते हैं और रुपया गिरता है। भारत खाद, तेल आदि भी आयात ही करता है। शेष चीज़ें तो जीवन के लिए ज़रूरी हैं, परन्तु सोना आयात किए बिना जीवन चल सकता है। इसलिए सरकार ने सोने पर आयात शुल्क बढ़ा दिया है। परन्तु इसका परिणाम यह निकलेगा कि देश में सोने की तस्करी बढ़ेगी। इस समय भारत का व्यापार घाटा 333 बिलियन डालर है। यह ठीक है कि भारतीयों को देश की आर्थिक स्थिति को देखते हुए प्रधानमंत्री के अपील पर अमल करना चाहिए, परन्तु सरकार को भी तो चाहिए कि वह व्यापार घाटे को कम करने के लिए कोई रणनीति बनाए, न कि हर समय सिर्फ चुनाव जीतने और देश में अल्पसंख्यक बनाम बहुसंख्यक के तनाव को बढ़ाने वाली बनायबाज़ी ही करती रहे। इस परिस्थितियों के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था को एक बड़े खतरे का सामना करना पड़ सकता है। प्रधानमंत्री की अपील इस खतरे की ही सूचक है।
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