जोड़-तोड़ करके सरकार बनाने की रणनीति
भारतीय जनता पार्टी ने साल 2014 में पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता हासिल की, तब से विपक्षी सांसदों और विधायकों द्वारा पार्टी की निष्ठा बदलकर भाजपा में शामिल होने के कई उदाहरण सामने आए हैं। राघव चड्ढा के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों का हाल ही में भाजपा में शामिल होना इसका ताज़ा उदाहरण है।
मार्च 2020 में मध्य प्रदेश में कमल नाथ की सरकार गिराने के लिए 22 कांग्रेस विधायकों ने इस्तीफा दे दिया था। कुछ मामलों में नेता सीधे भाजपा में शामिल नहीं होते, लेकिन उसकी मदद करते हैं। जैसे 2020 में मणिपुर में आठ कांग्रेस विधायकों ने अपनी पार्टी के आदेश (व्हिप) को नहीं माना और विश्वास मत के दौरान वोटिंग से दूर रहे, जिससे भाजपा सरकार बच गई। इसके अलावा कई बार नेता सीधे भाजपा में भी शामिल हो जाते हैं।
आम आदमी पार्टी के सात बागी सांसदों ने एक ऐसी विधि का इस्तेमाल किया है जिसका इस्तेमाल अतीत में कई बार किया जा चुका है। दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता से बचने के लिए सदन में पार्टी के दो-तिहाई से अधिक सदस्यों को तोड़ना और पीठासीन अधिकारी के फैसले के अधीन भाजपा के साथ विलय का दावा करना। 2023 में अजित पवार ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) को विभाजित कर दिया था। इसमें पार्टी के ज्यादातर विधायकों और नेताओं ने उनका समर्थन किया। इसके बाद दिवंगत अजित पवार ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर अपने गुट को असली एनसीपी के रूप में मान्यता देने की मांग की थी, साथ ही उन्होंने शिवसेना नेता एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार में उप-मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार संभाला था।
2022 में शिंदे ने उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना को विभाजित कर दिया और उसके 55 विधायकों में से 40 और 19 सांसदों में से 12 को अपने साथ भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए में ले गए। इन दोनों ही मामलों में चुनाव आयोग ने अलग हुए गुटों को मूल पार्टी चिन्ह दिया और शिंदे सेना और एनसीपी (अजित) दोनों को असली पार्टी के रूप में मान्यता दी। नवम्बर 2024 के विधानसभा चुनावों में एनडीए की शानदार जीत के बाद भाजपा ने देवेंद्र फड़नवीस को अपना मुख्यमंत्री बनाया और सहयोगी दलों ने उनके उप-मुख्यमंत्री के पद पर समझौता कर लिया।
2019 में तेलुगु देश पार्टी (टीडीपी) के छह राज्यसभा सांसदों में से चार भाजपा में शामिल हो गए थे। इससे उच्च सदन में पार्टी की संख्या दो-तिहाई हो गई। एक दिन बाद तत्कालीन राज्यसभा अध्यक्ष एम. वेंकैया नायडू ने सदन में टीडीपी संसदीय दल को भाजपा में विलय करने का आदेश जारी किया था।
गोवा में इस तरह के विलय कई बार हो चुके हैं। 2019 में कांग्रेस के 15 विधायकों में से 10 भाजपा में शामिल हो गए थे, जिससे 40 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा की संख्या 27 हो गई थी। 2022 में भी गोवा में कांग्रेस के 11 विधायकों में से आठ ने भाजपा में विलय की घोषणा की, जिससे भाजपा को आसानी से बहुमत मिल गया। 2024 में राज्य विधानसभा अध्यक्ष रमेश तावडकर ने 10वीं अनुसूची के उल्लंघन के लिए उन्हें अयोग्य घोषित करने की कांग्रेस की याचिका को खारिज कर दिया। मनोहर पर्रिकर की मृत्यु के बाद मुख्यमंत्री बने प्रमोद सावंत को इन विलयों के कारण स्थिर सरकारें चलाने में मदद मिली। 2019 के विलय ने उन्हें गोवा फॉरवर्ड पार्टी और एमजीपी जैसे क्षेत्रीय सहयोगियों पर निर्भर हुए बिना बहुमत हासिल करने में सक्षम बनाया। 2022 के चुनावों में भाजपा ने 20 सीटें जीतीं और सावंत ने मात्र 666 वोटों से चुनाव जीता, लेकिन इस विलय ने भाजपा सरकार को और मज़बूत किया। अरुणाचल प्रदेश में 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री पेमा खांडू के नेतृत्व में कांग्रेस के 44 विधायकों में से 43 एनडीए के उत्तर-पूर्व लोकतांत्रिक गठबंधन (एनईडीए) की सहयोगी पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल (पीपीए) में शामिल हो गए। दो महीने बादए खांडू ने पीपीए को तोड़ दिया और 32 विधायकों के साथ भाजपा में शामिल हो गए। खांडू मुख्यमंत्री बने रहे और इस दौरान वह कमज़ोर कांग्रेस से केंद्र में मज़बूत भाजपा की सत्ता में आने में सफल रहे।
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