पिघलते और लटकते हुए ग्लेशियरों से बढ़ता खतरा

देश के मध्य हिमालयी क्षेत्रों में पर्वत शृंखलाओं के साथ लटकते हुए ग्लेशियरों और अन्य हिम-खण्डों से उत्पन्न होने वाले आशंकित खतरों संबंधी रिपोर्ट ने राष्ट्रीय स्तर पर चिन्ताओं को विस्तार दिया है। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण द्वारा जारी इस रिपोर्ट ने केन्द्र की सरकार केन्द्रीय पर्वतीय अनुसंधान विभाग और सम्बद्ध राज्यों की सरकारों की चिन्ताओं में इज़ाफा किया है। रिपोर्ट के अनुसार इस पूरे हिमालयी क्षेत्र में भिन्न-भिन्न पर्वत-शृंखलाओं की ढलानों पर दूर-दूर तक ऐसे हिम-खण्ड अथवा ग्लेशियर लटक रहे हैं जो कभी भी, और किसी भी समय वातावरण और समाज के लिए खतरा बन सकते हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि एक ओर तो ये हिम-खण्ड ऊपर पर्वतीय क्षेत्रों में हुए भारी हिमपात के कारण आकार में बड़े होते जा रहे हैं। दूसरे, मौजूदा तीव्र गर्मी के कारण इनके पिघलने की गति भी तेज़ हुई है, और पर्वतीय ढलानों के साथ ये इस प्रकार से लटक गये हैं कि किसी भी चरण पर किसी भी प्रकार के बड़े खतरे का कारण बन सकते हैं। प्रस्तुत रिपोर्ट में यह भी दर्शाया गया है कि इन लटकते हिम-खण्डों के गिरने से पहाड़ी इलाकों में हिम-स्खलन होने, बादल फटने जैसी पर्वतीय बाढ़ों के उपजने की आशंका भी बलवती होती है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि ऐसे हिम-खण्डों में से यदि कोई एक टूट कर बिखरता है, तो उसके प्रहार में कई पर्वतीय आबादियों के नष्ट हो जाने का खतरा भी बनता है। इन स्थितियों की गम्भीरता का पता इस एक तथ्य से भी चल जाता है कि राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने इसे देखते हुए केन्द्र सरकार से जवाब भी तलब किया है। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने देश के विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचारों के आधार पर स्वत: संज्ञान लेते हुए इस मामले को उठाया है। प्राधिकरण के अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव हैं, और इसे पर्यावरण विशेषज्ञ अफरोज अहमद के सहयोग के ज़रिये प्रकाश में लाया गया है। कुछ दिन पूर्व इस पीठ द्वारा दिये गये निर्देश के अनुसार पहाड़ी ढलानों पर खतरनाक ढंग से लटकते हुए ये ग्लेशियर न केवल पर्यावरण के लिए खतरा बन सकते हैं, अपितु पहाड़ी वादियों और निचले क्षेत्रों में रहने वाली मानवीय आबादी के लिए भी भारी खतरा सिद्ध हो सकते हैं। पीठ ने इन हिम-खण्डों के पिघलने की रफ्तार पर भी चिन्ता व्यक्त की है। पिघलने की इस रफ्तार के बढ़ने का कारण पहाड़ों में पड़ने वाली भीषण गर्मी एवं लू की लहर को बताया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसे हिम-खण्ड भारी आपदाओं का कारण  बन सकते हैं।
इस रिपोर्ट को जारी किये जाने से पूर्व भारतीय विज्ञान संस्थान, भारतीय प्रौद्योगिकी अनुसंधान तथा रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन, चंडीगढ़ के विशेषज्ञों और कार्यकर्ताओं ने इस हेतु व्यापक रूप से निरीक्षण और मंथन किया था। इसके उपरांत रिपोर्ट को सार्वजनिक करने का फैसला किया गया। इस दल ने अलकनंदा में जोकि गंगा नदी का उद्गम स्थल है, भी ऐसे ग्लेशियरों और हिम-खण्डों को चिन्हित किया था। इसके उपरांत उपग्रह के ज़रिये भी ऐसे चित्रों और छवियों का उपयोग करते इस रिपोर्ट को तैयार किया गया। पीठ ने हालांकि मामले की अगली सुनवाई 6 अगस्त पर रखी है, किन्तु पीठ ने इस हेतु तत्काल रूप से एक्शन मोड में आने के लिए भी अवश्य कहा है।
नि:संदेह यह स्थिति भयावह है, और देश तथा समाज के लिए इसके सरोकार बड़े गम्भीर हो सकते हैं। ग्लेशियरों के बनने और फिर बढ़ती गर्मी के कारण इनके बेतरतीबी से पिघलने के कारण इनका रूप-आकार भयंकर दिखाई देने लगता है। बढ़ी गर्मी के कारण इन पर्वतीय हिम-खण्डों के पिघलने की गति तीव्र हुई है। ऐसे हिम-खण्ड यदि पिघल कर नीचे की ओर बहें, तो पर्वतीय ढलानों पर बसी आबादी के लिए भीषण आपदा बनते हैं। इस वर्ष धरती पर लड़े जा रहे एकाधिक युद्धों के कारण भी गर्मी का तेज़ बढ़ा है। 
युद्धों के कारण कार्बन डाइआक्साइड की मात्रा भी बढ़ी है जिसके कारण वातावरण में तपिश बढ़ी है। इसी तपिश के कारण ही हिम-खण्ड एवं ग्लेशियर तेज़ी और बेतरतीबी से पिघले हैं। हम समझते हैं कि इस स्थिति को और आगे बढ़ने से रोकने के लिए सम्बद्ध केन्द्रीय एजेंसियों को तत्काल आगे आना चाहिए। बढ़ती गर्मी और पर्यावरणीय ऊर्जा से ओज़ोन परत के प्रभावित होने का खतरा बढ़ेगा। वातावरण में बढ़ती तपिश को रोकने के लिए विश्व-देशों और खासकर भारत सरकार को अपने यत्नों को तेज़ एवं एकीकृत करना होगा। सरकारें और उनकी एजेंसियां जितनी शीघ्र इन विपरीत स्थितियों पर अंकुश लगाएंगी, उतना ही देश और समाज के लिए उत्तम रहेगा।

#पिघलते और लटकते हुए ग्लेशियरों से बढ़ता खतरा