केरलम में कांग्रेस की पारी

इस माह 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद 4 राज्यों ने अपनी-अपनी सरकारें बनाने की घोषणा करते हुए अपने-अपने मुख्यमंत्री का चयन कर लिया था, परन्तु देश के दक्षिण राज्य केरलम में कांग्रेस की ओर से 10 दिन तक मुख्यमंत्री का चयन करने की कवायद होती रही थी। अंत में 14 मई को वी.डी. सतीशन के नाम पर मुहर लगी। उनके मुकाबले में दिल्ली में पार्टी के प्रभावशाली नेता के.सी. वेणुगोपाल थे और दूसरे वरिष्ठ नेता रमेश चेन्निथला थे, परन्तु इस बार सतीशन को ही चुनाव जीतने का अधिक श्रेय दिया जाता रहा है। कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटिड डैमोक्रेटिक फ्रंट (यू.डी.एफ.) में 2 अन्य बड़ी पार्टियां इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग आई.यू.एम.एल. और केरला कांग्रेस (जोस़ेफ) ने चुनाव लड़े थे।
मुस्लिम लीग को 22 सीटें और केरला कांग्रेस को 7 सीटें मिली थीं। ये दोनों पार्टियां भी सतीशन के समर्थन में खड़ी दिखाई देती थीं। पार्टी के इस फैसले की व्यापक स्तर पर प्रशंसा हुई है। कांग्रेस के लिए भी केरलम की यह जीत भाजपा की आई सुनामी के सामने साहस दिखाने जैसी ज़रूर रही है। दक्षिण में अब कर्नाटक और तेलंगाना के बाद केरलम में उसने जीत का ध्वज फहराया है। इन चुनावों में एक अहम बात उभर कर यह भी आई है कि ये चुनाव कम्युनिस्ट पार्टियों के लिए बड़ी निराशा लेकर आए हैं। अब पहली बार देश के किसी भी राज्य में कम्युनिस्ट पार्टियों का शासन नहीं रहा। केरलम में मार्क्सवादी पार्टी के नेतृत्व में वामपंथी पार्टियों ने चुनाव लड़े थे, जिसमें मार्क्सवादी पार्टी को 26 और कम्युनिस्ट पार्टी को 8 सीटें मिली हैं। केरलम के हालात भी देश के अन्य ज्यादातर राज्यों जैसे ही प्रतीत होते हैं। राज्य में बेरोज़गारी का बोलबाला है। यह भारी ऋण में भी दबा हुआ है। यहां भी मुफ्त की योजनाएं और ज़रूरत से अधिक खर्च किया जाता रहा है, जिससे इसकी आर्थिकता डावांडोल होती रही है।
कांग्रेस के नेतृत्व वाले सत्ता में आए इस गठबंधन ने भी अपने चुनाव घोषणा पत्र में ऐसी ही जन-लुभावन योजनाओं के वायदे किए हैं, जिनमें कई पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नाम वाली बड़ी गारंटी योजनाएं हैं। अपने सीमित साधनों द्वारा नई सरकार अपने किए वादों को किस तरह पूरा करने में समर्थ हो सकेगी, यह देखने वाली बात होगी। कांग्रेस के लिए यह बात भी चुनौतीपूर्ण होगी कि वह इस राज्य के प्रशासन को बेहतर ढंग से चलाने में कैसे सफल होती है। इसके सहारे ही वह राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के सामने खड़े होने का साहस जुटा सकेगी और इसका प्रभाव आने वाले महीनों में कुछ और राज्यों के चुनावों पर पड़ना भी स्वभाविक है।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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